प्रासाद के प्रकार — नागर, द्रविड़ एवं वेसर शैली में अंतर
क्या आपने कभी सोचा है कि उत्तर भारत के मंदिरों का शिखर ऊपर की ओर पतला होता हुआ नुकीला क्यों दिखता है, जबकि दक्षिण भारत के मंदिरों में विशाल, रंग-बिरंगे गोपुरम सीढ़ीनुमा आकार में उठते हैं? ये कोई संयोग नहीं, बल्कि हज़ारों साल पुराने शिल्पशास्त्रों में वर्णित तीन अलग-अलग प्रासाद-शैलियों का परिणाम है। मंदिर वास्तु शास्त्र में इन्हें नागर, द्रविड़ और वेसर शैली कहा गया है। पिछले अध्याय में हमने मंदिर-निर्माण योग्य भूमि और दिशा का चयन सीखा; अब हम समझेंगे कि एक बार भूमि तय हो जाने के बाद, मंदिर की बाहरी संरचना — यानी प्रासाद — किस शैली में बनेगी, और इसका निर्णय क्षेत्र, परंपरा और उपलब्ध शिल्पकारों पर कैसे निर्भर करता है। शिल्पशास्त्र में तीन प्रासाद शैलियाँ क्यों बताई गई हैं? पूर्व मध्यकालीन शिल्पशास्त्रों में भारत को तीन भौगोलिक क्षेत्रों में बाँटकर तीन मंदिर-शैलियाँ बताई गई हैं। हिमालय और विंध्य पर्वतों के बीच का प्रदेश नागर शैली का घर माना गया, कृष्णा और कावेरी नदियों के बीच की भूमि द्रविड़ शैली की, और विंध्य पर्वत तथा कृष्णा नदी के बीच का मध्य क्षेत्र वेसर शैली का। यह विभाजन सिर्फ भूगोल तक सीमित नहीं — हर क्षेत्र की जलवायु, उपलब्ध पत्थर, स्थानीय राजवंशों की परंपरा और शिल्पकारों की तकनीक ने मिलकर हर शैली को अपना विशिष्ट रूप दिया। तीनों शैलियाँ पंचायतन स्थापत्य-परंपरा से विकसित हुई मानी जाती हैं, और तीनों में गर्भगृह तथा मंडप — दोनों मूल तत्व सामान्य रूप से मौजूद रहते हैं। अंतर मुख्यतः शिखर के आकार, मंदिर की योजना और बाहरी सज्जा में दिखता है। नागर शैली — उत्तर भारत का प्रासाद स्थापत्य नागर शैली हिमालय से लेकर विंध्य पर्वत तक फैले उत्तर भारत के मंदिरों में प्रचलित रही। इसके सबसे पुराने उदाहरण गुप्तकालीन मंदिरों में मिलते हैं — देवगढ़ का दशावतार मंदिर और भितरगाँव का ईंट-निर्मित मंदिर। नागर शैली की सबसे बड़ी पहचान इसका रेखा शिखर है — एक वक्राकार, ऊपर की ओर क्रमशः पतला होता हुआ टावर जो सीधा गर्भगृह के ऊपर खड़ा होता है। शिखर के शीर्ष पर एक घंटाकार या पहियेनुमा पत्थर की संरचना होती है जिसे आमलक कहते हैं, और सबसे ऊपर कलश। मंदिर की मूल भूमि आयताकार होती है, जिसके बीच के दोनों ओर क्रमिक विमान (प्रक्षेप) निकलते हैं — एक-एक विमान वाला भाग त्रिरथ कहलाता है, दो-दो वाला सप्तरथ और चार-चार वाला नवरथ। इन प्रक्षेपों के कारण मंदिर का आधार तिकोना-सा दिखने लगता है। नागर मंदिरों में सामान्यतः चार कक्ष माने गए हैं — गर्भगृह (मूर्ति का स्थान), जगमोहन (प्रवेश मंडप), नाट्यमंदिर (नृत्य-संगीत हेतु) और भोगमंदिर (भोग-प्रसाद हेतु)। प्रारंभिक नागर मंदिरों में स्तंभों का प्रयोग कम था, पर समय के साथ मंडप में स्तंभ जुड़ते गए। दक्षिण भारत के विपरीत, नागर शैली में मंदिर की चारदीवारी और गोपुरम पर विशेष ज़ोर नहीं दिया जाता — मंदिर प्रायः खुले परिसर में खड़ा दिखता है। उत्तर से दक्षिण तक इतने बड़े भौगोलिक विस्तार के कारण नागर शैली में भी क्षेत्रीय विविधता आई, जिसे शिल्पशास्त्री मुख्यतः तीन उप-शैलियों में बाँटते हैं: ओडिशा शैली — भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर और कोणार्क का सूर्य मंदिर इसके प्रमुख उदाहरण हैं; यहाँ शिखर को देउल