
“कला” शब्द ज्योतिष में एक नहीं, चार अलग-अलग अर्थों में आता है — चंद्र की घटती-बढ़ती कलाएँ, ग्रहों की दृश्य कलाएँ (phases), अंश-कला-विकला का गणित, और ग्रह की अवस्थाओं से जुड़ा “काल-बल”। इन चारों को समझे बिना ग्रह की असली शक्ति समझ नहीं आती।
इस लेख में हम चारों अर्थ एक साथ खोलेंगे — खगोल-विज्ञान से शुरू करके ज्योतिष की गणना तक — और ग्राफ़ व तालिकाओं से दिखाएँगे कि ग्रह कब “बली” माना जाता है, कब “अस्त”, कब “बाल” या “मृत” अवस्था में, और जन्म-समय के कुछ मिनट का अंतर क्यों मायने रखता है।
“कला” के चार अर्थ — एक नज़र
| अर्थ | मतलब | किसमें दिखता है |
|---|---|---|
| 1. दृश्य कला (Phase) | पृथ्वी से ग्रह/चंद्र का कितना हिस्सा प्रकाशित दिखता है | चंद्र की तिथियाँ; शुक्र-बुध की कलाएँ; अस्त |
| 2. चंद्र की 16 कलाएँ | पूर्ण चंद्र की 16 अवस्थाओं की तंत्र-पुराण परंपरा | तिथि, पक्ष-बल, उपासना |
| 3. अंश-कला-विकला | अंश (degree) का 60वाँ भाग = कला; कला का 60वाँ = विकला | ग्रह-स्थिति, वर्ग-कुंडली, लग्न |
| 4. ग्रह की अवस्था और बल | बाल-कुमार-युवा-वृद्ध-मृत; जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति; षड्बल में “काल-बल” | ग्रह कितना फल देने में सक्षम है |
1. दृश्य कलाएँ: चंद्र और ग्रहों के phases
चंद्रमा, शुक्र और बाक़ी ग्रह अपना प्रकाश नहीं देते — वे सूर्य की रोशनी लौटाते हैं। हर पिंड का सूर्य की ओर वाला आधा हिस्सा हमेशा रोशन रहता है। हमें उसका कितना हिस्सा दिखे, यह इस पर निर्भर है कि सूर्य, वह पिंड और हम (पृथ्वी) किस कोण पर हैं। यही कोण बदलने से कलाएँ बनती हैं।
चंद्रमा को एक अमावस्या से अगली अमावस्या तक लौटने में औसतन 29.53 दिन लगते हैं (संयुति-मास), जबकि नक्षत्र-मास केवल 27.32 दिन का है — क्योंकि इस बीच पृथ्वी भी सूर्य के चारों ओर आगे बढ़ चुकी होती है। चंद्र और सूर्य का कोणीय अंतर हर 12° पर एक तिथि बनाता है: 360° ÷ 12° = 30 तिथियाँ। औसत तिथि 29.53 ÷ 30 ≈ 0.984 दिन (लगभग 23 घंटे 37 मिनट) की होती है, पर चंद्र की चाल बदलती रहने से असली तिथि लगभग 19 से 26 घंटे तक की हो सकती है। इसी वजह से कभी तिथि क्षय या वृद्धि होती है।
शुक्र, बुध और मंगल की कलाएँ
1610 में गैलीलियो ने दूरबीन से शुक्र की कलाएँ देखीं — पतली से पूर्ण तक — और यह इस बात का एक निर्णायक प्रमाण बना कि शुक्र पृथ्वी नहीं, सूर्य की परिक्रमा करता है। बुध भी इसी तरह कलाएँ दिखाता है। पर बाहरी ग्रह (मंगल, गुरु, शनि) की स्थिति अलग है: हम उनकी कक्षा के भीतर से उन्हें देखते हैं, इसलिए वे सूर्य की रोशनी में लगभग पूरे नहाए दिखते हैं।
मंगल की कला कभी 84% से कम नहीं होती (अधिकतम कोण लगभग 47°), गुरु की 99% से कम नहीं और शनि की 99.7% से कम नहीं। यानी ग्रहों में सिर्फ़ चंद्र, बुध और शुक्र की “घटती-बढ़ती” कलाएँ ही नाटकीय रूप से बदलती दिखती हैं।

अस्त: जब ग्रह की “कला” सूर्य में खो जाए
