Ajit Kumar Nath

Ajit Kumar Nath — AstroVgyaan ke sansthapak aur research lead. Inka vishwas hai ki gyan ka asli uddeshya seva hai — isliye inka kaam kabhi bhi vyaktigat consultation ya paid sessions tak simit nahi raha. Vedic Jyotish (Parashari Hora Shastra, Jaimini Sutram, Bhrigu Nandi Nadi), Lal Kitab, Vastu Shastra aur Ank Jyotish (Numerology) par varshon ka swatantra adhyayan aur shodh karke, unhe saral, imandaar aur research-aadharit lekhon ke roop mein sabke liye free upalabdh karana — yahi inka jeevan-uddeshya hai. Research aur collaboration ke liye: astrovgyaan@gmail.com

Ajit Kumar Nath

Ajit Kumar Nath — Researcher, AstroVgyaan

Ajit Kumar Nath — AstroVgyaan ke sansthapak aur research lead. Inka vishwas hai ki gyan ka asli uddeshya seva hai — isliye inka kaam kabhi bhi vyaktigat consultation ya paid sessions tak simit nahi raha. Vedic Jyotish (Parashari Hora Shastra, Jaimini Sutram, Bhrigu Nandi Nadi), Lal Kitab, Vastu Shastra aur Ank Jyotish (Numerology) par varshon ka swatantra adhyayan aur shodh karke, unhe saral, imandaar aur research-aadharit lekhon ke roop mein sabke liye free upalabdh karana — yahi inka jeevan-uddeshya hai. Research aur collaboration ke liye: astrovgyaan@gmail.com

