Ajit Kumar Nath

Ajit Kumar Nath — AstroVgyaan ke sansthapak aur research lead. Inka vishwas hai ki gyan ka asli uddeshya seva hai — isliye inka kaam kabhi bhi vyaktigat consultation ya paid sessions tak simit nahi raha. Vedic Jyotish (Parashari Hora Shastra, Jaimini Sutram, Bhrigu Nandi Nadi), Lal Kitab, Vastu Shastra aur Ank Jyotish (Numerology) par varshon ka swatantra adhyayan aur shodh karke, unhe saral, imandaar aur research-aadharit lekhon ke roop mein sabke liye free upalabdh karana — yahi inka jeevan-uddeshya hai. Research aur collaboration ke liye: astrovgyaan@gmail.com

Ajit Kumar Nath

Ajit Kumar Nath — Researcher, AstroVgyaan

Ajit Kumar Nath — AstroVgyaan ke sansthapak aur research lead. Inka vishwas hai ki gyan ka asli uddeshya seva hai — isliye inka kaam kabhi bhi vyaktigat consultation ya paid sessions tak simit nahi raha. Vedic Jyotish (Parashari Hora Shastra, Jaimini Sutram, Bhrigu Nandi Nadi), Lal Kitab, Vastu Shastra aur Ank Jyotish (Numerology) par varshon ka swatantra adhyayan aur shodh karke, unhe saral, imandaar aur research-aadharit lekhon ke roop mein sabke liye free upalabdh karana — yahi inka jeevan-uddeshya hai. Research aur collaboration ke liye: astrovgyaan@gmail.com

चांद बावड़ी (आभानेरी) की ज्यामितीय सीढ़ियाँ — वापी वास्तु उदाहरण
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जलाशय निर्माण — कुआं, तालाब, बावड़ी का वास्तु

राजस्थान की चांद बावड़ी में उतरती हुई 3,500 सीढ़ियाँ देखकर हर कोई चकित रह जाता है — पर क्या आप जानते हैं कि इस अद्भुत संरचना का हर स्तर, हर कोण एक निश्चित वास्तु-गणना के अनुसार बनाया गया था? प्राचीन भारत में जल-संरचनाओं का निर्माण मनमाना नहीं, बल्कि अत्यंत वैज्ञानिक एवं शास्त्रोक्त पद्धति से होता था। अपराजित-पृच्छा जैसे ग्रंथों में कूप (कुआं), वापी (बावड़ी), कुण्ड और तडाग (तालाब) — चारों प्रकार की जल-संरचनाओं के लिए पृथक-पृथक वर्गीकरण, आकार-गणना एवं निर्माण-नियम दिए गए हैं। इस अध्याय में हम इन्हीं नियमों को विस्तार से समझेंगे। जलाशयों का महत्व — जीवनदायिनी संरचनाएँ मनुस्मृति में राजा को यह आदेश दिया गया है कि वह दो गाँवों की सीमा पर बड़े जलाशय (तडाग) अवश्य बनवाए, ताकि प्रजा को जल-संकट न हो। यह केवल एक प्रशासनिक कर्तव्य नहीं, अपितु धार्मिक पुण्य-कार्य भी माना जाता था — वापी-कूप-तडाग-प्रतिष्ठा (जल-संरचनाओं की स्थापना एवं प्राण-प्रतिष्ठा) को स्वयं एक धार्मिक अनुष्ठान का दर्जा प्राप्त था, जिसका उल्लेख हयशीर्ष-पांचरात्र जैसे ग्रंथों में भी मिलता है। भारत के