Jyotish Course

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अध्याय ४.३ — द्वितीय भाव | धन, वाणी, परिवार और मारकेश | वैदिक ज्योतिष पाठ्यक्रम

द्वितीय भाव — धन, परिवार, वाणी और कुल का भाव। पाँच वर्षों के ज्योतिष परामर्श में जब भी कोई जातक धन के विषय में जानना चाहता है, तो मैं सबसे पहले द्वितीय भाव देखता हूँ। परन्तु यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात है — द्वितीय भाव केवल धन का भाव नहीं है। यह वाणी का, परिवार का, और उस कुल का भाव है जिसमें जातक जन्मा है। एक जातक आए थे जो धनी थे परन्तु परिवार में कलह था — द्वितीय भाव पर मंगल और शनि दोनों की दृष्टि थी। धन तो था परन्तु परिवार का सुख नहीं। यही द्वितीय भाव की जटिलता है। शास्त्र में द्वितीय भाव “धनधान्यकुलं मृत्युः शत्रवो धातवः स्मृताः। द्वितीयभावतो ज्ञेयाः रत्नाद्याश्च विचक्षणैः॥” बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय ११ महर्षि पाराशर कहते हैं — धन, धान्य (अनाज और खाद्य), कुल (परिवार), मृत्यु, शत्रु, धातुएँ (सप्त धातु — रस, रक्त आदि) और रत्न आदि — ये सब द्वितीय भाव से जानने चाहिए। यह श्लोक द्वितीय भाव की विविधता को दर्शाता है। “द्वितीयेशे स्वभावस्थे केन्द्रत्रिकोणसंस्थिते। धनवान् कुलवान् नित्यं सुखी च भवति द्विज॥” बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय १३ अर्थात् — यदि द्वितीयेश (द्वितीय भाव का स्वामी) अपनी राशि में हो या केन्द्र-त्रिकोण में हो, तो जातक धनवान, कुलवान और सुखी होता है। यह नियम धन विश्लेषण का मूल आधार है। द्वितीय भाव के कारकत्व धन और सम्पत्ति: द्वितीय भाव जातक के संचित धन, नकदी, आभूषण और चल सम्पत्ति का कारक है। यह ध्यान रखें कि आय का भाव एकादश है — द्वितीय भाव आय नहीं, संचित धन का भाव है। जो धन आता है (एकादश) और जो धन संचित रहता है (द्वितीय) — दोनों अलग हैं। वाणी और अभिव्यक्ति: द्वितीय भाव मुख और वाणी का भाव है। जातक की वाणी मधुर है या कठोर, सत्यवादी है या असत्यवादी — यह सब द्वितीय भाव से जाना जाता है। शुभ ग्रह द्वितीय में हों या द्वितीयेश बलवान हो तो वाणी मधुर और प्रभावशाली होती है। परिवार और कुल: द्वितीय भाव तत्काल परिवार — माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी-बच्चे — सभी के साथ सम्बन्ध को दर्शाता है। कुल अर्थात् वंश-परम्परा और पारिवारिक वातावरण भी द्वितीय से जाना जाता है। भोजन और स्वाद: मुख का भाव होने से भोजन, स्वाद और खाने की आदतें भी द्वितीय से जानी जाती हैं। वृषभ राशि (जो द्वितीय भाव की कालपुरुष में राशि है) भोजन-प्रिय राशि है। दाहिनी आँख: द्वितीय भाव दाहिनी आँख का कारक है — बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में स्पष्ट कहा गया है कि यदि द्वितीयेश कमजोर हो या त्रिक भाव में हो तो दाहिनी आँख की समस्या हो सकती है। धन योग — बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार महर्षि पाराशर ने बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के तेरहवें अध्याय में धन के अनेक योग बताए हैं। ये योग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं और मैंने इन्हें व्यावहारिक रूप से अनेक कुण्डलियों में सत्य पाया है। योग १ — द्वितीयेश-एकादशेश विनिमय: महर्षि पाराशर कहते हैं — “द्वितीयेशे