खिड़की के पास अकेला व्यक्ति सोच में खोया हुआ
Kundali Vishleshan

नशा क्यों छूटता नहीं — व्यसन की असली वजह, ज्योतिष और परिवार का सच

“नशा छूटता क्यों नहीं?” — घर वाले अक्सर इसे कमज़ोर इच्छाशक्ति या बुरी आदत समझ लेते हैं। पर सच्चाई यह है: व्यसन (addiction) एक दिमागी बीमारी है, चरित्र की कमज़ोरी नहीं। शराब, तंबाकू, गुटखा या ड्रग्स की लत में मस्तिष्क के “रिवॉर्ड सिस्टम” में सच में बदलाव आ जाता है — सिर्फ चाहने या डांटने से यह बदलाव पलट नहीं जाता। इस लेख में हम इसे विज्ञान, ज्योतिष की पारंपरिक समझ और परिवार के असली रोल — तीनों नज़रिए से देखेंगे। ज़रूरी सूचना: व्यसन एक चिकित्सीय स्थिति है, न कि नैतिक कमज़ोरी। इस लेख में ज्योतिष की जानकारी पारंपरिक समझ के लिए है — इलाज के लिए डॉक्टर और डी-एडिक्शन सेंटर ज़रूरी है, कुंडली या उपाय अकेले काफी नहीं। मैंने अपने वर्षों के अध्ययन में देखा है कि जो परिवार यह सवाल लेकर आते हैं, वे अक्सर एक ही गलती दोहराते हैं — वे सोचते हैं डांटने, शर्मिंदा करने या पैसे रोकने से लत छूट जाएगी। हकीकत इसके उलट है: जितना दबाव बढ़ता है, व्यक्ति उतना ही छुपकर नशा करने लगता है। समझ और सही इलाज — यही असली रास्ता है, डांट नहीं। विज्ञान क्या कहता है — दिमाग का “रिवॉर्ड सिस्टम” कैसे बिगड़ता है वैज्ञानिक शोध के अनुसार व्यसन का 40% से 70% हिस्सा जेनेटिक होता है — यानी कुछ लोगों का मस्तिष्क शुरू से ही नशे के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होता है। जब कोई बार-बार शराब, तंबाकू या ड्रग्स लेता है, तो मस्तिष्क के “न्यूक्लियस एकम्बंस” नामक हिस्से में डोपामीन का स्तर बार-बार तेज़ी से बढ़ता है। समय के साथ मस्तिष्क इस डोपामीन उछाल का “आदी” हो जाता है — और फिर सामान्य ज़िंदगी की खुशियाँ (खाना, हंसी, उपलब्धि) फीकी लगने लगती हैं, सिर्फ नशा ही राहत देता दिखता है। यही वजह है कि सिर्फ इच्छाशक्ति से लत छोड़ना बेहद मुश्किल होता है — दिमाग की बनावट ही बदल चुकी होती है। जेनेटिक्स अकेले काफी नहीं — ट्रिगर भी चाहिए। तनाव, सामाजिक दबाव, अकेलापन, या परिवार में पहले से किसी का व्यसनी होना — ये सब मिलकर जोखिम बढ़ाते हैं। यानी कोई “बुरा इंसान” होने की वजह से नशे का आदी नहीं बनता — दिमाग, जीन और हालात का एक साथ मेल इसकी वजह होता है। समाधान: व्यसन का इलाज सिर्फ “छोड़ने की कसम” से नहीं होता — इसके लिए चिकित्सीय डिटॉक्स, काउंसलिंग और ज़रूरत पड़ने पर दवा, तीनों मिलकर काम करते हैं। भारत सरकार का राष्ट्रीय नशा मुक्ति हेल्पलाइन 1800-11-0031 (24×7, टोल-फ्री) और AIIMS का राष्ट्रीय नशा निर्भरता उपचार केंद्र (NDDTC, ग़ाज़ियाबाद) मुफ़्त और भरोसेमंद विकल्प हैं। ज्योतिष में व्यसन — पारंपरिक दृष्टिकोण और ग्रह-योग वैदिक ज्योतिष में राहु को हर तरह के व्यसन का प्रमुख कारक ग्रह माना गया है — क्योंकि राहु का स्वभाव ही “हद से ज़्यादा” और “अतृप्त इच्छा” का है। साथ में शुक्र (भोग-विलास का कारक) और मंगल-शनि (आवेग और नकारात्मकता) भी भूमिका निभाते हैं। कुछ पारंपरिक संकेत: शुक्र-राहु युति: भोग-विलास का कारक शुक्र जब राहु के साथ हो, तो सुख की तलाश हद से ज़्यादा