अध्याय ८.३ — राशि-सम्बन्ध पढ़ने का पूरा अभ्यास: गिनने की सही विधि | Bhrigu Nandi Nadi Practice Guide

भृगु नंदी नाड़ी राशि सम्बन्ध गिनने की विधि

अध्याय ८.१ में हमने सीखा — गुरु ही जातक है। अध्याय ८.२ में हमने सीखा — कारकत्व की तीन परतें होती हैं। आज हम वह कड़ी जोड़ते हैं जो अब तक अधूरी थी: राशि-सम्बन्ध ठीक-ठीक कैसे गिनें, ताकि आप अपनी खुद की कुंडली खोलकर, बिना किसी दुविधा के, आज ही यह विधि लगा सकें। इस बार एक बिलकुल नई उदाहरण-कुंडली लेंगे — वृषभ लग्न — और हर ग्रह की गिनती आपके सामने, कदम-दर-कदम, करके दिखाएंगे।

गिनने की सही विधि — ४ कदम में पूरा गणित

कदम १ — गुरु की राशि पहचानो: वही आपकी गिनती का शून्य-बिंदु है। लग्न को यहाँ पूरी तरह भूल जाइए — यह पराशरी की आदत है, BNN में नहीं चलती।

कदम २ — गुरु की राशि से लक्ष्य ग्रह की राशि तक, राशि-चक्र के स्वाभाविक क्रम में आगे की ओर गिनो (गुरु की अपनी राशि को गिनती में १ मानकर)।

कदम ३ — जो अंक आए, उसे वर्गीकृत करो: १ = युति, २ = द्वितीय (आगे), ५ या ९ = त्रिकोण, ७ = सप्तम, १२ = द्वादश (पीछे)। बाकी सभी अंक (३,४,६,८,१०,११) = कोई मान्य सम्बन्ध नहीं — ग्रह मौन है।

कदम ४ — अध्याय ८.२ की तीन परतें लगाओ: स्वाभाविक कारकत्व + यह सम्बन्ध (सक्रियता) + ग्रह की अवस्था (उच्च/स्वराशि/नीच/वक्री)। तीनों जुड़कर फलादेश बनता है।

ध्यान दें: “द्वादश (पीछे)” कोई अलग पिछड़ी गिनती नहीं है — यह भी उसी आगे वाली गिनती का हिस्सा है, बस १२वें नंबर पर पहुँचती है (जो घूमकर ग्रह की ठीक पिछली राशि बन जाती है)। कभी भी दिशा बदलकर पीछे से मत गिनिए — हमेशा आगे, राशि-चक्र के प्राकृतिक क्रम में।

नई उदाहरण-कुंडली — वृषभ लग्न, शून्य से पूरा अभ्यास

यह कुंडली अध्याय ८.१-८.२ वाली कुंडली से बिलकुल अलग है, ताकि आप विधि को रटे हुए उदाहरण से नहीं, बल्कि ताज़ी आँख से समझें। लग्न: वृषभ। गुरु कर्क राशि में बैठे हैं (मित्र-राशि, स्वराशि नहीं पर सम्माननीय स्थिति)।

चंद्र — कर्क (स्वराशि) — गुरु के साथ युति

गिनती: गुरु कर्क में = १। चंद्र भी कर्क में = १। समान राशि → युति। परत ३: चंद्र स्वराशि में, अत्यंत बलवान। पठन: जातक का मन सीधे जीव-तत्व से जुड़ा है — भावनात्मक गहराई और बौद्धिक/धार्मिक रुझान एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाते हैं। माता या मातृ-तुल्य व्यक्ति का प्रभाव जीवन की दिशा तय करने में केंद्रीय रहेगा।

सूर्य — सिंह (स्वराशि) — गुरु से द्वितीय

गिनती: कर्क=१, सिंह=२ → द्वितीय (आगे)। परत ३: सूर्य स्वराशि में। पठन (अध्याय ८.२ याद कीजिए — द्वितीय का अर्थ है ‘अगला स्वाभाविक पड़ाव’, कष्ट नहीं): आत्म-तत्व और अधिकार-भाव जीव के तुरंत आगे खड़े हैं — जातक का आत्मविश्वास और नेतृत्व-गुण उम्र के साथ स्वाभाविक रूप से निखरेगा, मानो यह अगला पड़ाव पहले से तय हो।

