Ajit Kumar Nath

Ajit Kumar Nath — AstroVgyaan ke sansthapak aur research lead. Inka vishwas hai ki gyan ka asli uddeshya seva hai — isliye inka kaam kabhi bhi vyaktigat consultation ya paid sessions tak simit nahi raha. Vedic Jyotish (Parashari Hora Shastra, Jaimini Sutram, Bhrigu Nandi Nadi), Lal Kitab, Vastu Shastra aur Ank Jyotish (Numerology) par varshon ka swatantra adhyayan aur shodh karke, unhe saral, imandaar aur research-aadharit lekhon ke roop mein sabke liye free upalabdh karana — yahi inka jeevan-uddeshya hai. Research aur collaboration ke liye: astrovgyaan@gmail.com

Ajit Kumar Nath

Ajit Kumar Nath — Researcher, AstroVgyaan

Ajit Kumar Nath — AstroVgyaan ke sansthapak aur research lead. Inka vishwas hai ki gyan ka asli uddeshya seva hai — isliye inka kaam kabhi bhi vyaktigat consultation ya paid sessions tak simit nahi raha. Vedic Jyotish (Parashari Hora Shastra, Jaimini Sutram, Bhrigu Nandi Nadi), Lal Kitab, Vastu Shastra aur Ank Jyotish (Numerology) par varshon ka swatantra adhyayan aur shodh karke, unhe saral, imandaar aur research-aadharit lekhon ke roop mein sabke liye free upalabdh karana — yahi inka jeevan-uddeshya hai. Research aur collaboration ke liye: astrovgyaan@gmail.com

पारंपरिक भारतीय आँगन-युक्त घर — परमशायिक मंडल के व्यावहारिक अनुप्रयोग का प्रतीक
Vastu Shastra Course

अध्याय ३.४ — परमशायिक मंडल (८१ पद): गृह निर्माण का शास्त्रीय मानक | निःशुल्क वास्तु शास्त्र पाठ्यक्रम

अगर आप कभी वास्तु सलाहकार से घर की योजना पर बात करें, तो सबसे ज़्यादा जिस एक मंडल का ज़िक्र आएगा, वह है परमशायिक मंडल। पिछले अध्याय में हमने मंदिर के लिए बने ६४-पद मण्डूक मंडल को समझा; अब हम उसके “घरेलू जोड़ीदार” — परमशायिक (Paramasayika) मंडल, यानी ९×९ = ८१ पद — को पूरे विस्तार से समझेंगे। यही वह मंडल है जिस पर आज लगभग हर पारंपरिक और आधुनिक गृह-वास्तु परामर्श आधारित होता है। 🔲 परमशायिक मंडल की संरचना — ९×९ का ग्रिड परमशायिक मंडल में वर्ग की भुजा को 9 बराबर भागों में बाँटा जाता है, जिससे कुल 9×9 = 81 पद बनते हैं। 8×8 वाले मण्डूक मंडल से इसका सबसे बड़ा अंतर यही है कि 9 एक विषम (odd) संख्या है — इसलिए इस ग्रिड का एक सुस्पष्ट ज्यामितीय केंद्र होता है, जो घर जैसी संरचना के लिए बेहद उपयोगी सिद्ध होता है, जहाँ एक स्थिर, अकेला केंद्र-बिंदु चाहिए होता है जिसके चारों ओर बाकी सारी योजना संतुलित हो। क्षेत्र पदों की संख्या (सामान्यतः) गृह-योजना में भूमिका ब्रह्मस्थान (केंद्र) 9 पद (3×3 खंड) आँगन/खुला क्षेत्र — निर्माण-मुक्त रखा जाता है (देखें अध्याय ३.६) आंतरिक देवता-वलय 20 पद आदित्य, इंद्र, यम, वरुण जैसे प्रमुख देवताओं की स्थिति बाह्य देवता-वलय 32 पद अष्ट दिक्पाल एवं सहायक देवता — भवन की बाहरी दीवारों के निकट अत्यंत बाह्य वलय 20 पद सीमा-रक्षक देवता — चारदीवारी/सीमा-रेखा के निकट सभी ४५ वास्तु देवताओं के नाम, सटीक पद-स्थिति और महत्व को हम अगले अध्याय (३.