बढ़ने का पारंपरिक संकेत माना गया है। अष्टम भाव में पाप ग्रह: छुपे सुख और नशे का भाव माना गया अष्टम भाव, जब शनि या मंगल से पीड़ित हो, तो गुप्त आदतों की तरफ झुकाव बताया गया है। चंद्रमा पर राहु-शनि की पीड़ा: मन के कारक चंद्रमा पर जब राहु और शनि दोनों का असर हो, तो मानसिक बेचैनी को शांत करने के लिए किसी सहारे की तलाश का संकेत माना गया है। यहाँ एक ज़रूरी बात समझिए: राहु-शुक्र युति या अष्टम भाव में पाप ग्रह — ये संयोग असंख्य कुंडलियों में मिलते हैं, और उनमें से ज़्यादातर लोग कभी नशे के आदी नहीं बनते। कोई भी योग अकेले भविष्यवाणी नहीं है। असली वजह घर का माहौल, संगति, मानसिक स्वास्थ्य और उपलब्धता होती है — ग्रह सिर्फ स्वभाव की झलक देते हैं, भाग्य तय नहीं करते। अनकहा पहलू — परिवार अनजाने में लत को कैसे बढ़ावा देता है यह बात कोई आसानी से नहीं कहता, पर मैं हमेशा यही कहता हूं — जितना नुकसान नशा करता है, उतना ही नुकसान कई बार परिवार का “सब सामान्य दिखाने” का रवैया करता है। बार-बार कर्ज़ चुका देना, रिश्तेदारों से झूठ बोलना, नौकरी छूटने पर बहाना बनाना — इसे मनोविज्ञान में “एनेबलिंग” (enabling) कहा जाता है। परिवार प्यार में यह सब करता है, पर इसका असली नतीजा यह होता है कि व्यक्ति को अपने व्यवहार के परिणाम कभी महसूस ही नहीं होते, और लत जारी रहती है। सही सहारा देने का मतलब है साथ खड़े रहना, पर परिणामों से बचाना नहीं। यह फ़र्क समझना — शायद रिकवरी की सबसे ज़रूरी और सबसे कम समझी गई सीढ़ी है। 📞 मदद उपलब्ध है — छुपाना बंद कीजिए राष्ट्रीय नशा मुक्ति हेल्पलाइन: 1800-11-0031 (24×7, टोल-फ्री, गोपनीय) — निकटतम डी-एडिक्शन सेंटर से जुड़ने के लिए। AIIMS NDDTC, ग़ाज़ियाबाद द्वारा समर्थित। परिवार को क्या समझना चाहिए व्यसन को “बुरी आदत” नहीं, चिकित्सीय स्थिति मानें — यह नज़रिया इलाज की पहली सीढ़ी है। शर्मिंदा करना, तुलना करना या रिश्तेदारों में बदनाम करना — इससे लत नहीं छूटती, छुपाव बढ़ता है। कर्ज़ चुकाना या बहाने बनाना बंद करें — परिणामों से बचाना मदद नहीं, एनेबलिंग है। डी-एडिक्शन सेंटर और काउंसलिंग साथ में ज़रूरी हैं — अकेले संकल्प काफी नहीं। रिलैप्स (दोबारा शुरू होना) आम बात है — यह असफलता नहीं, इलाज का हिस्सा है, हिम्मत मत हारिए। अक्सर पूछे जाने वाले सवाल 1. क्या व्यसन सिर्फ इच्छाशक्ति से छूट सकता है?बहुत कम मामलों में। ज़्यादातर लोगों को चिकित्सीय डिटॉक्स और काउंसलिंग की ज़रूरत होती है, क्योंकि मस्तिष्क में सच में रासायनिक बदलाव आ चुका होता है। 2. क्या कुंडली देखकर पता चल सकता है कि बच्चा आगे नशे का आदी बनेगा?नहीं, ज़िम्मेदारी से नहीं। राहु-शुक्र योग जैसे संकेत बहुत आम हैं और भविष्यवाणी के लिए काफी नहीं — घर का माहौल और संगति कहीं बड़ी भूमिका निभाते हैं। 3. रत्न या उपाय से नशा छूट सकता है क्या?अकेले नहीं। उपाय मानसिक बल दे सकते हैं, पर डिटॉक्स और काउंसलिंग की जगह नहीं ले सकते। 4. रिलैप्स हो जाए तो क्या पूरा इलाज बेकार गया?नहीं। रिलैप्स आम है और इलाज की प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा माना जाता है — दोबारा कोशिश और सहारा ज़रूरी है। 5.