जब कोई ग्रह सूर्य के बहुत पास (कुछ अंशों के भीतर) आ जाता है, तो उसकी चमक सूर्य के तेज़ में छिप जाती है और वह दिखाई नहीं देता — खगोल में इसे सूर्य-संयुति के निकट होना कहते हैं, और ज्योतिष में अस्त। शास्त्रीय मान नीचे हैं।
ध्यान दें: अस्त होना भी वक्री की तरह एक दृश्य स्थिति है, जिस पर ज्योतिष ने फल-सिद्धांत खड़ा किया। परंपरा में अस्त ग्रह को अपना फल देने में कमज़ोर माना जाता है, पर यह भी कहा गया है कि अस्त ग्रह की कारक-शक्ति “सूर्य में समा” जाती है, इसलिए फल का निर्णय पूरे संदर्भ में होता है। ग्रह की गति की मूल बातें: नवग्रह का खगोल-विज्ञान।
2. चंद्र की 16 कलाएँ
तंत्र और पुराण परंपरा में पूर्ण चंद्र की 16 कलाएँ मानी गई हैं — शुक्ल पक्ष में 15 क्रमशः बढ़ती हैं और 16वीं “अमृत” कला मानी जाती है, जो अमावस्या में भी बनी रहती है। हर कला को एक शक्ति/गुण के रूप में देखा गया है। नाम-सूची में ग्रंथ-भेद मिलता है; नीचे सबसे प्रचलित क्रम है।
| कला | कला | कला | कला |
|---|---|---|---|
| 1. अमृता | 2. मानदा | 3. पूषा | 4. तुष्टि |
| 5. पुष्टि | 6. रति | 7. धृति | 8. शशिनी |
| 9. चन्द्रिका | 10. कान्ता | 11. ज्योत्स्ना | 12. श्री |
| 13. प्रीति | 14. अंगदा | 15. पूर्णा | 16. पूर्णामृता |
ज्योतिष में चंद्र की कला का सीधा उपयोग पक्ष-बल में होता है: शुक्ल पक्ष का (बढ़ता) चंद्र शुभ और बली, कृष्ण पक्ष का क्षीण चंद्र कमज़ोर माना जाता है। पूर्णिमा के आस-पास चंद्र सर्वाधिक बली और अमावस्या के आस-पास सबसे कम बली माना जाता है — यही “चंद्र-बल” है।
3. अंश-कला-विकला: ज्योतिष का सूक्ष्म गणित
राशि-चक्र 360° का है। ज्योतिष में ग्रहों की स्थिति अंश-कला-विकला में लिखी जाती है: 1 अंश = 60 कला और 1 कला = 60 विकला। यानी 1 अंश = 3,600 विकला। (आधुनिक खगोल में इन्हें arc-minute और arc-second कहते हैं।) इसलिए ग्रह की स्थिति “सिंह 14°-32′-18″” कही जाती है, जिसमें 32′ = 32 कला और 18″ = 18 विकला।
| इकाई | अंश | कला में | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| पूरा राशि-चक्र | 360° | 21,600 कला | परंपरा में प्रतिदिन ~21,600 श्वास की गिनती से भी संबंध जोड़ा गया है |
| 1 राशि | 30° | 1,800 कला | 12 राशियाँ |
| 1 नक्षत्र | 13°20′ | 800 कला | 27 नक्षत्र; चंद्र लगभग 1 दिन में एक नक्षत्र पार करता है |
| 1 नक्षत्र-पद | 3°20′ | 200 कला | एक नक्षत्र में 4 पद; कुल 108 पद |
| 1 नवांश (D9) | 3°20′ | 200 कला | एक नवांश = एक नक्षत्र-पद (दोनों 3°20′) |
| सूर्य की औसत दैनिक गति | ≈ 0°59′08″ | ≈ 59.1 कला | लगभग 1 अंश प्रतिदिन |
| चंद्र की औसत दैनिक गति | ≈ 13°10′35″ | ≈ 790.6 कला | सूर्य से लगभग 13 गुना तेज़ |
एक दिलचस्प संयोग (या डिज़ाइन): नवांश का आकार 3°20′ है, और नक्षत्र-पद का भी 3°20′ — यानी राशि-चक्र को 108 बराबर हिस्सों में बाँटने पर दोनों एक हो जाते हैं। इसीलिए नवांश कुंडली और नक्षत्र-पद का आपस में गहरा संबंध है।
जन्म-समय के कुछ मिनट क्यों मायने रखते हैं?