५) में विस्तार से देखेंगे — यहाँ हमारा उद्देश्य है यह समझना कि इस मंडल की चार परतें आपस में कैसे संबंधित हैं और घर की व्यावहारिक योजना में इनका क्या अर्थ है। 🏠 गृह-योजना में परमशायिक मंडल कैसे लागू होता है जब कोई वास्तुकार भूखंड पर परमशायिक मंडल बिछाता है, तो सबसे पहले मंडल को मुख्य दिशाओं (उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम) के अनुसार संरेखित किया जाता है — ठीक वैसे ही जैसे अध्याय ३.१ में वास्तु पुरुष के सिर और पैर की दिशा तय की गई थी (सिर ईशान में, पैर नैऋत्य में)। इसके बाद हर कमरे को उसके अनुकूल पद-समूह में रखा जाता है — जैसे रसोई को आग्नेय कोण (अग्नि देवता का क्षेत्र) में, जल-भंडारण को वरुण के ईशान-निकट क्षेत्र में, और भारी सामान या सीढ़ी को नैऋत्य कोण (जहाँ भार वहन करने वाले देवताओं की स्थिति मानी जाती है) में। यह ठीक वही दिशा-कक्ष संबंध है जो हमने मॉड्यूल १ के अध्याय १.५ में सीखा था — अंतर सिर्फ इतना है कि अब हम उसे मंडल के सटीक पद-विभाजन के आधार पर और भी बारीकी से समझ रहे हैं। 🌳 ब्रह्मस्थान को खुला क्यों रखा जाना चाहिए — एक संक्षिप्त परिचय परमशायिक मंडल के केंद्रीय ९ पद (3×3 ब्लॉक) को ब्रह्मस्थान कहा जाता है, और परंपरा में इसे भारी निर्माण से मुक्त रखने का सख्त निर्देश मिलता है — पुराने घरों में यही क्षेत्र खुला आँगन (courtyard) बनकर उभरता था, जो हवा और प्रकाश दोनों के लिए भी व्यावहारिक रूप से उपयोगी साबित होता था। ब्रह्मस्थान की रक्षा और उससे जुड़े पूरे नियम इतने महत्वपूर्ण हैं कि हम उन्हें अगले मॉड्यूल के एक पूरे अध्याय (३.६) में अलग से विस्तार देंगे — यहाँ बस इतना समझना काफी है कि यह ९-पद केंद्र पूरे मंडल की धुरी है, जिसके इर्द-गिर्द बाकी सभी ७२ पद व्यवस्थित होते हैं। 🏢 आधुनिक फ्लैट और अपार्टमेंट में परमशायिक मंडल का अनुप्रयोग आज ज़्यादातर लोग स्वतंत्र भूखंड पर नहीं, बल्कि अपार्टमेंट या फ्लैट में रहते हैं, जहाँ ९-पद का खुला आँगन बनाना संभव नहीं होता। ऐसे में आधुनिक वास्तु-सलाहकार मंडल के सिद्धांत को अनुपात में लागू करते हैं — फ्लैट के भीतर जो क्षेत्र ज्यामितीय केंद्र में आता है, उसे कम-से-कम भारी फर्नीचर, शौचालय या रसोई की चूल्हे-दीवार से मुक्त रखने की कोशिश की जाती है, भले ही वह पूरी तरह खुला न हो। इसी तरह हर कमरे की दिशा-निर्धारण के लिए मूल ८१-पद अनुपात को फ्लैट के आकार पर छोटा करके लागू किया जाता है। यह मूल शास्त्रीय नियम का व्यावहारिक रूपांतरण है, न कि उससे विचलन — सिद्धांत वही रहता है, केवल स्केल बदलता है। 