लगभग हर क्षेत्र में — चाहे वह जल-प्रचुर हो या मरुस्थलीय — जल-संरचनाओं का निर्माण वास्तु-विज्ञान का एक केंद्रीय अंग रहा है। शास्त्रों में जल-संरचनाओं को मुख्यतः चार वर्गों में बाँटा गया है — कूप (गहरा गोल कुआं), वापी (सीढ़ीदार बावड़ी), कुण्ड (धार्मिक स्नान-कुंड) और तडाग (विशाल तालाब)। प्रत्येक वर्ग के भीतर आकार, आकृति व उपयोग के अनुसार अनेक उप-प्रकार निर्धारित किए गए हैं, जिन्हें आगे विस्तार से देखेंगे। कूप (कुआं) — दस प्रकार एवं आकार-मान अपराजित-पृच्छा में कूप के दस प्रकार बताए गए हैं, जो आकार के अनुसार क्रमबद्ध हैं — श्रीमुख, विजय, प्रान्त, दुन्दुभि, मनोहर, चूड़ामणि, दिग्भद्र, जय, नंद और शंकर। इनमें सबसे छोटा श्रीमुख 4 हस्त (लगभग 6 फीट) व्यास का होता है, जबकि सबसे बड़ा शंकर प्रकार 13 हस्त (लगभग 19-20 फीट) व्यास तक पहुँचता है — प्रत्येक प्रकार के बीच का अंतर एक निश्चित माप-वृद्धि के अनुसार तय है। शास्त्र स्पष्ट करता है कि सभी कूप वृत्ताकार (गोल) आकृति में ही बनाए जाने चाहिए, तथा जिन जल-संरचनाओं का व्यास इस न्यूनतम मान से कम हो, उन्हें कूप नहीं बल्कि कूपिका (लघु कुआं) कहा जाता है। कूप का गोल आकार केवल सौंदर्य के लिए नहीं, अपितु संरचनात्मक स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण माना गया है — वृत्ताकार दीवार पर मिट्टी का दबाव समान रूप से वितरित होता है, जिससे धँसाव व दरार की संभावना घटती है। यह सिद्धांत आधुनिक सिविल इंजीनियरिंग में भी मान्य है। वापी (बावड़ी) — चार प्रकार एवं स्तरीय संरचना वापी अर्थात सीढ़ीदार बावड़ी, भारतीय जल-वास्तु की सर्वाधिक भव्य अभिव्यक्ति मानी जाती है। अपराजित-पृच्छा में वापी के चार प्रकार बताए गए हैं, जो प्रवेश-मुखों (वक्त्र) एवं स्तरों (कूट) की संख्या के अनुसार वर्गीकृत हैं: नंदा वापी: एक-वक्त्रा (एक ही ओर से प्रवेश) एवं त्रि-कूटा (तीन स्तरीय संरचना) — सबसे सरल प्रकार। भद्रा वापी: द्वि-वक्त्रा (दो ओर से प्रवेश) एवं षट्-कूटा (छह स्तरीय संरचना)। जया वापी: त्रि-वक्त्रा (तीन ओर से प्रवेश) एवं नव-कूटा (नौ स्तरीय संरचना)। विजया वापी: चतुर्-वक्त्रा (चारों ओर से प्रवेश) एवं द्वादश-कूटा (बारह स्तरीय संरचना) — सबसे भव्य एवं जटिल प्रकार, जिसमें चारों दिशाओं से सीढ़ियाँ केंद्रीय जल-स्रोत तक उतरती हैं। मयमतम् ग्रंथ के 74वें अध्याय में भी वापी के इन्हीं चार प्रकारों — नंद, भद्र, जय, विजय — का उल्लेख मिलता है, जो अपराजित-पृच्छा के वर्गीकरण से गहराई से मेल खाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि यह वर्गीकरण भारत के विभिन्न शास्त्रीय ग्रंथों में एक समान रूप से मान्य रहा। प्रसिद्ध ऐतिहासिक वापियाँ भारत में आज भी अनेक ऐतिहासिक बावड़ियाँ इस शास्त्रोक्त परंपरा की जीवंत गवाह