पृथ्वी 24 घंटे में 360° घूमती है, यानी लग्न औसतन 15° प्रति घंटा या लगभग 1° हर 4 मिनट आगे बढ़ता है (यह राशि और अक्षांश के अनुसार थोड़ा घटता-बढ़ता है)। इसका मतलब: 1 कला के बराबर लग्न बदलने में लगभग 4 सेकंड लगते हैं। D9 (3°20′) में लग्न बदलने में लगभग 13 मिनट और D60 (30′) में लगभग 2 मिनट। इसीलिए यदि जन्म-समय में कुछ मिनट की भी ग़लती है, तो नवांश या षष्ट्यंश जैसी सूक्ष्म वर्ग-कुंडलियाँ बदल सकती हैं। सही जन्म-समय पर विस्तार से पढ़ें: नाड़ी दोष और कुंडली मिलान में नक्षत्र-गणना।
4. ग्रह की अवस्थाएँ: बाल से मृत तक और जाग्रत से सुषुप्ति तक
“अवस्था” का अर्थ है ग्रह की वर्तमान स्थिति या दशा। ज्योतिष में एक ही ग्रह कई अलग पैमानों पर आँका जाता है। तीन प्रमुख पैमाने नीचे हैं।
(क) बालादि अवस्था: राशि के भीतर ग्रह की “आयु”
हर राशि 30° की होती है, जिसे 6°-6° के पाँच खंडों में बाँटा जाता है: बाल, कुमार, युवा, वृद्ध, मृत। विषम राशि में क्रम यही रहता है और सम राशि में उलटा। जैसे सूर्य मेष (विषम) में 3° पर हो तो “बाल” और वृषभ (सम) में 3° पर हो तो “मृत”। परंपरा में युवा अवस्था का ग्रह पूरा फल देने वाला, बाल और कुमार अधूरे फल वाला, वृद्ध घटते फल वाला और मृत लगभग निष्प्रभावी माना जाता है।
(ख) जाग्रतादि अवस्था: ग्रह किस राशि में है
| अवस्था | कब | परंपरागत अर्थ |
|---|---|---|
| जाग्रत (जागा हुआ) | स्वराशि या उच्च राशि में | पूरा फल देने में समर्थ |
| स्वप्न (सपने की स्थिति) | मित्र या सम राशि में | मध्यम फल |
| सुषुप्ति (गहरी नींद) | शत्रु राशि या नीच राशि में | कमज़ोर फल; अन्य बल से सहायता चाहिए |
इसी के साथ उच्च-नीच अंश भी निश्चित हैं:
| ग्रह | उच्च राशि और अंश | नीच राशि और अंश |
|---|---|---|
| सूर्य | मेष 10° | तुला 10° |
| चंद्र | वृषभ 3° | वृश्चिक 3° |
| मंगल | मकर 28° | कर्क 28° |
| बुध | कन्या 15° | मीन 15° |
| गुरु | कर्क 5° | मकर 5° |
| शुक्र | मीन 27° | कन्या 27° |
| शनि | तुला 20° | मेष 20° |
उच्च-बल की गणना (उदाहरण): किसी ग्रह का उच्च-बल = (नीच बिंदु से उसकी कोणीय दूरी ÷ 3) विरूप, जो उच्च बिंदु पर अधिकतम 60 और नीच बिंदु पर 0 होता है। जैसे चंद्र वृषभ 18° (यानी राशि-चक्र पर 48°) पर है, तो नीच बिंदु वृश्चिक 3° (213°) से दूरी = 165°, उच्च-बल ≈ 165 ÷ 3 = 55 विरूप। (उच्च बिंदु वृषभ 3° = 33° पर दूरी 180° → 60 विरूप।)
(ग) दीप्तादि अवस्थाएँ