📏 एक उदाहरण से समझें — ४० फ़ीट के भूखंड पर परमशायिक मंडल सिद्धांत को व्यावहारिक रूप से समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए एक भूखंड की भुजा 40 फ़ीट है। परमशायिक मंडल में इसे 9 बराबर भागों में बाँटना है, तो हर पद की भुजा लगभग 40 ÷ 9 ≈ 4.44 फ़ीट होगी। केंद्रीय ब्रह्मस्थान (3×3 = 9 पद) की भुजा इस हिसाब से लगभग 13.3 फ़ीट (यानी 3 × 4.44) बैठेगी — यही वह न्यूनतम क्षेत्र है जिसे भारी निर्माण से यथासंभव मुक्त रखने की कोशिश करनी चाहिए। यह गणना दिखाती है कि मंडल कोई अमूर्त सिद्धांत नहीं, बल्कि ज़मीन पर वास्तविक माप में उतारा जा सकने वाला एक स्पष्ट ढाँचा है — हर वास्तुकार अपने भूखंड के अनुसार यही सरल गणित दोहराता है, चाहे भूखंड 20 फ़ीट का हो या 100 फ़ीट का। 📚 बृहत्संहिता में परमशायिक मंडल का संदर्भ वराहमिहिर की बृहत्संहिता (छठी शताब्दी) में भी वास्तु पुरुष मंडल का विस्तृत वर्णन मिलता है, और वहाँ भी ८१-पद मंडल को गृह-निर्माण के लिए विशेष स्थान दिया गया है। यह दिखाता है कि यह केवल मयमतम् या मानसार जैसे दक्षिण-भारतीय शिल्प-ग्रंथों तक सीमित सिद्धांत नहीं, बल्कि उत्तर और दक्षिण दोनों भारतीय परंपराओं में समान रूप से स्वीकृत रहा है। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों और शताब्दियों में स्वतंत्र रूप से एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना — कि घर के लिए ९×९ का विषम-ग्रिड सबसे उपयुक्त है — इस सिद्धांत की व्यावहारिक मजबूती का प्रमाण माना जाता है। 🌬️ केंद्रीय आँगन का आधुनिक भवन-विज्ञान से संबंध ब्रह्मस्थान को खुला रखने का नियम केवल धार्मिक-सांकेतिक नहीं, बल्कि भवन-विज्ञान की दृष्टि से भी उपयोगी सिद्ध होता है। केंद्रीय आँगन प्राकृतिक क्रॉस-वेंटिलेशन (हवा का आर-पार प्रवाह) बनाता है, दिन में सूर्य-प्रकाश को घर के भीतरी हिस्सों तक पहुँचाता है, और गर्मी में हवा को ठंडा रखने में मदद करता है — यही कारण है कि राजस्थान और गुजरात की पारंपरिक हवेलियों में केंद्रीय आँगन एक सामान्य विशेषता रही है। आधुनिक ग्रीन-बिल्डिंग डिज़ाइन में भी ‘कोर्टयार्ड हाउस’ की अवधारणा को ऊर्जा-दक्ष माना जाता है — यह दिखाता है कि

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जोधपुर के जैन मंदिर की छत की विस्तृत नक्काशी — मण्डूक मंडल का प्रतीकात्मक चित्रण
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अध्याय ३.३ — मण्डूक/चण्डित मंडल (६४ पद): मंदिर निर्माण की आधारशिला | निःशुल्क वास्तु शास्त्र पाठ्यक्रम

पिछले अध्याय में हमने देखा कि ३२ मंडल-प्रकारों में से केवल दो — ६४ पद और ८१ पद — आज व्यापक रूप से उपयोग होते हैं। इस अध्याय में हम पहले वाले, यानी मण्डूक (Manduka) या चण्डित (Chandita) मंडल को विस्तार से समझेंगे — जो परंपरागत रूप से मंदिर निर्माण के लिए निर्धारित किया गया है। यह 8×8 के ग्रिड में बँटा एक मंडल है, जिसकी 64 कोशिकाएँ मंदिर की पूरी योजना — गर्भगृह से लेकर बाहरी परिक्रमा पथ तक — को दिशा और देवता के अनुसार व्यवस्थित करती हैं। 