बुध + राहु — मिथुन (स्वराशि) — गुरु से द्वादश, आपस में युति

गिनती: कर्क=१, फिर पीछे की ओर गिनते हुए (या आगे ११ गिनकर) मिथुन पर १२वाँ अंक आता है → द्वादश (पीछे)। बुध यहाँ स्वराशि में बलवान, पर राहु के साथ युति में भी है — यानी बुध और राहु की कथाएँ आपस में गुंथी हैं। पठन: वाणी-विद्या-व्यापार जातक की पृष्ठभूमि/नींव है (द्वादश का अर्थ), पर राहु की युति इसमें एक अपरंपरागत, विदेशी या तकनीकी मोड़ जोड़ देती है — पारम्परिक विद्या नहीं, बल्कि हटकर रास्ते से बुद्धि और आजीविका।

मंगल — वृश्चिक (स्वराशि) — गुरु से पंचम त्रिकोण

गिनती: कर्क=१, सिंह=२, कन्या=३, तुला=४, वृश्चिक=५ → त्रिकोण (पंचम)। परत ३: मंगल स्वराशि में। पठन: त्रिकोण का सम्बन्ध सहज मित्रता का है — पराक्रम और ऊर्जा जीव-तत्व के स्वाभाविक सहयोगी बन जाते हैं। साहस और शारीरिक बल गुरु/ज्ञान-मार्ग की ही सेवा में लगेंगे, टकराव में नहीं।

शनि — मकर (स्वराशि) — गुरु से सप्तम

गिनती: कर्क से गिनते हुए सातवाँ अंक मकर पर आता है → सप्तम। परत ३: शनि स्वराशि में बलवान। पठन: सप्तम का सम्बन्ध आमना-सामना है — साझेदारी भी, तनाव भी। कर्म (शनि) सीधे जीव के सामने खड़ा है: जीवन एक सतत संवाद/द्वंद्व होगा अनुशासन और स्वतंत्रता के बीच — पर चूँकि शनि यहाँ स्वराशि में है, यह द्वंद्व अंततः परिपक्वता और ठोस उपलब्धि में बदलेगा, केवल संघर्ष में नहीं।

शुक्र — मीन (उच्च) — गुरु से नवम त्रिकोण

गिनती: कर्क से गिनते हुए नौवाँ अंक मीन पर आता है → त्रिकोण (नवम)। परत ३: शुक्र उच्च का — सबसे बलवान अवस्था। पठन: नवम त्रिकोण भाग्य-तत्व से जुड़ा माना जाता है — उच्च की लक्ष्मी यहाँ जीव की सबसे सहज और उदार सहयोगी बनकर आती है। धन, कला, वैवाहिक सुख — ये विषय जातक के भाग्य में गहराई से बुने हुए हैं, बिना किसी संघर्ष के।

केतु — धनु — गुरु से षष्ठ, कोई मान्य सम्बन्ध नहीं

गिनती: कर्क=१ से गिनते हुए छठा अंक धनु पर आता है — छठा किसी मान्य सम्बन्ध में नहीं आता → मौन। पठन: मोक्ष-तत्व और वैराग्य यहाँ जीवन की मुख्य पटकथा में सक्रिय भूमिका नहीं निभाएंगे — जातक के भीतर एक शांत आध्यात्मिक धारा बनी रहेगी, पर सतह पर शायद ही दिखे, जब तक गोचर का गुरु स्वयं धनु राशि पर न आ जाए।

सारांश तालिका — पूरी गिनती एक साथ

ग्रहराशिगुरु से गिनतीसम्बन्ध
गुरुकर्ककेंद्र-बिंदु
चंद्रकर्कयुति
सूर्यसिंहद्वितीय (आगे)
बुध / राहुमिथुन१२द्वादश (पीछे) + आपस में युति
मंगलवृश्चिकत्रिकोण (पंचम)
शनिमकरसप्तम
शुक्रमीनत्रिकोण (नवम)
केतुधनुमौन