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अकेला व्यक्ति खिड़की के पास खोया हुआ सोच में
Kundali Vishleshan

कोई “पागल” क्यों पैदा होता है — मानसिक रोग की असली वजह, ज्योतिष और विज्ञान का सच

“कोई पागल क्यों पैदा होता है?” — यह सवाल ज़्यादातर लोग फुसफुसाकर पूछते हैं, क्योंकि हमारे समाज में इस शब्द के साथ शर्म जुड़ी हुई है। पर सच्चाई यह है: कोई इंसान “पागल” होकर पैदा नहीं होता — न कोई श्राप है, न पिछले जन्म का पाप। मानसिक रोग एक चिकित्सीय स्थिति है, जो जन्मजात भी हो सकती है और जीवन में बाद में भी विकसित हो सकती है, और इसके पीछे जेनेटिक्स, मस्तिष्क-रसायन और जीवन की परिस्थितियाँ होती हैं। इस लेख में हम इसे तीन नज़रियों से समझेंगे — विज्ञान, ज्योतिष की पारंपरिक व्याख्या, और सबसे ज़रूरी, परिवार को असल में क्या करना चाहिए। ज़रूरी सूचना: “पागलपन” एक पुराना, अपमानजनक लोक-शब्द है। चिकित्सा विज्ञान और भारत के मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 2017 में इसे “मानसिक रोग/मानसिक बीमारी” कहा जाता है — एक ऐसी स्वास्थ्य स्थिति जिसका इलाज संभव है, ठीक वैसे ही जैसे डायबिटीज़ या बीपी का। इस लेख में ज्योतिष की जानकारी सिर्फ पारंपरिक समझ के लिए है — निदान के लिए कुंडली नहीं, डॉक्टर ज़रूरी है। मैंने अपने वर्षों के अध्ययन में देखा है कि जो परिवार यह सवाल लेकर आते हैं, वे दरअसल एक गहरे डर से जूझ रहे होते हैं — “हमारी वजह से तो नहीं हुआ?”, “समाज क्या कहेगा?”, “क्या यह वंश में चलता रहेगा?” यह डर स्वाभाविक है, पर अक्सर यही डर परिवार को सही इलाज से दूर और झाड़-फूंक की तरफ धकेल देता है — जिसकी बात हम आगे खुलकर करेंगे। “पागलपन” नहीं — दो अलग स्थितियाँ जिन्हें समझना ज़रूरी है जब लोग “पागल” कहते हैं, तो असल में वे दो बिल्कुल अलग चिकित्सीय स्थितियों को एक साथ मिला देते हैं — यही सबसे बड़ी गलतफहमी है। जन्मजात बौद्धिक अक्षमता — यह जन्म से या बचपन में मस्तिष्क के विकास में आई रुकावट से होती है। कारण: डाउन सिंड्रोम जैसी क्रोमोसोमल समस्याएँ, फ्रेजाइल-X सिंड्रोम, गर्भावस्था में संक्रमण या कुपोषण, और जन्म के समय ऑक्सीजन की कमी (हाइपोक्सिक-इस्केमिक एन्सेफैलोपैथी)। बाद में विकसित मानसिक रोग — जैसे स्किज़ोफ्रेनिया, बायपोलर डिसऑर्डर, गंभीर डिप्रेशन। यह अक्सर किशोरावस्था या युवावस्था में शुरू होता है, जेनेटिक झुकाव + मस्तिष्क-रसायन (जैसे डोपामीन असंतुलन) + जीवन के तनाव के मेल से पैदा होता है। यह फ़र्क समझना क्यों ज़रूरी है? क्योंकि इलाज, सहारा और उम्मीद — तीनों अलग हैं। बौद्धिक अक्षमता में स्पेशल एजुकेशन और स्किल-ट्रेनिंग मदद करती है; मानसिक रोग में दवा और थेरेपी से बड़ी संख्या में लोग सामान्य जीवन जी पाते हैं। दोनों में एक बात सामान है — जितनी जल्दी सही मदद मिले, नतीजा उतना बेहतर होता है। विज्ञान क्या कहता है — जेनेटिक्स, मस्तिष्क-रसायन और ट्रिगर भारत में हुए आनुवंशिक अध्ययनों ने स्किज़ोफ्रेनिया से जुड़े कई जीन-वेरिएंट पहचाने हैं — जैसे एसटीटी3ए, एनआरजी1, जीआरएम7 — और तमिलनाडु के परिवारों पर हुए एक अध्ययन में क्रोमोसोम 1p31.1 पर एक स्पष्ट जेनेटिक लिंक मिला। शोध बताता है कि स्किज़ोफ्रेनिया जैसी स्थितियों में होने वाले अंतर