🔲 मण्डूक मंडल की संरचना — ८×८ का ग्रिड जैसा नाम से स्पष्ट है, मण्डूक मंडल में वर्गाकार क्षेत्र की भुजा को 8 बराबर भागों में बाँटा जाता है, जिससे कुल 8×8 = 64 पद बनते हैं। यह संख्या इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 64 = 8², और 8 की संख्या शास्त्रों में अष्ट दिशाओं (चार मुख्य + चार कोणीय) से जुड़ी मानी जाती है — इसलिए हर दिशा को बराबर और स्पष्ट प्रतिनिधित्व मिलता है। मयमतम् में इस मंडल को मंदिर वास्तु का आधार बताया गया है, विशेष रूप से उन मंदिरों के लिए जहाँ देवता की प्रतिष्ठा और परिक्रमा-पथ दोनों की स्पष्ट योजना ज़रूरी होती है। 🎯 तीन संकेंद्रित परतें — केंद्र, मध्य और बाह्य क्षेत्र मण्डूक मंडल को समझने का सबसे आसान तरीका है इसे तीन संकेंद्रित परतों में देखना — जैसे एक वर्गाकार लक्ष्य (target) के भीतर तीन वर्ग हों। परत पदों की संख्या (अनुमानित) महत्व केंद्रीय क्षेत्र (ब्रह्मस्थान) 4 पद (2×2 खंड) गर्भगृह की मुख्य मूर्ति/देवता का स्थान — पूर्णतः खुला या पवित्र रखा जाता है मध्य परत 28 पद प्रमुख वास्तु देवताओं (आदित्य, इंद्र, यम, वरुण आदि) की स्थिति बाह्य परत 32 पद दिक्पाल एवं गौण देवताओं की स्थिति — परिक्रमा-पथ के निकट यह त्रि-स्तरीय संरचना मंदिर वास्तु के मूल सिद्धांत को दर्शाती है — जितना केंद्र के करीब, उतना अधिक पवित्र और अधिष्ठाता देवता का सीधा प्रभाव; जितना बाहर, उतना सहायक और सुरक्षात्मक देवताओं का क्षेत्र। हर पद का सटीक नाम और अधिष्ठाता देवता अगले अध्याय (३.५) में विस्तार से बताया जाएगा, जहाँ हम सभी ४५ वास्तु देवताओं की मंडल में स्थिति को एक साथ देखेंगे। 🛕 गर्भगृह की स्थिति — मूर्ति कहाँ स्थापित होती है मण्डूक मंडल में गर्भगृह (जहाँ मुख्य देव-प्रतिमा स्थापित होती है) हमेशा केंद्रीय ब्रह्मस्थान के भीतर या उसके ठीक ऊपर रखा जाता है। चूँकि 8×8 का ग्रिड सम (even) संख्या है, इसका ठीक बीचोबीच एक भी कोशिका नहीं बल्कि चार कोशिकाओं का जोड़ बनता है — इसी चार-कोशिका ब्लॉक को मंदिर वास्तु में केंद्र-बिंदु माना जाता है। मंदिर का शिखर (ऊपर उठती संरचना) भी इसी केंद्रीय क्षेत्र के ठीक ऊपर सीधी रेखा में बनाया जाता है, ताकि पूरी संरचना का भार और दृष्टि-अक्ष दोनों संतुलित रहें। ⚖️ मण्डूक मंडल मंदिर के लिए ही उपयुक्त क्यों है एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है — घर बनाने के लिए भी यही मंडल क्यों नहीं उपयोग होता? इसका मुख्य कारण है सम और विषम संख्या का अंतर। 8×8 (सम संख्या) में एक भी केंद्रीय कोशिका नहीं होती, बल्कि चार कोशिकाओं का समूह केंद्र बनाता है — यह संरचना देव-प्रतिमा जैसी एक स्थिर, स्थायी केंद्र-वस्तु के लिए उपयुक्त है, जो जीवनभर एक ही स्थान पर रहती है। लेकिन घर में रसोई, शयनकक्ष, आँगन जैसी कई गतिशील ज़रूरतों को व्यवस्थित करना होता है, जिनके लिए एक स्पष्ट, अकेला केंद्र-बिंदु ज़्यादा व्यावहारिक होता है — और यह सुविधा 9×9 (विषम संख्या) के ८१-पद मंडल में मिलती है, जिसका एक भी केंद्रीय कोशिका होती है। यही कारण है कि परंपरा में मंदिर के लिए सम-आधारित मण्डूक और घर के लिए विषम-आधारित परमशायिक मंडल चुना गया — इसे हम अगले अध्याय में विस्तार से समझेंगे। 