एकादशस्थे एकादशेशे द्वितीये वा। अन्योन्यराशौ वा केन्द्रत्रिकोणयोः वा — धनवान् भवति जातकः।” यदि द्वितीयेश एकादश में हो और एकादशेश द्वितीय में हो — यह परिवर्तन योग है — तो जातक धनवान होता है। यदि दोनों एक साथ केन्द्र या त्रिकोण में हों तो भी धन का शुभ योग बनता है। पाँच वर्षों के अनुभव में मैंने यह योग अनेक सम्पन्न जातकों में देखा है। योग २ — गुरु का द्वितीय में: महर्षि पाराशर कहते हैं — “गुरौ धनस्थे स्वाधिपत्ये कुजयुते वा — धनवान् भवेत्।” यदि गुरु द्वितीय भाव में हो और वह द्वितीय का स्वामी हो अथवा मंगल के साथ हो — तो जातक धनवान होता है। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि गुरु कुंभ लग्न के लिए द्वितीयेश है — वहाँ यदि गुरु द्वितीय में हो तो विशेष धन योग। योग ३ — शुभ ग्रह द्वितीय में: शुक्र, गुरु, बुध या शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा द्वितीय भाव में हो तो धन की प्राप्ति होती है। पाप ग्रह — सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु — द्वितीय भाव में हों तो धन का नाश या धन में कठिनाई। योग ४ — द्वितीयेश की अच्छी स्थिति: “द्वितीयेशे उच्चे स्वराशौ वा — धनवान् प्रसिद्धश्च।” द्वितीयेश यदि उच्च राशि में हो या अपनी राशि में हो तो जातक धनवान और प्रसिद्ध होता है। दारिद्र्य योग: महर्षि पाराशर ने दारिद्र्य के योग भी बताए हैं — “द्वितीयेशे एकादशेशे च पापयुते क्रूरे वा — दरिद्रो जातकः।” यदि द्वितीयेश और एकादशेश दोनों पाप ग्रहों से युत हों या दोनों त्रिक भाव में हों तो जातक को धन की कठिनाइयाँ होती हैं। द्वितीय भाव में विभिन्न ग्रहों के फल द्वितीय में सूर्य: सूर्य द्वितीय में हो तो वाणी में अधिकार आता है परन्तु कठोरता भी। परिवार में पिता का प्रभाव अधिक। सरकार से धन का सम्बन्ध। नेत्र विकार की सम्भावना। धन में उतार-चढ़ाव। द्वितीय में चन्द्र: चन्द्र द्वितीय में हो तो वाणी मधुर और भावपूर्ण। परिवार से लगाव। धन में उतार-चढ़ाव — शुक्ल पक्ष में वृद्धि, कृष्ण पक्ष में कमी। भोजन में विशेष रुचि। द्वितीय में मंगल: मंगल द्वितीय में हो तो वाणी तीखी और कभी-कभी आक्रामक। परिवार में तनाव। धन परिश्रम से आता है परन्तु व्यय भी अधिक। दाहिनी आँख में समस्या हो सकती है। द्वितीय में बुध: बुध द्वितीय में — वाणी की यह सर्वोत्तम स्थिति। मधुर, प्रभावशाली और तर्कसंगत वाणी। व्यापार से धन। परिवार में बौद्धिक वातावरण। लेखन से आय। द्वितीय में गुरु: गुरु द्वितीय में — धन, परिवार और वाणी — तीनों के लिए शुभ। वाणी में ज्ञान और गुरुत्व। परिवार में सुख और सम्मान। धन का संचय। यह स्थिति अत्यन्त शुभ मानी जाती है। द्वितीय में शुक्र: शुक्र द्वितीय में — वाणी मधुर और कलात्मक। परिवार में सुख। धन कला और सौन्दर्य क्षेत्र से। उत्तम भोजन और ऐश्वर्य। द्वितीय में शनि: शनि द्वितीय में — वाणी में गम्भीरता, कभी-कभी कटुता। परिवार में दूरी। धन देर से और कठिन परिश्रम से। परन्तु जो धन आता है वह स्थायी होता है। द्वितीय में राहु: राहु द्वितीय में — वाणी में भ्रामक शक्ति। अपरम्परागत तरीकों से धन। परिवार में रहस्य। असत्य बोलने की प्रवृत्ति हो सकती है। द्वितीय में केतु: केतु द्वितीय में — धन के प्रति उदासीनता। वाणी में कटुता कभी-कभी। पूर्वजन्म के धन का संकेत — परन्तु इस जन्म में धन रुकता नहीं।