हैं। पाटण (गुजरात) की रानी की वाव, जिसे रानी उदयमती ने 11वीं सदी में अपने पति राजा भीमदेव प्रथम की स्मृति में बनवाया, सात स्तरों में विष्णु के दशावतार एवं अन्य देव-मूर्तियों की अद्भुत नक्काशी के लिए यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित है — यह विजया वापी के भव्य स्वरूप का उदाहरण मानी जाती है। आभानेरी (राजस्थान) की चांद बावड़ी, जो 9वीं सदी में राजा चंद्र द्वारा निर्मित मानी जाती है, 13 स्तरों व लगभग 3,500 सीढ़ियों के साथ भारत की सबसे गहरी व बड़ी बावड़ियों में गिनी जाती है। गांधीनगर के निकट आदलज की बावड़ी, जो 1498 में रानी रूदाबाई द्वारा बनवाई गई, हिंदू, जैन व इस्लामी वास्तु-शैलियों के सुंदर संगम के लिए प्रसिद्ध है। कुण्ड — धार्मिक स्नान-जलाशय कुण्ड, वापी से भिन्न एक विशेष श्रेणी की जल-संरचना है जो मुख्यतः धार्मिक स्नान व अनुष्ठानों के लिए बनाई जाती थी। शास्त्रों में कुण्ड के चार प्रकार बताए गए हैं — भद्रक, सुभद्रक, नंद और परिघ। इनकी विशेषता यह है कि इनके चारों ओर अनेक उप-संरचनाएँ (जैसे छोटी देव-प्रतिमाओं के लिए ताखे व मंडप) तथा अनेक देवताओं की स्थापना व प्राण-प्रतिष्ठा की विस्तृत व्यवस्था होती है — यह इन्हें सामान्य कुओं व तालाबों से अलग करता है। मंदिर-परिसरों के भीतर या निकट बनने वाले पवित्र स्नान-कुंड (जैसे मंदिर-तालाब या temple tank की परंपरा) इसी श्रेणी में आते हैं, जिसका उल्लेख मॉड्यूल 7 में मंदिर-वास्तु के संदर्भ में भी हुआ था। तडाग — विशाल तालाब के छह प्रकार तडाग अर्थात बड़ा तालाब, धर्मशास्त्र में एक हजार वर्ग गज (square yards) से बड़े जल-संग्रहण-क्षेत्र को कहा गया है। मनुस्मृति में स्पष्ट आदेश है कि राजा को दो गाँवों की सीमा पर ऐसे विशाल तडाग बनवाने चाहिए। आकृति के अनुसार तडाग के छह प्रकार बताए गए हैं: सर: अर्ध-चंद्राकार आकृति में। महासर: पूर्ण वृत्ताकार आकृति में। भद्रक: वर्गाकार आकृति में। सुभद्र: अतिरिक्त भद्रा (कोनों पर उभार) युक्त आकृति में। परिघ: एक ओर बक-पंक्ति (बगुलों के बैठने योग्य तटीय संरचना) के साथ। युग्म-परिघ: दोनों तटों पर बक-पंक्ति (पक्षियों के लिए तटीय विश्राम-स्थल) के साथ, जो जैव-विविधता को भी बढ़ावा देती है। यह वर्गीकरण दर्शाता है कि प्राचीन जल-वास्तु में केवल मानवीय आवश्यकता ही नहीं, अपितु पक्षियों व अन्य जीवों के लिए भी तालाब की परिधि पर उपयुक्त संरचना बनाने का ध्यान रखा जाता था — एक प्रकार की प्राचीन पारिस्थितिक (ecological) सोच। 💧 घर में जल-स्रोत की सही दिशा जानें जैसे प्राचीन जलाशयों का निर्माण सटीक वास्तु-नियमों से होता था, वैसे ही आपके घर के जल-स्रोत (बोरवेल, टंकी, नल) की सही दिशा भी समृद्धि तय करती है। अपनी विस्तृत कुंडली रिपोर्ट से जानें अपने भवन व जीवन से जुड़े