🚶 परिक्रमा-पथ की योजना — बाह्य परत का व्यावहारिक उपयोग मण्डूक मंडल की बाह्य 32-पद परत केवल देवताओं की सांकेतिक स्थिति तक सीमित नहीं है — यह मंदिर के परिक्रमा-पथ (प्रदक्षिणा मार्ग) की चौड़ाई और स्थिति भी निर्धारित करती है। भक्त जब मुख्य देव-प्रतिमा की परिक्रमा करते हैं, तो वह मार्ग इसी बाहरी परत के भीतर से होकर गुजरता है, ताकि हर कदम किसी न किसी दिक्पाल या गौण देवता के क्षेत्र से होकर बीते। बड़े मंदिरों में जहाँ एक से अधिक परिक्रमा-पथ (भीतरी और बाहरी) बनाए जाते हैं, वहाँ मूल 64-पद मंडल को अनुपात में बड़ा करके (जैसे प्रत्येक पद को आगे उप-विभाजित करके) उतनी ही ज्यामितीय शुद्धता के साथ विस्तारित किया जाता है, ताकि केंद्र-से-परिधि का अनुपात न बदले। 🏛️ दक्षिण भारतीय मंदिर परंपरा में इस सिद्धांत का प्रभाव तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के परंपरागत मंदिर-निर्माण में शिल्पशास्त्रियों की गुरु-शिष्य परंपरा आज भी मंडल-आधारित योजना को आधार मानती है, भले ही अलग-अलग क्षेत्रीय ग्रंथों (जैसे कामिकागम, कारणागम) में विवरण थोड़े भिन्न हों। मूल सिद्धांत — केंद्र में गर्भगृह, मध्य में प्रमुख देवता, बाहर परिक्रमा और सुरक्षा-क्षेत्र — हर परंपरा में एक समान मिलता है। यही कारण है कि सदियों पुराने मंदिरों की योजना में भी आधुनिक मापन-यंत्रों से जाँच करने पर आश्चर्यजनक ज्यामितीय शुद्धता पाई जाती है — यह किसी संयोग का नहीं, बल्कि मंडल-पद्धति के सुव्यवस्थित पालन का परिणाम माना जाता है। 🔺 शिखर की ऊँचाई और मंडल के अनुपात का संबंध मंदिर वास्तु में एक महत्वपूर्ण नियम यह भी है कि शिखर (गर्भगृह के ऊपर उठती मीनार जैसी संरचना) की ऊँचाई मनमाने ढंग से तय नहीं होती — यह मूल मंडल की भुजा-लंबाई के अनुपात में निर्धारित होती है। सामान्यतः गर्भगृह की चौड़ाई और शिखर की ऊँचाई के बीच एक निश्चित अनुपात (परंपरागत ग्रंथों में इसे भिन्न-भिन्न मंदिर-शैलियों — नागर, द्रविड़, वेसर — के अनुसार अलग-अलग बताया गया है) रखा जाता है, जो मंडल की मूल इकाई (एक पद की भुजा) से गणना करके निकाला जाता है। इसीलिए मंडल केवल ज़मीन की योजना नहीं, बल्कि पूरे मंदिर की ऊर्ध्वाधर संरचना की नींव भी माना जाता है। 🐸 नाम की व्युत्पत्ति — ‘मण्डूक’ मेंढक क्यों? पारंपरिक व्याख्या के अनुसार, इस मंडल का नाम ‘मण्डूक’ (संस्कृत में मेंढक) इसलिए पड़ा क्योंकि इसकी सममित, चारों दिशाओं में बराबर फैली संरचना मेंढक के फैले हुए पैरों जैसी दिखाई देती है — केंद्र से चारों ओर बराबर दूरी तक फैला हुआ एक संतुलित आकार। कुछ ग्रंथों में इसे ‘चण्डित’ भी कहा गया

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ज्यामितीय ग्रिड पैटर्न — पद विन्यास का प्रतीकात्मक चित्रण
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अध्याय ३.२ — मंडल के ३२ प्रकार: सकल, पेचक, पीठ से लेकर विशाल मंडलों तक | निःशुल्क वास्तु शास्त्र पाठ्यक्रम

