आज आषाढ़ शुक्ल द्वितीया है। पुरी की बड़दांड (Grand Road) पर आज लाखों आँखें एक ही दिशा में देख रही हैं — सिंहद्वार की ओर। क्योंकि आज वह होता है जो संसार के किसी और मंदिर में नहीं होता: भगवान स्वयं अपना सिंहासन, अपना गर्भगृह, अपना रत्न-भंडार — सब छोड़कर बाहर निकल आते हैं। हम मंदिर जाते हैं भगवान से मिलने; पर साल में एक बार जगन्नाथ स्वयं चलकर आते हैं अपने भक्तों से मिलने — उनके लिए भी, जो कभी मंदिर की चौखट तक नहीं पहुँच सकते। इसीलिए उन्हें कहते हैं पतित पावन — गिरे हुए को भी पावन करने वाले। बड़दांड, पुरी — लेखक के camera से (16 July 2026 की रात्रि) 🛕 आँखों देखा हाल — यह लेखक स्वयं बड़दांड पर था (17 July update) कल रात प्रभु की कृपा से हम स्वयं पुरी में थे — रथों के ठीक सामने, दर्शन करते हुए। और इस वर्ष महाप्रभु ने अपनी लीला दिखा दी: पहले दिन रथ श्री गुंडिचा तक पहुँचे ही नहीं। बड़े भैया बलभद्र का तालध्वज कुछ आगे बढ़ा, देवी सुभद्रा का दर्पदलन उनके पीछे कुछ दूर चला — पर जगन्नाथ जी का नंदीघोष श्रीमंदिर से बाहर आकर वहीं ठहर गया। मानो प्रभु कह रहे हों — इतनी जल्दी क्या है? मैं तो भक्तों से मिलने निकला हूँ, एक रात उनके बीच बड़दांड पर ही रहूँगा। आज यात्रा पुनः आगे बढ़ेगी। रात की रोशनी में लाल-पीले वस्त्रों से सजा नंदीघोष, काठ के घोड़े, फूलों की झालरें, और भीड़ का “जय जगन्नाथ” का घोष — जो एक बार देख ले, जीवन भर नहीं भूलता। शास्त्र कहते हैं रथ पर विराजमान प्रभु का दर्शन पुनर्जन्म के बंधन काटता है — रथे तु वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते। कल वह दर्शन हुआ — यह लेख उसी अनुभव की ताज़गी में आपके लिए है। 📸 रथ यात्रा 2026 — बड़दांड से लेखक के camera की तस्वीरें सभी चित्र: AstroVgyaan (लेखक द्वारा स्वयं, पुरी बड़दांड — 16 July 2026 की रात्रि) — © astrovgyaan.com मैं ओडिशा की मिट्टी का हूँ — गंजाम का। हमारे यहाँ जगन्नाथ कोई दूर बैठे देवता नहीं हैं; वे घर के बड़े हैं। ओडिया घरों में लोग उन्हें “जग्गा” कहकर बुलाते हैं, उलाहना देते हैं, रूठते हैं, मनाते हैं। आज उसी अपनेपन के पर्व की गहराई में चलते हैं — रथ यात्रा केवल उत्सव नहीं है, यह वेदांत है जो सड़क पर उतर आया है। दारु ब्रह्म — वह मूर्ति जो अधूरी है, इसीलिए पूर्ण है जगन्नाथ की मूर्ति देखिए — न पूरे हाथ, न पैर, बड़ी-बड़ी गोल आँखें जो कभी झपकती नहीं। कथा है कि स्वयं विश्वकर्मा बूढ़े बढ़ई के रूप में मूर्ति गढ़ने आए थे, शर्त थी — 21 दिन तक कोई द्वार नहीं खोलेगा। रानी गुंडिचा से रहा नहीं गया, द्वार खुल गया, और मूर्तियाँ अधूरी रह गईं। राजा इंद्रद्युम्न व्याकुल हुए, तब आकाशवाणी हुई — मैं इसी रूप में पूजा जाऊँगा। इस कथा का अर्थ समझिए। भगवान ने अधूरा रूप स्वीकार किया — क्योंकि उनका हर भक्त भी अधूरा है। किसी के पास विद्या नहीं, किसी के पास धन नहीं, किसी का