तीसरे पैमाने में ग्रह की स्थिति को नामों से आँका जाता है: दीप्त (उच्च का), स्वस्थ (स्वराशि का), मुदित (मित्र राशि का), शांत (शुभ वर्ग में), दीन (शत्रु राशि का), पीड़ित (ग्रह-युद्ध में हारा), विकल (अस्त), खल (पाप-ग्रह के प्रभाव में) और भीत (नीच का)। अलग-अलग ग्रंथों में इनकी संख्या और परिभाषा थोड़ी भिन्न मिलती है, इसलिए इसे एक सामान्य परिचय की तरह लें।

5. षड्बल और “काल-बल”: ग्रह की कुल शक्ति कैसे नापी जाती है?
ग्रह की सम्पूर्ण शक्ति नापने की सबसे व्यापक पद्धति षड्बल है, यानी छह प्रकार के बल का योग। इन्हीं छह में से एक काल-बल है — सीधे समय से जुड़ी “कला” की शक्ति।
| बल | किस पर आधारित | संक्षेप में |
|---|---|---|
| स्थान-बल | ग्रह की राशि/वर्ग स्थिति | उच्च, स्वराशि, मित्र राशि, वर्ग में कैसा |
| दिग्-बल | भाव/दिशा | जैसे बुध-गुरु को लग्न में, चंद्र-शुक्र को चतुर्थ में, शनि को सप्तम में, सूर्य-मंगल को दशम में अधिक बल |
| काल-बल | जन्म का समय | दिन/रात, पक्ष, वार-मास-वर्ष-होरा के स्वामी, अयन, ग्रह-युद्ध |
| चेष्टा-बल | गति और वक्री-स्थिति | वक्री ग्रह में चेष्टा-बल अधिक माना जाता है |
| नैसर्गिक बल | ग्रह का जन्मजात बल | सूर्य सबसे बली, शनि सबसे कम |
| दृग्-बल | दृष्टि | शुभ ग्रह की दृष्टि जोड़ती, पाप-दृष्टि घटाती है |
ऊपर नैसर्गिक बल का ग्राफ़ है: सूर्य 60 विरूप, चंद्र 51.43, शुक्र 42.85, गुरु 34.28, बुध 25.70, मंगल 17.14 और शनि 8.57। यानी जन्मजात बल सूर्य से शनि तक बराबर 8.57 घटता है। फिर इसमें बाक़ी पाँच बल जुड़कर कुल षड्बल बनता है। नीचे वह न्यूनतम मान है जिसके नीचे ग्रह को “निर्बल” गिना जाता है।
ध्यान दें कि मान ग्रह के अनुसार अलग हैं: बुध को सबसे ज़्यादा (7 रूप) चाहिए, जबकि मंगल-शनि को 5 रूप। इसलिए 5.5 रूप का षड्बल बुध के लिए कमज़ोर, पर शनि के लिए अच्छा माना जाएगा। ग्रह-शांति और रत्न विषयक निर्णय में यह फ़र्क़ महत्त्वपूर्ण है; रत्न-धारण की सही प्रक्रिया पर: रत्न धारण — सही पहचान और चुनाव।
अपनी कुंडली में ग्रह की “कला” कैसे पढ़ें? — 6 सरल क़दम
- स्थिति: ग्रह किस राशि और कितने अंश-कला पर है (सटीक जन्म-समय से)।
- दृश्य कला: चंद्र शुक्ल पक्ष में है या कृष्ण में; ग्रह सूर्य के कितने पास है (अस्त तो नहीं)।
- बालादि अवस्था: राशि के भीतर 6° के किस खंड में है।
- जाग्रतादि और उच्च-नीच: किस राशि में बैठा है — स्वराशि, मित्र, शत्रु, उच्च या नीच।
- षड्बल: कुल बल अपने न्यूनतम से ऊपर है या नीचे।
- दशा-गोचर के साथ मिलाएँ: ग्रह की दशा कब है और उस समय गोचर कैसा है। अकेली “कला” से निर्णय न करें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. ग्रहों की “कला” का सबसे सरल मतलब क्या है?