पिछले अध्याय में हमने सीखा कि वास्तु पुरुष मंडल एक वर्गाकार क्षेत्र को छोटी-छोटी कोशिकाओं (पद) में बाँटने की प्रणाली है। लेकिन एक पद वाले मंडल से लेकर सैकड़ों पद वाले विशाल मंडल तक — शास्त्रों में यह विभाजन कितने प्रकार का हो सकता है? मयमतम् और मानसार जैसे ग्रंथों में इस प्रश्न का उत्तर बहुत व्यवस्थित ढंग से दिया गया है — कुल ३२ नामित मंडल प्रकारों की एक शृंखला, जो १ पद से शुरू होकर १,०२४ पद तक जाती है। इस अध्याय में हम इस पूरी शृंखला को समझेंगे — यह किस गणितीय नियम पर आधारित है, कौन-से मंडल आज भी प्रयोग में हैं, और कौन-से केवल शास्त्रीय संदर्भ के लिए बचे हैं। 📐 पद कैसे बढ़ते हैं — मंडल की गणितीय संरचना वास्तु पुरुष मंडल हमेशा एक वर्ग (square) होता है, और उसे बराबर भागों में बाँटा जाता है। अगर वर्ग की एक भुजा को n बराबर हिस्सों में बाँटा जाए, तो कुल पद की संख्या n × n होगी। यानी भुजा 1 भाग में बँटे तो 1 पद, भुजा 2 भागों में बँटे तो 4 पद, भुजा 3 भागों में बँटे तो 9 पद — यह क्रम इसी तरह आगे बढ़ता है। इसी सरल गणितीय नियम पर पूरी ३२-मंडल शृंखला टिकी है, जो 1×1 से शुरू होकर 32×32 (यानी 1,024 पद) तक जाती है। हर चरण का अपना एक शास्त्रीय नाम है, और शुरुआती कुछ नाम आज भी वास्तु सलाहकारों की भाषा में सुने जाते हैं। भुजा विभाजन कुल पद मंडल का नाम मुख्य उपयोग 1 × 1 1 सकल (Sakala) अत्यंत छोटे मंदिर, स्तंभ-स्थापना 2 × 2 4 पेचक (Pechaka) छोटी वेदी, गृह-पूजा स्थल 3 × 3 9 पीठ (Pitha) छोटे मंदिर का गर्भगृह-आधार 4 × 4 16 महापीठ (Mahapitha) मध्यम आकार की वेदी-रचना 5 × 5 25 उपपीठ (Upapitha) विस्तृत पूजा-स्थल योजना 6 × 6 36 उग्रपीठ (Ugrapitha) बड़े मंदिर परिसर का आधार 7 × 7 49 स्थण्डिल (Sthandila) यज्ञशाला एवं हवन-स्थल योजना 8 × 8 64 मण्डूक / चण्डित (Manduka/Chandita) मंदिर निर्माण — सबसे प्रचलित (देखें अध्याय ३.३) 9 × 9 81 परमशायिक (Paramasayika) गृह निर्माण — सबसे प्रचलित (देखें अध्याय ३.४) 10 × 10 100 आसन (Asana) बड़े राजमहल एवं संस्थान-भवन यह क्रम इसके बाद भी आगे बढ़ता है — 11×11 से लेकर 32×32 तक — और हर चरण का अपना शास्त्रीय नाम मयमतम् में दर्ज है। लेकिन जैसे-जैसे भुजा बड़ी होती जाती है, मंडल का व्यावहारिक उपयोग घटता जाता है, क्योंकि इतनी बड़ी योजना केवल विशाल राजमहल या बहु-मंदिर परिसर जैसी दुर्लभ संरचनाओं में ही काम आती थी। 🔹 सबसे छोटे तीन मंडल — सकल, पेचक और पीठ सकल (1 पद) सबसे सरल मंडल है — पूरा वर्ग एक ही इकाई माना जाता है, बिना किसी आंतरिक विभाजन के। इसका उपयोग बहुत छोटी संरचनाओं में होता है, जैसे किसी स्तंभ या स्तूप की नींव रखते समय, जहाँ जगह इतनी सीमित हो कि विभाजन का कोई व्यावहारिक अर्थ न रहे। पेचक (4 पद) में वर्ग को चार बराबर भागों में बाँटा जाता है। यह घर के भीतर एक छोटी पूजा-वेदी या तुलसी-चौरा जैसी संरचना बनाते समय उपयोगी होता है, जहाँ केंद्र और चार दिशाओं का बुनियादी भेद दिखाना ज़रूरी है। पीठ (9 पद) पहला मंडल है जिसमें एक स्पष्ट केंद्रीय कोशिका (ब्रह्मस्थान) और उसे घेरने वाली आठ बाहरी कोशिकाएँ होती हैं — यानी अष्ट दिशाओं का प्रतिनिधित्व यहीं से शुरू होता है। छोटे मंदिरों के गर्भगृह की आधार-योजना अक्सर इसी 3×3 ढाँचे पर टिकी होती है। 