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अध्याय ४.२ — प्रथम भाव (लग्न) | शरीर, व्यक्तित्व और लग्नेश का विस्तृत विश्लेषण | वैदिक ज्योतिष

वैदिक ज्योतिष में प्रथम भाव — लग्न भाव — कुण्डली का सबसे महत्त्वपूर्ण भाव है। पाँच वर्षों के ज्योतिष परामर्श में मैंने यह अनुभव किया है कि किसी भी कुण्डली को समझने की शुरुआत सदा लग्न से होती है। लग्न वह द्वार है जिसके माध्यम से हम जातक के सम्पूर्ण जीवन में प्रवेश करते हैं। जिस जातक का लग्न बलवान होता है, वह जीवन की किसी भी चुनौती से घबराता नहीं — भले ही कुण्डली में अन्य कठिनाइयाँ हों। एक जातक का उदाहरण देता हूँ। उनकी कुण्डली में शनि, राहु और केतु अत्यन्त प्रतिकूल स्थिति में थे — जो देखकर साधारण दृष्टि से लगता कि यह अत्यन्त कठिन जीवन होगा। परन्तु उनका लग्न अत्यन्त बलवान था — लग्नेश अपनी उच्च राशि में था और गुरु लग्न को देख रहे थे। वे जातक आज एक सफल उद्यमी हैं। लग्न की शक्ति ने कुण्डली के समस्त दोषों को न्यून कर दिया। शास्त्र में प्रथम भाव “शरीराकृतिसौन्दर्यं बलाबलसुखासुखम्। स्वभावं च विजानीयात् लग्नस्थानाद् विचक्षणः॥” बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय ११ महर्षि पाराशर कहते हैं — शरीर की आकृति और सौन्दर्य, बल और दुर्बलता, सुख और दुःख, तथा स्वाभाविक प्रवृत्ति — इन सभी को विद्वान ज्योतिषी लग्न भाव से जाने। यह श्लोक प्रथम भाव के कारकत्व का सार है। प्रथम भाव केवल शरीर का भाव नहीं — यह जातक के सम्पूर्ण अस्तित्व का प्रतिबिम्ब है। “लग्नेशे बलसम्पन्ने केन्द्रत्रिकोणसंस्थिते। जातको सुखसम्पन्नो दीर्घायुर्धनवान् भवेत्॥” बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, प्रथम भाव प्रभाव, अध्याय १२ अर्थात् — यदि लग्नेश (लग्न का स्वामी) बलवान हो और केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो तो जातक सुखसम्पन्न, दीर्घायु और धनवान होता है। यह नियम मैंने सैकड़ों कुण्डलियों में सत्य पाया है। प्रथम भाव के कारकत्व प्रथम भाव के कारकत्वों को विस्तार से समझना आवश्यक है। बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में महर्षि पाराशर ने प्रथम भाव से निम्नलिखित विषयों को जानने का निर्देश दिया है। शरीर और स्वास्थ्य: लग्न भाव जातक के शरीर, शारीरिक बनावट, रंग-रूप, स्वास्थ्य और रोग-प्रतिरोधक क्षमता का कारक है। लग्न में बैठा ग्रह और लग्नेश की स्थिति — दोनों जातक के शरीर को प्रभावित करते हैं। शुभ ग्रह लग्न में हो तो शरीर आकर्षक और स्वस्थ, पाप ग्रह लग्न में हो तो शरीर में किसी न किसी चिह्न या दोष की सम्भावना। व्यक्तित्व और स्वभाव: जातक का स्वाभाविक व्यक्तित्व, उसकी प्रवृत्तियाँ, आदतें और जीवन के प्रति दृष्टिकोण — ये सब लग्न भाव से जाने जाते हैं। लग्न की राशि जातक के आधारभूत स्वभाव को निर्धारित करती है जबकि लग्न में बैठे ग्रह और लग्नेश उसे रंग देते हैं। आत्मविश्वास और जीवनशक्ति: लग्न भाव जातक के आत्मविश्वास, साहस और जीवनशक्ति का कारक है। बलवान लग्न वाले जातक में आत्मविश्वास स्वाभाविक होता है — उसे किसी से स्वीकृति नहीं चाहिए। दीर्घायु: प्रथम भाव आयु का प्रमुख भाव है। लग्न, लग्नेश और अष्टम भाव — तीनों मिलकर आयु का निर्धारण करते हैं। लग्नेश यदि बलवान हो और शुभ ग्रहों से युक्त हो तो