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चित्तौड़गढ़ दुर्ग की प्राचीन दीवारें — गिरि दुर्ग वास्तु उदाहरण
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दुर्ग/किला निर्माण के नियम — वास्तु के अनुसार

क्या आपने कभी सोचा है कि चित्तौड़गढ़, रणथंभौर या गागरोन जैसे दुर्ग सैकड़ों वर्षों तक अजेय क्यों बने रहे? इसका उत्तर सिर्फ ऊँची दीवारों में नहीं, बल्कि उस सूक्ष्म वास्तु-विज्ञान में छिपा है जिसके अनुसार प्राचीन भारत में दुर्ग-निर्माण किया जाता था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दुर्ग को राज्य के सप्तांग (सात अंगों) में से एक अनिवार्य अंग माना गया है — बिना सुदृढ़ दुर्ग के न राजा सुरक्षित, न प्रजा, न राज्य-कोष। इस अध्याय में हम दुर्ग वास्तु के प्रकार, स्थल-चयन के सिद्धांत, बहु-स्तरीय सुरक्षा-व्यवस्था और आंतरिक बसावट की योजना को विस्तार से समझेंगे। दुर्ग वास्तु का महत्व — राज्य का सप्तम अंग कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य के सात अंग बताए गए हैं — स्वामी (राजा), अमात्य (मंत्री), जनपद (राष्ट्र), दुर्ग (किला), कोष (खजाना), दंड (सेना) और मित्र (सहयोगी)। इनमें दुर्ग का स्थान केंद्रीय है, क्योंकि यही वह सुरक्षा-कवच है जो शेष छह अंगों — राजा के प्राण, मंत्रियों की सभा, कोष की संपदा और सेना के शस्त्रागार — को शत्रु से बचाता है। शुक्रनीति में भी कहा गया है कि जिस राज्य में सुदृढ़ दुर्ग नहीं, वह राज्य वैसे ही असुरक्षित है जैसे बिना कवच का योद्धा। दुर्ग केवल सैन्य संरचना नहीं थी — यह एक सम्पूर्ण नगर-व्यवस्था थी जिसमें राजमहल, प्रशासनिक भवन, मंदिर, बाज़ार, जलाशय और आवासीय क्षेत्र एक निश्चित वास्तु-योजना के अनुसार बसाए जाते थे। युद्धकाल में यही दुर्ग पूरे राज्य की अंतिम शरणस्थली बनता था, इसलिए इसका वास्तु-विन्यास अत्यंत बारीकी से तय किया जाता था। दुर्ग के प्रकार — भूभाग के अनुसार वर्गीकरण कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भूभाग की प्रकृति के अनुसार दुर्ग के चार मुख्य प्रकार बताए गए हैं। शुक्रनीति में यह वर्गीकरण और विस्तृत होकर नौ प्रकारों तक पहुँचता है। दोनों वर्गीकरणों को समझना ज़रूरी है क्योंकि राजस्थान के प्रसिद्ध दुर्ग आज भी इन्हीं श्रेणियों के जीवंत उदाहरण हैं। कौटिल्य के अनुसार चार प्रकार जलदुर्ग (Water Fort): चारों ओर या अधिकांश भाग में जल — नदी, समुद्र या विशाल जलाशय — से घिरा दुर्ग। शत्रु-सेना के लिए जल-मार्ग पार करना अत्यंत कठिन होता था। राजस्थान में गागरोन दुर्ग (झालावाड़) इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जो आहू और काली सिंध नदियों के संगम पर तीन ओर से जल से घिरा है। गिरिदुर्ग (Hill Fort): ऊँची पहाड़ी या पठार