का बड़ा हिस्सा जेनेटिक कारकों से जुड़ा है, जो करीब 1% आबादी को प्रभावित करता है। इसके साथ मस्तिष्क में डोपामीन नामक न्यूरोट्रांसमीटर के असंतुलन की भूमिका भी वैज्ञानिक रूप से स्थापित है। पर सिर्फ जीन काफी नहीं — ट्रिगर भी चाहिए। लंबा मानसिक तनाव, नींद की कमी, नशा, या कोई गहरा आघात अक्सर उस जेनेटिक झुकाव को सक्रिय कर देता है। यही वजह है कि दो भाई-बहन एक जैसे परिवार में पलकर भी अलग-अलग मानसिक सेहत पाते हैं — जेनेटिक्स सिर्फ संभावना बनाता है, निश्चितता नहीं। समाधान: मानसिक रोग के लक्षण दिखते ही — लगातार अजीब व्यवहार, वास्तविकता से कटाव, गहरी उदासी जो महीनों न जाए, नींद-भूख में भारी बदलाव — सबसे पहला कदम मनोचिकित्सक से मिलना है, न कि ओझा या तांत्रिक। समय पर दवा और थेरेपी से बड़ी संख्या में लोग स्कूल, नौकरी और रिश्ते सामान्य रूप से संभाल पाते हैं। ज्योतिष में मानसिक अस्वस्थता — पारंपरिक दृष्टिकोण और ग्रह-योग वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को “मनोकारक” माना गया है — मन, सोच और भावनाओं का कारक ग्रह। शास्त्रों में जिस स्थिति को “उन्माद” कहा गया, वह अकेले किसी एक ग्रह से नहीं, बल्कि कई कारकों के एक साथ बिगड़ने से बनती दिखाई गई है। तीन प्रमुख पारंपरिक संयोग इस प्रकार बताए गए हैं: ग्रहण योग: जब राहु या केतु चंद्रमा के साथ एक ही भाव में बैठें, और चंद्रमा पर कोई शुभ दृष्टि न हो — इसे मन पर “छाया” पड़ना कहा गया, यानी सोच में भ्रम, डर और अस्थिरता। चंद्र-शनि विष योग: चंद्रमा और शनि की युति, खासकर 6ठे, 8वें या 12वें भाव (दुस्थान) में — पारंपरिक रूप से मानसिक बेचैनी, गहरी उदासी और नकारात्मक सोच से जोड़ा गया है। पिशाच ग्रस्त योग: जब लग्न में चंद्र-राहु हों और त्रिकोण भावों में पाप ग्रह — इसे भय और मतिभ्रम जैसी स्थितियों से जोड़ा गया। यहाँ एक बहुत ज़रूरी सच समझिए: राहु-चंद्र युति, शनि-चंद्र युति या दुस्थान में पाप ग्रह — ये संयोग करोड़ों कुंडलियों में मिलते हैं, और उनमें से बड़ी संख्या के लोग पूरी तरह स्वस्थ, सामान्य जीवन जीते हैं। कोई भी योग अकेले “निदान” नहीं है। शास्त्रों में भी इन योगों के साथ हमेशा उपाय (मंत्र, दान, रत्न) बताए गए हैं — कभी भी सिर्फ “यह लाइलाज है” नहीं कहा गया। इसलिए कुंडली देखकर किसी को “यह मानसिक रूप से बीमार होगा” कहना न सही है, न ज़िम्मेदार जोतिषीय व्यवहार। अनकहा पहलू — जब झाड़-फूंक असली इलाज को महीनों पीछे धकेल देती है यह वह सच है जो कोई ज्योतिष वेबसाइट खुलकर नहीं कहती — पर मैं हमेशा यही कहता हूं: जब परिवार में किसी को मानसिक रोग के लक्षण दिखते हैं, तो अक्सर पहला कदम डॉक्टर नहीं, ओझा या तांत्रिक के पास जाना होता है। “ऊपरी हवा”, “भूत-प्रेत का साया”, “किसी की नज़र” — इन धारणाओं में इलाज में हफ़्तों-महीनों की देरी हो जाती है, और तब तक मरीज़ की स्थिति और बिगड़ चुकी होती है। स्किज़ोफ्रेनिया या गंभीर डिप्रेशन जैसी स्थितियों में हर हफ़्ते की देरी असर डालती है — मस्तिष्क में बदलाव जितनी जल्दी संभाले जाएं, रिकवरी उतनी बेहतर होती है। मैं एक ज्योतिष वेबसाइट चलाता हूं, फिर भी यहाँ साफ़ कहूंगा — कुंडली, मंत्र और उपाय मानसिक रोग का इलाज नहीं हैं। ये साथ में मानसिक बल और सहारा ज़रूर दे सकते