दीर्घायु का संकेत है। जन्म का समय और स्थान: लग्न भाव जातक के जन्म के समय और स्थान का प्रतिनिधित्व करता है। यह भाव “जन्म” को दर्शाता है — शाब्दिक और रूपकात्मक दोनों अर्थों में। लग्न में विभिन्न ग्रहों के फल बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में महर्षि पाराशर ने प्रथम भाव में विभिन्न ग्रहों के फल विस्तार से बताए हैं। यहाँ मैं शास्त्रोक्त नियमों को अपने पाँच वर्षों के अनुभव के साथ प्रस्तुत करता हूँ। लग्न में सूर्य: महर्षि पाराशर कहते हैं — “लग्ने सूर्ये महातेजाः स्वल्पकेशो महोदरः” — लग्न में सूर्य हो तो जातक महातेजस्वी होता है, केश थोड़े होते हैं और उदर बड़ा। सूर्य लग्न में हो तो जातक नेतृत्वकारी, आत्मविश्वासी और प्रतापी होता है। परन्तु अहंकार भी अधिक होता है। स्वास्थ्य में हृदय और दृष्टि का विशेष ध्यान रखना होता है। पिता के साथ सम्बन्ध जटिल हो सकता है — एक ओर आदर, दूसरी ओर प्रतिस्पर्धा। लग्न में चन्द्र: चन्द्र लग्न में हो तो जातक सुन्दर, भावुक और सामाजिक होता है। महर्षि पाराशर ने कहा है — “चन्द्रे लग्ने सुरूपश्च मृदुर्वागीश्वरो भवेत्” — चन्द्र लग्न में हो तो सुन्दर रूप, मृदु स्वभाव और मधुर वाणी। शुक्ल पक्ष का बलवान चन्द्र लग्न में हो तो अत्यन्त शुभ। माता के साथ गहरा सम्बन्ध। मन में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक है। लोकप्रियता स्वाभाविक रूप से मिलती है। लग्न में मंगल: मंगल लग्न में हो तो जातक साहसी, ऊर्जावान और नेतृत्वकारी होता है। मंगल दोष की चर्चा यहाँ आती है। परन्तु महर्षि पाराशर के अनुसार — “कुजे लग्ने महाभागः क्रूरः क्षतविनाशकः” — मंगल लग्न में हो तो जातक महाभाग्यशाली हो सकता है, परन्तु क्रूर स्वभाव और चोट-दुर्घटना की सम्भावना। शरीर पर कोई चिह्न हो सकता है। नेतृत्व क्षमता असाधारण होती है। लग्न में बुध: बुध लग्न में हो तो जातक बुद्धिमान, वाक्पटु और व्यापार-कुशल होता है। महर्षि पाराशर कहते हैं — “बुधे लग्ने विदग्धश्च हास्यप्रियः” — बुध लग्न में हो तो विद्वान और हास्यप्रिय। ऐसे जातक बहुमुखी प्रतिभा के होते हैं। युवा दिखते हैं। लेखन, संचार और व्यापार में सफलता। लग्न में गुरु: यह लग्न में सर्वाधिक शुभ स्थान है। महर्षि पाराशर ने कहा है — “गुरौ लग्ने विशालाक्षो ज्ञानवान् धार्मिकः सुखी” — गुरु लग्न में हो तो विशाल नेत्र, ज्ञानवान, धार्मिक और सुखी जातक। ऐसे जातकों में एक स्वाभाविक गुरुत्व और प्रामाणिकता होती है। शरीर स्थूल हो सकता है। आध्यात्मिकता और उदारता स्वाभाविक होती है। लग्न में शुक्र: शुक्र लग्न में हो तो जातक अत्यन्त आकर्षक, कलाप्रिय और सामाजिक होता है। “शुक्रे लग्ने सुरूपश्च काव्यप्रियः सुखी” — शुक्र लग्न में हो तो सुन्दर रूप, काव्यप्रिय और सुखी। ऐसे जातकों में एक विशेष चुम्बकत्व होता है। प्रेम जीवन समृद्ध। लग्न में शनि: शनि लग्न में हो तो जातक गम्भीर, अनुशासित और परिश्रमी होता है। “शनौ लग्ने कृशः कृष्णो दीर्घाङ्गो मन्दगामी च” — शनि लग्न में हो तो जातक दुबला, काले रंग का, दीर्घ अंग वाला और धीरे चलने वाला। ऐसे जातक उम्र से बड़े दिखते हैं। जीवन में देर से परन्तु स्थायी सफलता। वात विकार की सम्भावना। लग्न में राहु: राहु लग्न में हो तो जातक रहस्यमय और असाधारण महत्त्वाकांक्षी होता है। समाज में अलग पहचान बनाने की तीव्र इच्छा। मन में भटकाव और अनिश्चितता। परन्तु यदि राहु शुभ ग्रह के साथ या शुभ राशि में हो तो विशेष सफलता। लग्न