पर बना दुर्ग, जहाँ पहुँचना ही शत्रु के लिए बड़ी चुनौती होती थी। चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़, रणथंभौर और जैसलमेर जैसे भारत के सबसे प्रसिद्ध दुर्ग इसी श्रेणी में आते हैं। चित्तौड़गढ़ भारत का सबसे बड़ा दुर्ग परिसर है, जो लगभग 180 मीटर ऊँची पहाड़ी पर लगभग 700 एकड़ क्षेत्र में फैला है। वनदुर्ग (Forest Fort): घने जंगल, कंटीली झाड़ियों और दुर्गम वनस्पति से घिरा दुर्ग, जहाँ शत्रु-सेना का मार्ग खोजना और रसद पहुँचाना दुष्कर होता था। शेरगढ़ दुर्ग (बारां) इसका उदाहरण माना जाता है, जो घने जंगलों के बीच स्थित है। धान्वदुर्ग (Desert Fort): जल-रहित, मरुस्थलीय या शुष्क भूभाग में बना दुर्ग, जहाँ आक्रमणकारी सेना के लिए जल और रसद की आपूर्ति अत्यंत कठिन हो जाती थी। जैसलमेर दुर्ग को थार मरुस्थल में स्थित होने के कारण इस श्रेणी का भी उदाहरण माना जाता है, यद्यपि यह पहाड़ी पर भी स्थित है इसलिए इसे गिरि-धान्व मिश्रित दुर्ग भी कहा जा सकता है। शुक्रनीति के अनुसार नौ प्रकार शुक्रनीति में दुर्ग-वर्गीकरण को अधिक सूक्ष्मता से नौ भागों में बाँटा गया है — एरण (मिट्टी-टीले पर), पारिख (गहरी खाई से घिरा), वन (सघन वन-सुरक्षित), धान्वन (मरुस्थलीय), जल (जलाशय-सुरक्षित), गिरि (पर्वतीय), सैन्य (सेना द्वारा सतत रक्षित शिविर-दुर्ग), सहाय (मित्र-राज्यों की सहायता से सुरक्षित) और मिश्र (उपरोक्त दो या अधिक प्रकारों का संयोजन)। भैंसरोड़गढ़ दुर्ग (चित्तौड़गढ़ ज़िला) मिश्र-दुर्ग का सुंदर उदाहरण है — यह चंबल और बामनी नदियों के संगम पर एक ऊँची चट्टान पर बना है, जो इसे एक साथ गिरिदुर्ग और जलदुर्ग दोनों बनाता है। शास्त्रों में मिश्र-दुर्ग को सर्वाधिक सुरक्षित माना गया है क्योंकि इसमें एक से अधिक प्राकृतिक बाधाएँ शत्रु के मार्ग में आती हैं। दुर्ग स्थल चयन के सिद्धांत दुर्ग के लिए स्थल-चयन एक अत्यंत सावधानीपूर्ण प्रक्रिया थी। शास्त्रों के अनुसार आदर्श दुर्ग-स्थल में निम्न विशेषताएँ अनिवार्य मानी गई हैं — पर्याप्त ऊँचाई या प्राकृतिक बाधा जो शत्रु की दृष्टि और गति दोनों को सीमित करे, स्वच्छ एवं प्रचुर जल-स्रोत जो दीर्घकालीन घेराबंदी में भी सूखे नहीं, उपजाऊ आसपास की भूमि जो युद्धकाल में खाद्यान्न की आपूर्ति दे सके, तथा दृढ़ भूमि जो भारी प्राचीर और भवनों का भार सह सके। दलदली, अत्यधिक चट्टानी या भूकंप-प्रवण भूमि को वर्जित माना गया है। कौटिल्य विशेष रूप से इस बात पर बल देते हैं कि दुर्ग-स्थल ऐसा हो जहाँ से राज्य के प्रमुख मार्गों, व्यापारिक पथों और सीमावर्ती क्षेत्रों पर निगरानी रखी जा सके। यही कारण है कि अधिकांश ऐतिहासिक दुर्ग व्यापार-मार्गों या नदी-घाटियों के प्रवेश-बिंदुओं पर स्थित मिलते हैं — यह केवल सुरक्षा ही नहीं, आर्थिक नियंत्रण की