>आज, 24 जुलाई 2026 की शाम, पुरी की गलियां फिर से उसी उत्साह से भर उठेंगी जो नौ दिन पहले रथ यात्रा के दिन थीं — फ़र्क सिर्फ इतना है कि आज रथ उल्टी दिशा में चलेंगे। यही है बहुड़ा यात्रा — भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के अपने घर, श्रीमंदिर, वापस लौटने का दिन। इसे उल्टा रथ भी कहा जाता है, और इसकी कहानी जितनी भावुक है, उतनी ही मज़ेदार भी।
पहले थोड़ा पीछे चलें — 16 जुलाई की याद
नौ दिन पहले, 16 जुलाई को, तीनों देवी-देवता अपने विशाल रथों — नंदीघोष, तालध्वज और दर्पदलन — पर सवार होकर श्रीमंदिर से निकले थे और गुंडीचा मंदिर पहुंचे थे। पौराणिक मान्यता के अनुसार गुंडीचा मंदिर उनकी मौसी (मां की बहन) का घर है, और यह पूरी यात्रा मानो एक पारिवारिक “वेकेशन” है — भगवान भी सात दिन अपने मायके जैसी जगह पर आराम करते हैं। (अगर आपने रथ यात्रा वाला पूरा किस्सा नहीं पढ़ा, तो यहां पूरी कहानी पढ़ें।)

बीच में एक नाटकीय मोड़ — हेरा पंचमी
इस पूरी कथा में एक दिलचस्प उप-कथा भी छुपी है। रथ यात्रा के पांचवें दिन, देवी लक्ष्मी — जो जगन्नाथ जी की पत्नी मानी जाती हैं — यह पता चलने पर कि उन्हें साथ लिए बिना ही भगवान गुंडीचा चले गए, नाराज़ होकर स्वयं वहां पहुंच जाती हैं। कहा जाता है कि गुस्से में उन्होंने रथ के एक हिस्से को भी क्षतिग्रस्त कर दिया था। इसे हेरा पंचमी कहा जाता है — और यह वही नाराज़गी है जो आगे चलकर आज की कहानी में एक मीठे मोड़ पर खत्म होगी।
आज — बहुड़ा यात्रा, यानी घर वापसी
सात दिन गुंडीचा में बिताने के बाद, आज तीनों देवता उन्हीं रथों पर सवार होकर वापस श्रीमंदिर की ओर चलते हैं। रस्सियां फिर खींची जाती हैं, वही भीड़, वही जयकारे — बस दिशा उल्टी। यही वजह है कि इसे “उल्टा रथ” कहा जाता है। लेकिन वापसी का रास्ता सीधा नहीं है — बीच में एक बेहद प्यारा पड़ाव आता है।
वापसी के रास्ते में रथ हर साल, बिना नागा, मौसी माँ मंदिर के सामने रुकते हैं। कथा है कि मौसी माँ ने भगवान से विनती की थी कि जब भी वे लौटें, अपने हाथों से बना भोजन ज़रूर चखें — और भगवान ने वचन दिया: “जब भी मैं गुंडीचा से लौटूंगा, तुम्हारे द्वार पर रुकूंगा।” इसी वचन के चलते आज भी रथ यहां रुकते हैं और देवताओं को पोड़ पीठा — चावल के आटे, गुड़ और नारियल से बना, धीमी आंच पर सिका हुआ पारंपरिक ओड़िया पकवान — अर्पित किया जाता है।