सबसे सरल: चंद्र की घटती-बढ़ती कला (अमावस्या से पूर्णिमा)। ज्योतिष में कला का अर्थ अंश का 60वाँ भाग भी है और ग्रह की अवस्था/बल से भी जुड़ा है।
2. क्या अन्य ग्रहों की भी चंद्र जैसी कलाएँ होती हैं?
हाँ, शुक्र और बुध में पूरी कलाएँ (पतली से पूर्ण तक) होती हैं। मंगल लगभग 84% से कम नहीं दिखता; गुरु और शनि लगभग हमेशा पूर्ण दिखते हैं।
3. अस्त ग्रह का क्या मतलब है?
जब ग्रह सूर्य के बहुत पास होता है और उसकी चमक छिप जाती है। परंपरा में अस्त ग्रह को फल देने में कमज़ोर माना जाता है।
4. “मृत” अवस्था का ग्रह क्या अशुभ होता है?
नहीं। इसका मतलब केवल यह है कि राशि के अंतिम 6° में ग्रह अपना फल देने में कमज़ोर माना जाता है। इसका निर्णय अन्य बलों के साथ होता है।
5. 1 कला और 1 विकला कितने बड़े होते हैं?
1 कला = 1/60 अंश (arc-minute) और 1 विकला = 1/3600 अंश (arc-second)। राशि-चक्र 21,600 कला का है।
6. जन्म-समय में 5 मिनट की ग़लती से क्या फ़र्क़ पड़ता है?
लग्न लगभग 1° हर 4 मिनट चलता है। 5 मिनट में सवा अंश के आसपास बदल सकता है, जिससे नवांश (3°20′) या दशमांश जैसी वर्ग-कुंडलियाँ बदल सकती हैं।
7. षड्बल क्या सच में ग्रह की शक्ति बताता है?
यह ज्योतिष की परंपरागत गणना-पद्धति है, जो ग्रह की सापेक्ष स्थिति को छह तरह से आँकती है। वैज्ञानिक रूप से इसे प्रमाणित नहीं किया गया; इसे विश्लेषण का एक औज़ार समझें।
आगे पढ़ें: नवग्रह का खगोल-विज्ञान · 27 नक्षत्र: अंग, वृक्ष और जड़ी-बूटी · नव तारा चक्र · गुरु चांडाल योग · रत्नों का विज्ञान

Ajit Kumar Nath — AstroVgyaan ke sansthapak aur research lead. Inka vishwas hai ki gyan ka asli uddeshya seva hai — isliye inka kaam kabhi bhi vyaktigat consultation ya paid sessions tak simit nahi raha. Vedic Jyotish (Parashari Hora Shastra, Jaimini Sutram, Bhrigu Nandi Nadi), Lal Kitab, Vastu Shastra aur Ank Jyotish (Numerology) par varshon ka swatantra adhyayan aur shodh karke, unhe saral, imandaar aur research-aadharit lekhon ke roop mein sabke liye free upalabdh karana — yahi inka jeevan-uddeshya hai. Research aur collaboration ke liye: astrovgyaan@gmail.com