भी रणनीति थी। सुरक्षा-रिंग व्यवस्था — खाई, प्राचीर एवं बुर्ज कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दुर्ग की सुरक्षा-व्यवस्था को अत्यंत बारीक तकनीकी विवरण के साथ बताया गया है। यह एक बहु-स्तरीय, संकेंद्रित (concentric) रक्षा-प्रणाली थी जिसमें बाहर से भीतर की ओर खाई, प्राचीर, कँगूरे (parapet) और बुर्ज (watch-tower) क्रमिक रूप से रखे जाते थे। त्रि-स्तरीय खाई (परिखा) व्यवस्था दुर्ग की दीवार के चारों ओर तीन समानांतर खाइयाँ खोदी जाती थीं, जिनकी चौड़ाई क्रमिक रूप से घटती थी — सबसे बाहरी खाई 14 दण्ड चौड़ी, मध्य खाई 12 दण्ड चौड़ी, और सबसे भीतरी खाई 10 दण्ड चौड़ी रखी जाती थी (एक दण्ड लगभग 1.8-2 मीटर के बराबर माना जाता है)। तीनों खाइयों के बीच 1 दण्ड की दूरी छोड़ी जाती थी, जिस पर कंटीली झाड़ियाँ या बाँस लगाए जाते थे ताकि शत्रु-सैनिक खाइयों के बीच खड़े होकर भी सुरक्षित न रह सकें। इन खाइयों में जल भरा जाता था या इन्हें शुष्क रखकर उनमें नुकीले कीलें व शूल गाड़े जाते थे — दोनों ही स्थिति में शत्रु के लिए इन्हें पार करना अत्यंत जोखिमपूर्ण होता था। प्राचीर (रैम्पार्ट) निर्माण खाइयों के भीतर मुख्य प्राचीर बनाई जाती थी, जिसकी विशिष्टता कौटिल्य ने 6 दण्ड ऊँची और 12 दण्ड चौड़ी आधार पर बताई है — अर्थात ऊँचाई से दोगुनी चौड़ाई, जिससे प्राचीर स्थिर व दृढ़ रहे। इसका निर्माण मिट्टी को हाथियों से रौंदकर सघन बनाया जाता था (गजाभिघट्टित मृत्तिका), और परतों के

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नगर निर्माण — मार्ग, वीथी, राजधानी का वास्तु

गाँव की सड़कें छोटी और सीमित होती हैं, लेकिन जब वही बसावट एक बड़े नगर या राजधानी में बदलती है, तो मार्गों की एक पूरी पदानुक्रमित व्यवस्था खड़ी करनी पड़ती है — चौड़ाई, दिशा, उपयोग और यहाँ तक कि यातायात के प्रकार तक तय करने वाली। इस अध्याय में हम शिल्पशास्त्र की मार्ग-वीथी शब्दावली, सड़कों की मानक चौड़ाई, और राजधानी नगर में राजमहल तथा व्यवसायों की बसावट कैसे तय होती थी — इन सबको विस्तार से समझेंगे। सड़कों का त्रिविध कार्य प्राचीन स्थपतियों (नगर-वास्तुकारों) की दृष्टि में सड़कें केवल आवागमन का साधन नहीं थीं। शिल्पशास्त्र इन्हें तीन कार्यों में बाँटता है — पहला, यातायात के लिए राजमार्ग; दूसरा, भवन-भूखंडों की सीमा तय करने वाला उपकरण (पद-विन्यास इसी सड़क-योजना पर आधारित होता था); और तीसरा, स्वच्छता एवं मुक्त वायु-संचार की धमनी। इसीलिए सड़क-योजना को पद-विन्यास (भूखंड-विभाजन) से पहले नहीं, बल्कि उसी के साथ एक समन्वित प्रक्रिया माना गया। वीथी शब्दावली — मार्गों के शास्त्रीय नाम मयमत एवं मानसार में हर प्रकार के मार्ग का एक अलग शास्त्रीय नाम है, जो उसकी दिशा, बनावट अथवा उपयोग को