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अध्याय ४.१ — बारह भावों का परिचय | केन्द्र, त्रिकोण, त्रिक और योगकारक | वैदिक ज्योतिष पाठ्यक्रम

वैदिक ज्योतिष में कुण्डली के बारह भाव — यह केवल बारह खाने नहीं हैं। ये बारह भाव मानव जीवन के समस्त अनुभवों का एक सम्पूर्ण मानचित्र हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक, शरीर से लेकर आत्मा तक, माता से लेकर मोक्ष तक — जो कुछ भी इस जीवन में है, वह इन बारह भावों में समाया हुआ है। पाँच वर्षों के ज्योतिष परामर्श में मैंने यह अनुभव किया है कि जो जातक अपनी कुण्डली के भावों को समझ लेता है, वह अपने जीवन के रहस्यों को समझ लेता है। मॉड्यूल ४ में हम बारह भावों का गहन अध्ययन करेंगे। आज इस प्रथम अध्याय में हम भावों की मूलभूत संरचना, उनके कारकत्व और कालपुरुष की कुण्डली को समझेंगे। शास्त्र में भावों का परिचय “तनुधनसहजसुहृद्सुतशत्रुकलत्रमृत्युधर्मार्थलाभव्ययाः। क्रमेण भावाः स्मृता द्वादश जन्मकुण्डल्याम्॥” बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय ११ अर्थात् — तनु (शरीर), धन, सहज (भाई-बहन), सुहृद् (माता-सम्बन्धी), सुत (सन्तान), शत्रु, कलत्र (पत्नी), मृत्यु, धर्म, अर्थ (कर्म), लाभ और व्यय — ये क्रमशः जन्म कुण्डली के बारह भाव हैं। महर्षि पाराशर ने इस एक श्लोक में बारह भावों का सार दे दिया है। प्रत्येक भाव जीवन के एक पहलू का कारक है और यह कारकत्व शाश्वत है। “लग्नाद् द्वादश भावानां फलं वक्ष्याम्यशेषतः। प्रत्येकं भावविचारे ग्रहस्थितिं विचारयेत्॥” जातक परिजात, भावाध्याय जातक परिजात में कहा गया है — लग्न से बारह भावों का सम्पूर्ण फल बताया जाएगा। प्रत्येक भाव के विचार में ग्रहों की स्थिति का विचार करना चाहिए। यह सूत्र भाव विश्लेषण का मूल आधार है। कालपुरुष की कुण्डली — भावों का आधार वैदिक ज्योतिष में कालपुरुष की अवधारणा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कालपुरुष वह विराट पुरुष है जिसके शरीर के विभिन्न अंग बारह राशियों और बारह भावों से सम्बन्धित हैं। महर्षि पाराशर ने बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में कहा है कि समस्त ब्रह्माण्ड एक विराट पुरुष का रूप है और जन्म कुण्डली उस विराट पुरुष का लघु रूप है। कालपुरुष की कुण्डली में मेष राशि प्रथम भाव में होती है — यह सिर का भाव है। वृषभ द्वितीय भाव में — यह मुख और कण्ठ का भाव है। मिथुन तृतीय — भुजाएँ। कर्क चतुर्थ — हृदय और वक्ष। सिंह पञ्चम — पेट। कन्या षष्ठ — आँतें। तुला सप्तम — कमर और गुर्दे। वृश्चिक अष्टम — प्रजनन अंग। धनु नवम — जाँघें। मकर दशम — घुटने। कुम्भ एकादश — पिण्डलियाँ। मीन द्वादश — पैर। यह कालपुरुष की कुण्डली इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि जब हम किसी भी लग्न की कुण्डली का विश्लेषण करते हैं तो हम उसे इस कालपुरुष की सार्वभौमिक संरचना के सन्दर्भ में देखते हैं। भावों का वर्गीकरण वैदिक ज्योतिष में बारह भावों को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। यह वर्गीकरण कुण्डली विश्लेषण का आधार है और इसे समझे बिना ज्योतिष का सही ज्ञान सम्भव नहीं। केन्द्र भाव (Kendra) — १, ४, ७, १०: केन्द्र का अर्थ है केन्द्र या धुरी। ये चार भाव कुण्डली की नींव हैं। लग्न भाव (१), चतुर्थ भाव (४), सप्तम भाव (७) और दशम भाव (१०) — ये चारों भाव कुण्डली में विष्णु के स्थान के रूप में जाने जाते हैं। इन भावों में बैठे ग्रह अत्यन्त शक्तिशाली होते हैं। लग्न भाव पूर्व दिशा का, चतुर्थ उत्तर का, सप्तम पश्चिम का और दशम दक्षिण दिशा का प्रतिनिधित्व करता है। त्रिकोण भाव (Trikona) — १, ५, ९: त्रिकोण भाव लक्ष्मी के स्थान के रूप में जाने जाते हैं। लग्न भाव (जो केन्द्र और त्रिकोण दोनों है), पञ्चम भाव और नवम भाव — ये तीनों भाव कुण्डली के सर्वाधिक शुभ भाव हैं। इन भावों के स्वामी ग्रह और यहाँ स्थित ग्रह जातक को भाग्य, धर्म और सन्तान का सुख देते हैं। लग्न भाव का विशेष महत्त्व है क्योंकि यह केन्द्र और त्रिकोण दोनों है। उपचय भाव — ३, ६, १०, ११: उपचय का अर्थ है वृद्धि। इन भावों में स्थित ग्रह समय के साथ और अधिक शुभ फल देते हैं। विशेषकर पाप ग्रह उपचय भावों में शुभ होते हैं। पाँच वर्षों के अनुभव में मैंने देखा है कि जिन जातकों के उपचय भाव बलवान होते हैं वे जीवन में निरन्तर प्रगति करते रहते हैं। त्रिक या दुष्ट भाव — ६, ८, १२: ये तीन भाव कुण्डली में कठिनाइयों के भाव माने जाते हैं। षष्ठ भाव रोग और शत्रु का, अष्टम भाव मृत्यु और रहस्य का, द्वादश भाव व्यय और हानि का कारक है। परन्तु यह ध्यान रखें कि इन भावों का भी अपना महत्त्व है — षष्ठ भाव में बलवान ग्रह शत्रुओं पर विजय देता है, अष्टम भाव में शुभ ग्रह दीर्घायु देता है और द्वादश भाव में शुभ ग्रह आध्यात्मिक उन्नति देता है। मारक भाव — २, ७: मारक का अर्थ है मृत्यु देने वाला। द्वितीय और सप्तम भाव मारक भाव कहलाते हैं। लगु पाराशरी में स्पष्ट कहा गया है — “द्वितीयसप्तमाधीशा मारकेशा इति स्मृताः” — द्वितीय और सप्तम के स्वामी ग्रह मारकेश कहलाते हैं। आयु के अन्त में इन्हीं की दशा या उनसे सम्बन्धित ग्रहों की दशा प्राणान्तक होती है। भाव बल — भाव कितना शक्तिशाली है केवल भाव का स्थान देखना पर्याप्त नहीं — भाव का बल भी देखना आवश्यक है। महर्षि पाराशर ने कहा है: “शुभग्रहयुते दृष्टे भावे तद्भावसम्पदः। पापयुक्ते तु दृष्टे वा भावनाशो भवेद् ध्रुवम्॥” बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय ११ अर्थात् — जो भाव शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हो, उस भाव की समृद्धि होती है। जो भाव पाप ग्रहों से युत या दृष्ट हो, उस भाव का नाश निश्चित है। यह सूत्र भाव विश्लेषण का सबसे मूलभूत नियम है। भाव का बल मुख्यतः इन बातों से निर्धारित होता है। पहला — भावेश (भाव का स्वामी) कहाँ है और किस अवस्था में है। भावेश यदि उच्च राशि में, स्वराशि में या मित्र राशि में हो तो भाव बलवान होता है। दूसरा — भाव में कौन से ग्रह स्थित हैं। शुभ ग्रहों की उपस्थिति भाव को बलवान बनाती है। तीसरा — भाव पर किन ग्रहों की दृष्टि है। चौथा — भावेश और भाव दोनों पर शुभ और पाप ग्रहों का प्रभाव। भाव कारक — प्रत्येक भाव का नैसर्गिक कारक प्रत्येक भाव का एक नैसर्गिक कारक ग्रह होता है। यह कारक ग्रह उस भाव के विषयों का प्राकृतिक प्रतिनिधि है। भाव विश्लेषण में भावेश और कारक दोनों को देखना आवश्यक है। प्रथम भाव का कारक

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