कहा जाता है और रेखा-देउल का आकार विशेष रूप से सीधा-ऊँचा होता है। मध्य भारतीय (चंदेल) शैली — खजुराहो के मंदिर समूह इसकी पहचान हैं; यहाँ शिखर के साथ छोटे-छोटे उप-शिखर (उरुशृंग) जोड़कर एक पर्वत-श्रृंखला जैसा प्रभाव बनाया जाता है। पश्चिम भारतीय (सोलंकी) शैली — गुजरात का मोढेरा सूर्य मंदिर और राजस्थान के दिलवाड़ा जैन मंदिर इसके उदाहरण हैं; यहाँ बारीक नक्काशी और सभामंडप की भव्यता विशेष रूप से देखी जाती है। द्रविड़ शैली — दक्षिण भारत का प्रासाद स्थापत्य द्रविड़ शैली का संबंध मुख्यतः तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल के मंदिरों से है, हालाँकि इसके कुछ प्रारंभिक नमूने उत्तर और मध्य भारत में भी मिलते हैं — जैसे ऐहोल का लाडखान मंदिर। यह शैली पल्लव वंश (लगभग 7वीं शताब्दी) में उभरी और चोल, विजयनगर तथा नायक शासकों के समय अपने चरम पर पहुँची। द्रविड़ शैली की सबसे बड़ी पहचान इसका पिरामिडीय विमान है — गर्भगृह के ऊपर मंज़िल-दर-मंज़िल घटता हुआ ढाँचा, जो अंत में एक गुम्बदाकार स्तूपिका पर समाप्त होता है। समय के साथ इन मंज़िलों पर मूर्तियों और अलंकरण की मात्रा बढ़ती चली गई। द्रविड़ मंदिर की एक और खास पहचान है इसका गोपुरम — प्रवेश द्वार पर बना विशाल, बहुमंज़िला और अत्यंत अलंकृत टावर, जो कई बार मंदिर के मुख्य विमान से भी ऊँचा और अधिक भव्य बना दिया जाता है। द्रविड़ मंदिर परिसर चारदीवारी (प्राकार) से घिरा होता है, और बड़े मंदिरों में एक से अधिक संकेंद्रित प्राकार भी मिलते हैं। परिसर के भीतर स्तंभों पर टिके बड़े सभामंडप, गलियारे, मंदिर-तालाब (पुष्करिणी) और रथ-यात्रा हेतु चौड़ी सड़कें भी शामिल की जाती हैं। शिव मंदिरों में एक अलग नंदी मंडप और विष्णु मंदिरों में गरुड़ मंडप बनाने की परंपरा भी द्रविड़ शैली में विशेष रूप से देखी जाती है। बृहदेश्वर मंदिर, तंजावुर — चोल काल की द्रविड़ स्थापत्य-कला का शिखर, इसका विमान लगभग 66 मीटर ऊँचा है। मीनाक्षी मंदिर, मदुरै — नायक काल में बने भव्य, बहुरंगी गोपुरमों के लिए विश्वप्रसिद्ध। कैलासनाथ मंदिर, कांचीपुरम — पल्लव राजा राजसिंह और उनके पुत्र महेंद्र तृतीय द्वारा निर्मित, द्रविड़ शैली का प्रारंभिक उत्कृष्ट उदाहरण। शोर मंदिर, महाबलिपुरम — समुद्र-तट पर बना पल्लवकालीन मंदिर, प्रारंभिक द्रविड़ शैली की सादगी दर्शाता है। 🛕 अपने घर के मंदिर/पूजा घर का वास्तु जांचें बड़े प्रासाद निर्माण से पहले या घर के पूजा-स्थान की दिशा तय करने में सहायता चाहिए? विशेषज्ञ वास्तु सलाह पाएं। वास्तु परामर्श लें → वेसर शैली — नागर और द्रविड़ का सुंदर संगम वेसर शैली विंध्य पर्वत और कृष्णा नदी के बीच के मध्य-दक्कन क्षेत्र में विकसित हुई और पूर्व-मध्यकाल में इसका उदय माना जाता है। यह मूलतः एक मिश्रित शैली है जिसमें नागर और द्रविड़ — दोनों के लक्षण एक साथ दिखते हैं। कल्याणी के परवर्ती चालुक्यों और बाद में होयसल वंश द्वारा बनाए गए मंदिर इस शैली के सबसे प्रमुख उदाहरण हैं। वेसर मंदिरों में द्रविड़ शैली जैसे स्तरित विमान तो होते हैं, पर ये स्तर एक-दूसरे के अधिक निकट रखे जाते हैं, जिससे मंदिर की कुल ऊँचाई द्रविड़ मंदिरों की तुलना में कम रहती है और बनावट अधिक सुडौल दिखती है। कहीं-कहीं बौद्ध चैत्यों जैसी अर्धचंद्राकार
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