समलैंगिक होना क्यों होता है — ज्योतिष, विज्ञान और कानून का पूरा सच
“मैं समलैंगिक क्यों हूं — क्या यह कोई गलती है, क्या यह बदला जा सकता है?” — जवाब सीधा है: यह न कोई गलती है, न कोई बीमारी जिसे “ठीक” किया जाए। यह मानव यौन-प्रवृत्ति (sexual orientation) की एक स्वाभाविक विविधता है, जितनी पुरानी खुद मानव सभ्यता। ज़्यादातर जगहों पर इसका जवाब या तो चुप्पी में मिलता है या डर पैदा करने वाली भाषा में — पर असली समझ इससे कहीं गहरी और शांत है। इस लेख में हम इसे तीन नज़रियों से देखेंगे: भारत की ज्योतिष-परंपरा इसे कैसे वर्गीकृत करती है, आधुनिक विज्ञान क्या कहता है, और भारत में आज इसकी कानूनी व सामाजिक स्थिति क्या है। शुरुआत में ही स्पष्ट कर दें: समलैंगिकता कोई पाप, बीमारी या चुनी हुई “गलत आदत” नहीं है। 2018 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसे अपराध की श्रेणी से बाहर करते हुए यही कहा — यह वयस्कों के बीच सहमति से बना एक स्वाभाविक रिश्ता है, संविधान की गरिमा और निजता के अधिकार का हिस्सा। मैंने अपने वर्षों के अध्ययन में पाया है कि जो लोग यह सवाल लेकर आते हैं, वे असल में दो अलग-अलग डर लेकर आते हैं — एक खुद अपने बारे में उलझन का, और दूसरा परिवार को खोने का। मैं हमेशा कहता हूं: पहले डर का जवाब विज्ञान और खुद की समझ में है, दूसरे डर का हल परिवार से धैर्यपूर्ण बातचीत में — किसी उपाय या पूजा में नहीं। ज्योतिष में समलैंगिकता — पारंपरिक दृष्टिकोण और ग्रह-योग भारत की परंपरा में यौन-विविधता कोई नई या “पश्चिमी” अवधारणा नहीं — खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों में उकेरी गई मूर्तियां सदियों पुराना प्रमाण हैं कि इसे तब भी मानव जीवन के स्वाभाविक हिस्से के रूप में दर्शाया गया था। ज्योतिष में इसे भी उसी “तृतीय प्रकृति” वर्गीकरण के दायरे में रखा गया है जिसकी चर्चा हमने किन्नर/ट्रांसजेंडर विषय पर पहले की थी — यानी पुंस-प्रकृति और स्त्री-प्रकृति के अलावा एक तीसरी श्रेणी, जिसमें लिंग-पहचान और यौन-रुझान दोनों तरह की विविधताएं शामिल मानी गई हैं। लोकप्रिय ज्योतिष सामग्री में जो ग्रह-कारक अक्सर बताए जाते हैं, वे हैं: सप्तम भाव (रिश्तों का भाव), शुक्र (प्रेम व आकर्षण का कारक) और मंगल (शारीरिक ऊर्जा का कारक) — तीनों मिलकर किसी व्यक्ति के आकर्षण-स्वभाव को दर्शाते माने जाते हैं। जो विशिष्ट संयोग सबसे ज़्यादा बताया जाता है वह है: शुक्र का राहु-केतु के बीच नीच या दुर्बल स्थिति में होना, मंगल का सप्तम भाव में वक्री होना, और सप्तमेश (सप्तम भाव का स्वामी) भी वक्री होकर चंद्रमा पर राहु-केतु का प्रभाव लिए हो। ध्यान दें — यहां भी वही पैटर्न दोहराया गया है जो हमने तृतीय-प्रकृति विषय में देखा: कोई एक ग्रह नहीं, बल्कि 3-4 कारकों का एक साथ मिलना ज़रूरी बताया गया है। अब सबसे ज़रूरी बात: शुक्र का दुर्बल होना, मंगल का वक्री होना, या राहु-केतु का प्रभाव — ये सभी बेहद सामान्य ग्रह-स्थितियां हैं जो करोड़ों कुंडलियों में अलग-अलग वजहों से बनती हैं, जिनका इस विषय से कोई सीधा संबंध नहीं होता। मैं यह इसलिए बता रहा हूं ताकि पाठक समझें कि परंपरा ने इसे कैसे देखा — न कि इसलिए कि किसी को अपनी कुंडली में इन योगों को “सबूत” की तरह ढूंढना चाहिए। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने खुद 2018 के फैसले में कहा था कि इसका वैज्ञानिक/पारंपरिक कारण जो भी हो, वह इस बात को बदलता नहीं कि हर वयस्क को अपनी पहचान के साथ गरिमा से जीने का अधिकार है। विज्ञान क्या कहता है — जेनेटिक, हार्मोनल और मस्तिष्क-संरचना आधुनिक विज्ञान के मुताबिक यौन-रुझान (sexual orientation) किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई जैविक कारकों के मेल से बनता है: जेनेटिक कारक: जुड़वां भाई-बहनों पर हुए अध्ययनों में पाया गया है कि यौन-रुझान में आनुवंशिकता की एक भूमिका होती है, हालांकि कोई एक “gay gene” अकेले इसे तय नहीं करता — यह कई जीन के मेल का नतीजा माना जाता है। गर्भावस्था के दौरान हार्मोनल प्रभाव: माँ के गर्भ में भ्रूण के मस्तिष्क-विकास के दौरान हार्मोन के स्तर में होने वाले स्वाभाविक बदलाव भी एक भूमिका निभाते हैं — यह जन्म से पहले ही तय होने लगता है, न कि बाद में किसी “संगति” या “आदत” से। मस्तिष्क-संरचना अध्ययन: मस्तिष्क-स्कैन अध्ययनों में समलैंगिक और विषमलैंगिक व्यक्तियों के मस्तिष्क की कुछ संरचनाओं में अंतर मिले हैं, जो यह संकेत देते हैं कि यह एक गहरी जैविक वास्तविकता है, सतही चुनाव नहीं। दिलचस्प बात यह है कि जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में धारा 377 को आंशिक रूप से रद्द किया, तो कोर्ट ने साफ़ कहा कि यह वैज्ञानिक बहस — कि यह जन्मजात है या चुनाव — कानूनी अधिकार के लिए मायने ही नहीं रखती। कोर्ट के मुताबिक, चाहे यह जन्मजात हो या न हो, दो वयस्कों के बीच सहमति से बना कोई भी रिश्ता किसी और को नुकसान नहीं पहुंचाता, इसलिए यह संविधान के तहत सुरक्षा का हकदार है। यानी विज्ञान भले ही अलग-अलग व्याख्या दे, गरिमा का अधिकार दोनों ही स्थिति में बराबर है। भारत में कानूनी स्थिति — धारा 377 से नवतेज सिंह जौहर तक 2018 से पहले भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत समलैंगिक संबंधों को अपराध माना जाता था — यह कानून अंग्रेज़ों के ज़माने का था, भारत की अपनी परंपरा का नहीं। 6 सितंबर 2018 को सर्वोच्च न्यायालय ने नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ मामले में ऐतिहासिक फैसला देते हुए वयस्कों के बीच सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत गरिमा, समानता और निजता के अधिकार का उल्लंघन था। हालांकि, 17 अक्टूबर 2023 को सुप्रियो बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने 3:2 के बहुमत से समलैंगिक विवाह या सिविल यूनियन को कानूनी मान्यता देने से इनकार कर दिया — कोर्ट ने कहा कि विवाह कानून बनाना संसद का अधिकार-क्षेत्र है, अदालत का नहीं। यानी आज की तारीख़ में समलैंगिक संबंध अपराध नहीं है, पर समलैंगिक विवाह को अभी भारत में कानूनी मान्यता नहीं मिली है — यह ज़िम्मेदारी अब संसद पर है। अनकहा पहलू — जब मजबूरी में की गई शादी दोनों तरफ के जीवन तोड़ देती
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