🔸 महापीठ से आसन तक — मध्यम आकार के मंडल 16 पद (महापीठ) से लेकर 100 पद (आसन) तक के मंडल मध्यम आकार की संरचनाओं के लिए उपयोग होते थे — बड़ी वेदियाँ, यज्ञशालाएँ, और मध्यम आकार के मंदिर परिसर। इनमें कोशिकाओं की संख्या बढ़ने के साथ देवताओं और दिशाओं का विभाजन भी अधिक सूक्ष्म होता जाता है, जिससे वास्तुकार को भवन के हर हिस्से को किसी विशेष देवता या तत्व से जोड़ने की अधिक स्वतंत्रता मिलती है। उदाहरण के लिए, स्थण्डिल (49 पद) का उपयोग विशेष रूप से यज्ञ और हवन से जुड़ी संरचनाओं की योजना में होता था, जहाँ अग्नि-स्थान की सटीक स्थिति बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती थी। ⭐ ६४ और ८१ पद सबसे महत्वपूर्ण क्यों माने जाते हैं पूरी ३२-मंडल शृंखला में से आज केवल दो मंडल वास्तव में व्यापक रूप से प्रयोग होते हैं — मण्डूक/चण्डित (64 पद) और परमशायिक (81 पद)। मयमतम् और बृहत्संहिता दोनों में इन दोनों को विशेष स्थान दिया गया है क्योंकि इनकी कोशिका-संख्या इतनी है कि हर महत्वपूर्ण दिशा, उप-दिशा और देवता को एक स्पष्ट स्थान मिल जाता है — न बहुत कम कि विवरण अधूरा रह जाए, न बहुत ज़्यादा कि सामान्य निर्माण में लागू करना अव्यावहारिक हो जाए। परंपरागत रूप से 64-पद मंडल का उपयोग मंदिर निर्माण के लिए और 81-पद मंडल का उपयोग गृह निर्माण के लिए किया जाता रहा है — इन दोनों को हम अगले दो अध्यायों (३.३ और ३.४) में पूरे विस्तार से समझेंगे, जिसमें हर पद का नाम, अधिष्ठाता देवता और व्यावहारिक उपयोग शामिल होगा। 🔍 शेष मंडल — व्यवहार में दुर्लभ क्यों हैं 100 पद से आगे 11×11 (121 पद) से लेकर 32×32 (1,024 पद) तक के मंडल शास्त्रों में वर्णित तो हैं, लेकिन व्यावहारिक निर्माण में लगभग कभी उपयोग नहीं होते। इसके तीन मुख्य कारण हैं। पहला, इतनी बड़ी योजना केवल विशाल राजमहल, बहु-भवन मंदिर परिसर, या नगर-नियोजन जैसी दुर्लभ परियोजनाओं में ही व्यावहारिक होती है — सामान्य घर या मंदिर के लिए इतनी सूक्ष्मता की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। दूसरा, जैसे-जैसे कोशिकाएँ बढ़ती हैं, हर कोशिका का आकार इतना छोटा हो जाता है कि ज़मीन पर उसे सटीकता से चिह्नित करना कठिन हो जाता था — प्राचीन काल में यह माप रस्सी और लकड़ी के औज़ारों से होता था, जिनकी सीमाएँ थीं। तीसरा, समय के साथ 64 और 81 पद के मंडल इतने मानक बन गए कि बाकी शृंखला ग्रंथों में केवल सैद्धांतिक पूर्णता के लिए दर्ज रह गई, व्यवहार में शिल्पशास्त्रियों की पाठ्य-परंपरा में इन्हें आगे नहीं बढ़ाया गया। इसीलिए आधुनिक वास्तु-सलाहकार भी लगभग हमेशा इन्हीं दो मंडलों का संदर्भ देते हैं, बाकी शृंखला का उल्लेख केवल ऐतिहासिक पूर्णता के लिए किया जाता है। 🧭

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