दर्शाता है: राजपथ — पूर्व से पश्चिम चलने वाला प्रमुख मार्ग। राजवीथी — जिसके दोनों छोरों पर द्वार लगे हों। संधिवीथी — जिसमें अन्य मार्गों के संधि-स्थल (जंक्शन) आते हों। महाकाल अथवा वामन — दक्षिण दिशा में स्थित मार्ग। मंगलवीथी — गाँव अथवा नगर का पूरा चक्कर लगाने वाली परिधि-सड़क, चौड़ाई 1 से 5 दंड तक। ब्रह्मवीथी — केंद्र (ब्रह्मस्थान) से होकर गुज़रने वाला मार्ग, जिसे सड़क-जाल की “नाभि” कहा गया है — यह सीधे अध्याय 3.6 में पढ़े गए ब्रह्मस्थान के महत्व से जुड़ता है। नाराचपथ — आड़े द्वारों (transverse doors) से युक्त मार्ग। वामनपथ — उत्तर दिशा की ओर मुख किए, द्वार व अर्गला से सुसज्जित अपेक्षाकृत संकरे मार्ग। इन सभी में राजपथ एवं राजवीथी सबसे प्रमुख माने जाते थे — इन्हीं के सहारे राष्ट्रीय राजमार्गों से नगर का सीधा जुड़ाव होता था। ध्यान देने योग्य है कि तिरछे (विकर्ण) मार्ग शास्त्रों में सामान्यतः वर्जित थे — केवल पहाड़ी क्षेत्रों जैसी विवशता में ही विकर्ण मार्ग स्वीकार किए जाते थे, अन्यथा सभी सड़कें पूर्व-पश्चिम अथवा उत्तर-दक्षिण दिशा में सीधी रखी जाती थीं। सड़कों की चौड़ाई एवं यातायात-पृथक्करण देवी पुराण के अनुसार राजमार्ग की चौड़ाई 10 धनुष (लगभग 40 हाथ) होनी चाहिए, ताकि मनुष्य, घोड़े, हाथी और वाहन बिना किसी रुकावट के स्वतंत्र रूप से आ-जा सकें। इसी क्रम में देश-मार्ग (देश को जोड़ने वाली सड़क) 30 धनुष, ग्राम-मार्ग 20 धनुष, और सीमा-मार्ग केवल 10 धनुष चौड़ा रखने का निर्देश मिलता है — यानी मार्ग जितना बड़ा क्षेत्र जोड़ता, उतना ही अधिक चौड़ा होना अनिवार्य था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में एक और दिलचस्प व्यवस्था मिलती है — रथों के लिए अलग मार्ग, पशुओं (गाय-भैंस) के लिए अलग, हाथियों के लिए अलग, और छोटे चतुष्पदों तथा पैदल मनुष्यों के लिए अलग मार्ग बनाने का निर्देश था। यानी आज की “यातायात पृथक्करण” (traffic segregation) की अवधारणा — जिसे हम आधुनिक शहरी योजना में नई मानते हैं — भारत में 2,000 वर्ष से भी पुरानी परंपरा है। समरांगण सूत्रधार के अनुसार एक आदर्श नगर में कुल 34 मार्ग होते — 17 पूर्व-पश्चिम एवं 17 ही उत्तर-दक्षिण दिशा में — जिसमें राजमार्ग (केंद्रीय मुख्य पथ, नगर के आकार अनुसार 24/20/16 हाथ चौड़ा), दो महारथ्या (बड़े रथ-मार्ग), चार यानमार्ग (वाहन-पथ, हर एक के दोनों ओर जंघापथ यानी पैदल-पथ सहित), और दो घंटामार्ग (परकोटे के सहारे चलने वाले मार्ग) शामिल थे। सड़कें बीच में कछुए की पीठ जैसी उठी हुई बनाई जातीं और कंकड़-बजरी से मज़बूत की जातीं, तथा दोनों ओर जल-निकासी नालियाँ होतीं। नगर-वर्गीकरण — मार्ग-संख्या के अनुसार मयमत ग्रंथ में सड़कों की संख्या के अनुसार नगरों को क्रमिक रूप से वर्गीकृत किया गया है — छोटे दंडक नगर से शुरू होकर बड़े नगरों तक। जैसे-जैसे मार्गों की संख्या बढ़ती जाती (1 से 11 तक), नगर का आकार, महत्व और सामाजिक जटिलता भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती। इसी क्रम के अंतिम, सबसे विशाल प्रकार राजधानी और साम्राज्य-मुख्यालय के लिए आरक्षित थे — जिनकी चर्चा अगले भाग में करेंगे। राजधानी नगर की विशेष व्यवस्था साम्राज्य-मुख्यालय वाले नगर को “जयांग” कहा गया है — इसमें पूर्व-पश्चिम 9 एवं उत्तर-दक्षिण 9 मार्गों का सघन जाल होता, चार दिशाओं में चार मुख्य द्वार तथा चार कोनों पर चार अतिरिक्त द्वार होते। इससे भी बड़ा “विजय” नगर होता, जिसमें 10×10 मार्ग होते और जहाँ राजकीय दुर्ग स्थापित किया जाता। सबसे बड़ा और सर्वोच्च वर्ग “सर्वतोभद्र” नगर का है — 11×11 मार्गों वाला यह नगर राजधानी के लिए आदर्श माना गया, जिसमें राजमहल केंद्रीय ब्रह्मस्थान को छोड़कर कहीं भी बनाया जा सकता था (ब्रह्मस्थान को अछूता रखने का यही सिद्धांत हमने अध्याय 3.6 में घर एवं मंदिर दोनों के लिए देखा था)। राजमहल के सामने एक विशाल प्रांगण होता जहाँ अंतःपुर (रनिवास) स्थित होता। सर्वतोभद्र नगर में पूर्व दिशा की ओर जाने वाला प्रमुख मार्ग “राजवीथी” कहलाता, और उसके दोनों किनारों पर धनी वर्ग के भवन बनाए जाते, उनके निकट व्यापारियों की बस्ती, दक्षिण में बुनकर और उत्तर में बढ़ई/रथकार (पहिया बनाने वाले कारीगर) बसाए जाते — यानी राजवीथी के सहारे ही पूरे नगर का व्यावसायिक मानचित्र तय होता था। जयपुर शहर, जिसे महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 18वीं सदी में शास्त्रोक्त नगर-योजना के आधार पर बसाया, आज भी इस चौकोर (चेसबोर्ड जैसी) ग्रिड-प्रणाली का सबसे प्रसिद्ध जीवंत उदाहरण है — जहाँ राजपथ, वीथियाँ एवं केंद्रीय राजमहल परिसर आज भी उसी शास्त्रीय खाके में मौजूद हैं। सड़क-सौंदर्य एवं मनोवैज्ञानिक सिद्धांत शास्त्रकारों ने केवल यातायात ही नहीं, सड़क के सौंदर्य-मनोविज्ञान पर भी ध्यान दिया। लंबी सीधी सड़क पर देखने वाले की आँख को कहीं टिकने के लिए कुछ चाहिए होता है — इसीलिए मार्गों के मध्य-बिंदुओं और चौराहों पर मंदिर, स्तंभ अथवा ऊँचे वृक्ष लगाने का निर्देश मिलता है, तथा इन चौराहों पर सभा-भवन जैसी सार्वजनिक इमारतें बनाई जातीं। भवनों की कतारें भी एक-दूसरे से सुसंगत रखी जातीं, जिसका उदाहरण रामायण में वर्णित अयोध्या नगरी में मिलता है। 🛣️ अपने भूखंड की सड़क-दिशा का वास्तु जानना चाहते हैं? हमारे वास्तु विशेषज्ञों से परामर्श लें और समझें कि मुख्य सड़क, कोने का प्लॉट अथवा टी-जंक्शन का आपके भवन पर वास्तु प्रभाव क्या होता है। अभी परामर्श बुक करें → सामान्य प्रश्न (FAQ) राजपथ और राजवीथी

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