शरीर साथ नहीं देता, किसी का भाग्य। जगन्नाथ कहते हैं — अधूरे हो? आओ, मैं भी अधूरा हूँ। पूर्णता मूर्ति में नहीं, प्रेम में होती है। वे लकड़ी (दारु) के बने हैं — पत्थर या धातु के नहीं — क्योंकि दारु ब्रह्म जीवित है, हर 12-19 वर्ष में नवकलेवर होता है, देह बदलती है। आत्मा वही रहती है, शरीर बदल जाता है — गीता का यही श्लोक पुरी में मूर्ति बनकर खड़ा है। रथ ही शरीर है — कठोपनिषद का रहस्य जो सड़क पर उतरता है कठोपनिषद में यमराज नचिकेता से कहते हैं — आत्मानं रथिनं विद्धि, शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि, मनः प्रग्रहमेव च॥ आत्मा रथ का स्वामी है, शरीर रथ है, बुद्धि सारथी है और मन लगाम। इंद्रियाँ घोड़े हैं और विषय-मार्ग उनकी दौड़। अब रथ यात्रा देखिए — यह उपनिषद का जीवंत मंचन है। रथ (शरीर) तभी चलता है जब भक्त (श्रद्धा) उसे खींचते हैं। रस्सी (मन की लगाम) हज़ारों हाथों में है — यानी मन को साधना अकेले का नहीं, संगत का काम है। और रथ पर बैठे हैं स्वयं ब्रह्म — यानी इस शरीर-रथ की सारी दौड़ का अर्थ तभी है जब उस पर आत्मा-रूपी जगन्नाथ विराजमान हों। जिस दिन आपने अपने जीवन का रथ बिना जगन्नाथ के दौड़ाया, उस दिन वह रथ नहीं, बस भागती हुई लकड़ी है। तीन रथ, तीन शक्तियाँ सबसे आगे चलते हैं बड़े भाई बलभद्र — रथ तालध्वज (14 पहिए, लाल-हरा)। बीच में बहन सुभद्रा — रथ दर्पदलन (12 पहिए, लाल-काला), और सबसे पीछे जगन्नाथ — रथ नंदीघोष (16 पहिए, लाल-पीला, लगभग 45 फीट ऊँचा)। क्रम देखिए — आगे शक्ति (बलभद्र), बीच में भक्ति (सुभद्रा), पीछे स्वयं भगवान। अर्थात जीवन में पहले बल-पुरुषार्थ चलता है, बीच में श्रद्धा, और भगवान सबसे पीछे रहकर सबको देखते चलते हैं। दर्पदलन का अर्थ ही है — अहंकार को कुचलने वाला। बहन का रथ भाइयों के बीच — नारी की मर्यादा भी, और यह संदेश भी कि अहंकार का दलन स्नेह के बीच रहकर ही होता है। और फिर वह दृश्य जो हर राजा को छोटा कर देता है — छेरा पहँरा। पुरी के गजपति महाराज, जिनके पूर्वजों ने साम्राज्य चलाए, सोने की झाड़ू लेकर रथ के सामने का मार्ग बुहारते हैं। संदेश साफ है: जगन्नाथ के आगे राजा भी सेवक है। जिस दिन सत्ता को यह याद रहे कि वह जनता-जनार्दन की सफाई-सेवा के लिए है, उस दिन राज्य धर्म पर चलता है। नौ दिन मौसी के घर — और लौटते में रसगुल्ले की रिश्वत रथ गुंडिचा मंदिर जाते हैं — जनश्रुति में मौसी का घर। नौ दिन भगवान वहीं रहते हैं। सोचिए — ब्रह्मांड का स्वामी भी साल में एक बार ननिहाल-मौसी के घर जाता है! यह गृहस्थ जीवन की प्रतिष्ठा है: रिश्ते निभाना छोटा काम नहीं, स्वयं भगवान का आचरण है। बीच में हेरा पंचमी की मीठी लीला होती है — माँ लक्ष्मी रूठकर पहुँचती हैं कि मुझे छोड़कर क्यों गए, और नंदीघोष का एक कोना तोड़कर लौट जाती हैं। भगवान भी गृहस्थी के उलाहने से नहीं बचे — फिर हम-आप क्या हैं! बाहुड़ा यात्रा (इस वर्ष 24 July)