संयुक्त फलादेश — बिखरे संकेतों से एक जीवन-चित्र

अब सारे टुकड़े जोड़िए: जीव (गुरु) मित्र-राशि कर्क में, अपने ही मन (चंद्र-युति) से गहराई से जुड़ा। ठीक आगे अधिकार-तत्व (सूर्य) खड़ा है, नेतृत्व स्वाभाविक रूप से विकसित होगा। नींव में वाणी-व्यापार है, पर राहु की छुअन के साथ — पारम्परिक नहीं, हटकर रास्ते से। पराक्रम और भाग्य-लक्ष्मी दोनों त्रिकोण से सहज सहयोगी हैं — यानी मेहनत और सौभाग्य दोनों साथ मिलेंगे, एक-दूसरे को काटेंगे नहीं। कर्म (शनि) सामने खड़ा एक आजीवन अनुशासन-पाठ है, जो अंततः ठोस उपलब्धि में बदलेगा। और मोक्ष-तत्व (केतु) अभी मौन है — गोचर के अपने समय की प्रतीक्षा में। यही BNN का तरीका है: बिना लग्न, बिना भाव, बिना दशा — केवल राशि-सम्बन्धों से इतना समृद्ध चित्र।

गिनती की ३ सबसे आम भूलें

१. लग्न से गिनना शुरू कर देना: BNN में हमेशा गुरु की राशि से गिनें, लग्न से नहीं — यह पराशरी की आदत यहाँ धोखा देती है।

२. “पीछे” के लिए उल्टी दिशा में गिनना: द्वादश-सम्बन्ध भी उसी आगे वाली गिनती से आता है (१२वाँ अंक) — कभी दिशा बदलकर पीछे मत गिनिए, गलत अंक पर पहुँच जाएंगे।

३. गुरु की अपनी राशि को गिनती में शामिल न करना: गुरु की राशि हमेशा गिनती में ‘१’ है, ‘०’ नहीं — इसे भूलने से हर अंक एक स्थान खिसक जाता है और पूरा वर्गीकरण गलत हो जाता है।

खुद आज़माएं

अभ्यास के लिए एक प्रश्न: यदि किसी कुंडली में गुरु मकर राशि में हो और शुक्र मीन राशि में, तो यह किस प्रकार का सम्बन्ध है? गिनिए — मकर=१, कुंभ=२, मीन=३। तीसरा अंक किसी मान्य सम्बन्ध में नहीं आता — तो उत्तर है : कोई सम्बन्ध नहीं, शुक्र यहाँ मौन है। अपनी खुद की जन्म-कुंडली निकालिए और गुरु से हर ग्रह की यह गिनती स्वयं करके देखिए — यही सबसे तेज़ तरीका है BNN की भाषा में सहज होने का।

अगले अध्याय में — ८.४

आज हमने गिनने की पूरी विधि सीख ली और एक नई कुंडली पर शून्य से लगाकर भी देखा। अगले अध्याय (८.४) में हम वक्री, अस्त और उच्च ग्रहों के विशेष नियमों में गहराई से उतरेंगे — जैसे वक्री ग्रह अपनी पिछली राशि से भी फल क्यों देता है, और अस्त ग्रह की शक्ति कहाँ छिप जाती है। हर सोमवार राशिफल की तरह, यह श्रृंखला भी नियम से आती रहेगी।

Ajit Kumar Nath
Lekhak: Ajit Kumar Nath

Ajit Kumar Nath — AstroVgyaan ke sansthapak aur research lead. Inka vishwas hai ki gyan ka asli uddeshya seva hai — isliye inka kaam kabhi bhi vyaktigat consultation ya paid sessions tak simit nahi raha. Vedic Jyotish (Parashari Hora Shastra, Jaimini Sutram, Bhrigu Nandi Nadi), Lal Kitab, Vastu Shastra aur Ank Jyotish (Numerology) par varshon ka swatantra adhyayan aur shodh karke, unhe saral, imandaar aur research-aadharit lekhon ke roop mein sabke liye free upalabdh karana — yahi inka jeevan-uddeshya hai. Research aur collaboration ke liye: astrovgyaan@gmail.com

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