सबसे मज़ेदार हिस्सा — रसगुल्ला दिवस!
अब आता है वह हिस्सा जो इस पूरी कथा को सबसे ज़्यादा दिलचस्प बनाता है। श्रीमंदिर लौटने पर देवी लक्ष्मी, जो अभी भी हेरा पंचमी वाली नाराज़गी भुली नहीं हैं, मंदिर का द्वार बंद कर देती हैं और भगवान को अंदर आने से रोक देती हैं। भगवान जगन्नाथ उन्हें मनाने के लिए क्या करते हैं? वे उन्हें रसगुल्ला भेंट करते हैं — और तभी देवी मान जाती हैं और द्वार खुलते हैं। इस पल को नीलाद्रि बिजे कहा जाता है (आमतौर पर बहुड़ा यात्रा के एक-दो दिन बाद), और 2015 से ओडिशा में इस दिन को विधिवत रसगुल्ला दिवस के रूप में मनाया जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि यह किस्सा उस मशहूर बहस में भी एक तर्क के तौर पर पेश किया जाता है कि रसगुल्ला असल में बंगाल का है या ओडिशा का — क्योंकि यह परंपरा सदियों पुरानी बताई जाती है, यानी मिठाई का यहां होना बंगाल में इसके प्रचलित होने से भी पहले का हो सकता है। बहस आज भी अनसुलझी है, लेकिन एक भगवान को मनाने के लिए मिठाई का सहारा लेना — यह बात किसी भी भारतीय परिवार को तुरंत अपनी लगेगी।
गहरी बात — यह कथा हमें क्या सिखाती है
ऊपर से देखने पर यह एक रंगीन, उत्सव भरी कथा लगती है, लेकिन इसके भीतर एक गहरी सीख भी छुपी है। जगन्नाथ जी की यह पूरी यात्रा — घर से निकलना, मौसी के घर समय बिताना, और फिर पत्नी की नाराज़गी को एक छोटी-सी मीठी भेंट से दूर करके फिर से घर में प्रवेश पाना — यह किसी दूर के देवता की कथा नहीं, बल्कि हर परिवार के भीतर बार-बार दोहराई जाने वाली एक बहुत मानवीय प्रक्रिया है। रिश्तों में दूरी बनती है, नाराज़गी आती है, और अक्सर उसे पाटने के लिए बड़े तर्कों की नहीं, बल्कि एक छोटी, सच्ची भावना की ज़रूरत होती है।
यही कारण है कि जगन्नाथ जी को “मानवीय देवता” कहा जाता है — वे मंदिर के गर्भगृह में स्थिर, दूर और अपरिवर्तनीय नहीं बैठे, बल्कि हर साल घर से निकलते हैं, थकते हैं, माफी मांगते हैं, मनाते हैं, और फिर लौटते हैं — बिल्कुल वैसे ही जैसे हम सब जीवन में करते हैं। यही वजह है कि सनातन परंपरा में उत्सव सिर्फ कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन के गहरे भावों का प्रतिबिंब होते हैं।
अगर आप पुरी नहीं जा पा रहे, तो भी इस दिन अपने घर में परिवार के साथ बैठकर कोई मीठा बांटना, किसी पुरानी नाराज़गी को हल्के मन से दूर करना, या बस भगवान जगन्नाथ की इस “घर वापसी” की कथा को अपने बच्चों को सुनाना — यही इस दिन की सबसे सरल और सुंदर विधि है।
अगले लेखों में हम चातुर्मास और सावन से जुड़े और भी व्रत-त्योहार विस्तार से पढ़ेंगे — तब तक के लिए, बहुड़ा यात्रा की शुभकामनाएं। जय जगन्नाथ!

Ajit Kumar Nath — AstroVgyaan ke sansthapak aur research lead. Inka vishwas hai ki gyan ka asli uddeshya seva hai — isliye inka kaam kabhi bhi vyaktigat consultation ya paid sessions tak simit nahi raha. Vedic Jyotish (Parashari Hora Shastra, Jaimini Sutram, Bhrigu Nandi Nadi), Lal Kitab, Vastu Shastra aur Ank Jyotish (Numerology) par varshon ka swatantra adhyayan aur shodh karke, unhe saral, imandaar aur research-aadharit lekhon ke roop mein sabke liye free upalabdh karana — yahi inka jeevan-uddeshya hai. Research aur collaboration ke liye: astrovgyaan@gmail.com