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गहरी सोच में डूबा एक युवक अपने बारे में सवाल करते हुए
Kundali Vishleshan

समलैंगिक होना क्यों होता है — ज्योतिष, विज्ञान और कानून का पूरा सच

“मैं समलैंगिक क्यों हूं — क्या यह कोई गलती है, क्या यह बदला जा सकता है?” — जवाब सीधा है: यह न कोई गलती है, न कोई बीमारी जिसे “ठीक” किया जाए। यह मानव यौन-प्रवृत्ति (sexual orientation) की एक स्वाभाविक विविधता है, जितनी पुरानी खुद मानव सभ्यता। ज़्यादातर जगहों पर इसका जवाब या तो चुप्पी में मिलता है या डर पैदा करने वाली भाषा में — पर असली समझ इससे कहीं गहरी और शांत है। इस लेख में हम इसे तीन नज़रियों से देखेंगे: भारत की ज्योतिष-परंपरा इसे कैसे वर्गीकृत करती है, आधुनिक विज्ञान क्या कहता है, और भारत में आज इसकी कानूनी व सामाजिक स्थिति क्या है। शुरुआत में ही स्पष्ट कर दें: समलैंगिकता कोई पाप, बीमारी या चुनी हुई “गलत आदत” नहीं है। 2018 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसे अपराध की श्रेणी से बाहर करते हुए यही कहा — यह वयस्कों के बीच सहमति से बना एक स्वाभाविक रिश्ता है, संविधान की गरिमा और निजता के अधिकार का हिस्सा। मैंने अपने वर्षों के अध्ययन में पाया है कि जो लोग यह सवाल लेकर आते हैं, वे असल में दो अलग-अलग डर लेकर आते हैं — एक खुद अपने बारे में उलझन का, और दूसरा परिवार को खोने का। मैं हमेशा कहता हूं: पहले डर का जवाब विज्ञान और खुद की समझ में है, दूसरे डर का हल परिवार से धैर्यपूर्ण बातचीत में — किसी उपाय या पूजा में नहीं। ज्योतिष में समलैंगिकता — पारंपरिक दृष्टिकोण और ग्रह-योग भारत की परंपरा में यौन-विविधता कोई नई या “पश्चिमी” अवधारणा नहीं — खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों में उकेरी गई मूर्तियां सदियों पुराना प्रमाण हैं कि इसे तब भी मानव जीवन के स्वाभाविक हिस्से के रूप में दर्शाया गया था। ज्योतिष में इसे भी उसी “तृतीय प्रकृति” वर्गीकरण के दायरे में रखा गया है जिसकी चर्चा हमने किन्नर/ट्रांसजेंडर विषय पर पहले की थी — यानी पुंस-प्रकृति और स्त्री-प्रकृति के अलावा एक तीसरी श्रेणी, जिसमें लिंग-पहचान और यौन-रुझान दोनों तरह की विविधताएं शामिल मानी गई हैं। लोकप्रिय ज्योतिष सामग्री में जो ग्रह-कारक अक्सर बताए जाते हैं, वे हैं: सप्तम भाव (रिश्तों का भाव), शुक्र (प्रेम व आकर्षण का कारक) और मंगल (शारीरिक ऊर्जा का कारक) — तीनों मिलकर किसी व्यक्ति के आकर्षण-स्वभाव को दर्शाते माने जाते हैं। जो विशिष्ट संयोग सबसे ज़्यादा बताया जाता है वह है: शुक्र का राहु-केतु के बीच नीच या दुर्बल स्थिति में होना, मंगल का सप्तम भाव में वक्री होना, और सप्तमेश (सप्तम भाव का स्वामी) भी वक्री होकर चंद्रमा पर राहु-केतु का प्रभाव लिए हो। ध्यान दें — यहां भी वही पैटर्न दोहराया गया है जो हमने तृतीय-प्रकृति विषय में देखा: कोई एक ग्रह नहीं, बल्कि 3-4 कारकों का एक साथ मिलना ज़रूरी बताया गया है। अब सबसे ज़रूरी बात: शुक्र का दुर्बल होना, मंगल का वक्री होना, या राहु-केतु का प्रभाव — ये सभी बेहद सामान्य ग्रह-स्थितियां हैं जो करोड़ों कुंडलियों में अलग-अलग वजहों से बनती हैं, जिनका इस विषय से कोई सीधा संबंध नहीं होता। मैं यह इसलिए बता रहा हूं ताकि पाठक समझें कि परंपरा ने इसे कैसे देखा — न कि इसलिए कि किसी को अपनी कुंडली में इन योगों को “सबूत” की तरह ढूंढना चाहिए। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने खुद 2018 के फैसले में कहा था कि इसका वैज्ञानिक/पारंपरिक कारण जो भी हो, वह इस बात को बदलता नहीं कि हर वयस्क को अपनी पहचान के साथ गरिमा से जीने का अधिकार है। विज्ञान क्या कहता है — जेनेटिक, हार्मोनल और मस्तिष्क-संरचना आधुनिक विज्ञान के मुताबिक यौन-रुझान (sexual orientation) किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई जैविक कारकों के मेल से बनता है: जेनेटिक कारक: जुड़वां भाई-बहनों पर हुए अध्ययनों में पाया गया है कि यौन-रुझान में आनुवंशिकता की एक भूमिका होती है, हालांकि कोई एक “gay gene” अकेले इसे तय नहीं करता — यह कई जीन के मेल का नतीजा माना जाता है। गर्भावस्था के दौरान हार्मोनल प्रभाव: माँ के गर्भ में भ्रूण के मस्तिष्क-विकास के दौरान हार्मोन के स्तर में होने वाले स्वाभाविक बदलाव भी एक भूमिका निभाते हैं — यह जन्म से पहले ही तय होने लगता है, न कि बाद में किसी “संगति” या “आदत” से। मस्तिष्क-संरचना अध्ययन: मस्तिष्क-स्कैन अध्ययनों में समलैंगिक और विषमलैंगिक व्यक्तियों के मस्तिष्क की कुछ संरचनाओं में अंतर मिले हैं, जो यह संकेत देते हैं कि यह एक गहरी जैविक वास्तविकता है, सतही चुनाव नहीं। दिलचस्प बात यह है कि जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में धारा 377 को आंशिक रूप से रद्द किया, तो कोर्ट ने साफ़ कहा कि यह वैज्ञानिक बहस — कि यह जन्मजात है या चुनाव — कानूनी अधिकार के लिए मायने ही नहीं रखती। कोर्ट के मुताबिक, चाहे यह जन्मजात हो या न हो, दो वयस्कों के बीच सहमति से बना कोई भी रिश्ता किसी और को नुकसान नहीं पहुंचाता, इसलिए यह संविधान के तहत सुरक्षा का हकदार है। यानी विज्ञान भले ही अलग-अलग व्याख्या दे, गरिमा का अधिकार दोनों ही स्थिति में बराबर है। भारत में कानूनी स्थिति — धारा 377 से नवतेज सिंह जौहर तक 2018 से पहले भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत समलैंगिक संबंधों को अपराध माना जाता था — यह कानून अंग्रेज़ों के ज़माने का था, भारत की अपनी परंपरा का नहीं। 6 सितंबर 2018 को सर्वोच्च न्यायालय ने नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ मामले में ऐतिहासिक फैसला देते हुए वयस्कों के बीच सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत गरिमा, समानता और निजता के अधिकार का उल्लंघन था। हालांकि, 17 अक्टूबर 2023 को सुप्रियो बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने 3:2 के बहुमत से समलैंगिक विवाह या सिविल यूनियन को कानूनी मान्यता देने से इनकार कर दिया — कोर्ट ने कहा कि विवाह कानून बनाना संसद का अधिकार-क्षेत्र है, अदालत का नहीं। यानी आज की तारीख़ में समलैंगिक संबंध अपराध नहीं है, पर समलैंगिक विवाह को अभी भारत में कानूनी मान्यता नहीं मिली है — यह ज़िम्मेदारी अब संसद पर है। अनकहा पहलू — जब मजबूरी में की गई शादी दोनों तरफ के जीवन तोड़ देती

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