
पिछले अध्याय में हमने सीखा कि वास्तु पुरुष मंडल एक वर्गाकार क्षेत्र को छोटी-छोटी कोशिकाओं (पद) में बाँटने की प्रणाली है। लेकिन एक पद वाले मंडल से लेकर सैकड़ों पद वाले विशाल मंडल तक — शास्त्रों में यह विभाजन कितने प्रकार का हो सकता है? मयमतम् और मानसार जैसे ग्रंथों में इस प्रश्न का उत्तर बहुत व्यवस्थित ढंग से दिया गया है — कुल ३२ नामित मंडल प्रकारों की एक शृंखला, जो १ पद से शुरू होकर १,०२४ पद तक जाती है। इस अध्याय में हम इस पूरी शृंखला को समझेंगे — यह किस गणितीय नियम पर आधारित है, कौन-से मंडल आज भी प्रयोग में हैं, और कौन-से केवल शास्त्रीय संदर्भ के लिए बचे हैं।
📐 पद कैसे बढ़ते हैं — मंडल की गणितीय संरचना
वास्तु पुरुष मंडल हमेशा एक वर्ग (square) होता है, और उसे बराबर भागों में बाँटा जाता है। अगर वर्ग की एक भुजा को n बराबर हिस्सों में बाँटा जाए, तो कुल पद की संख्या n × n होगी। यानी भुजा 1 भाग में बँटे तो 1 पद, भुजा 2 भागों में बँटे तो 4 पद, भुजा 3 भागों में बँटे तो 9 पद — यह क्रम इसी तरह आगे बढ़ता है। इसी सरल गणितीय नियम पर पूरी ३२-मंडल शृंखला टिकी है, जो 1×1 से शुरू होकर 32×32 (यानी 1,024 पद) तक जाती है। हर चरण का अपना एक शास्त्रीय नाम है, और शुरुआती कुछ नाम आज भी वास्तु सलाहकारों की भाषा में सुने जाते हैं।
| भुजा विभाजन | कुल पद | मंडल का नाम | मुख्य उपयोग |
|---|---|---|---|
| 1 × 1 | 1 | सकल (Sakala) | अत्यंत छोटे मंदिर, स्तंभ-स्थापना |
| 2 × 2 | 4 | पेचक (Pechaka) | छोटी वेदी, गृह-पूजा स्थल |
| 3 × 3 | 9 | पीठ (Pitha) | छोटे मंदिर का गर्भगृह-आधार |
| 4 × 4 | 16 | महापीठ (Mahapitha) | मध्यम आकार की वेदी-रचना |
| 5 × 5 | 25 | उपपीठ (Upapitha) | विस्तृत पूजा-स्थल योजना |
| 6 × 6 | 36 | उग्रपीठ (Ugrapitha) | बड़े मंदिर परिसर का आधार |
| 7 × 7 | 49 | स्थण्डिल (Sthandila) | यज्ञशाला एवं हवन-स्थल योजना |
| 8 × 8 | 64 | मण्डूक / चण्डित (Manduka/Chandita) | मंदिर निर्माण — सबसे प्रचलित (देखें अध्याय ३.३) |
| 9 × 9 | 81 | परमशायिक (Paramasayika) | गृह निर्माण — सबसे प्रचलित (देखें अध्याय ३.४) |
| 10 × 10 | 100 | आसन (Asana) | बड़े राजमहल एवं संस्थान-भवन |
यह क्रम इसके बाद भी आगे बढ़ता है — 11×11 से लेकर 32×32 तक — और हर चरण का अपना शास्त्रीय नाम मयमतम् में दर्ज है। लेकिन जैसे-जैसे भुजा बड़ी होती जाती है, मंडल का व्यावहारिक उपयोग घटता जाता है, क्योंकि इतनी बड़ी योजना केवल विशाल राजमहल या बहु-मंदिर परिसर जैसी दुर्लभ संरचनाओं में ही काम आती थी।

🔹 सबसे छोटे तीन मंडल — सकल, पेचक और पीठ
सकल (1 पद) सबसे सरल मंडल है — पूरा वर्ग एक ही इकाई माना जाता है, बिना किसी आंतरिक विभाजन के। इसका उपयोग बहुत छोटी संरचनाओं में होता है, जैसे किसी स्तंभ या स्तूप की नींव रखते समय, जहाँ जगह इतनी सीमित हो कि विभाजन का कोई व्यावहारिक अर्थ न रहे।
पेचक (4 पद) में वर्ग को चार बराबर भागों में बाँटा जाता है। यह घर के भीतर एक छोटी पूजा-वेदी या तुलसी-चौरा जैसी संरचना बनाते समय उपयोगी होता है, जहाँ केंद्र और चार दिशाओं का बुनियादी भेद दिखाना ज़रूरी है।
पीठ (9 पद) पहला मंडल है जिसमें एक स्पष्ट केंद्रीय कोशिका (ब्रह्मस्थान) और उसे घेरने वाली आठ बाहरी कोशिकाएँ होती हैं — यानी अष्ट दिशाओं का प्रतिनिधित्व यहीं से शुरू होता है। छोटे मंदिरों के गर्भगृह की आधार-योजना अक्सर इसी 3×3 ढाँचे पर टिकी होती है।
🔸 महापीठ से आसन तक — मध्यम आकार के मंडल
16 पद (महापीठ) से लेकर 100 पद (आसन) तक के मंडल मध्यम आकार की संरचनाओं के लिए उपयोग होते थे — बड़ी वेदियाँ, यज्ञशालाएँ, और मध्यम आकार के मंदिर परिसर। इनमें कोशिकाओं की संख्या बढ़ने के साथ देवताओं और दिशाओं का विभाजन भी अधिक सूक्ष्म होता जाता है, जिससे वास्तुकार को भवन के हर हिस्से को किसी विशेष देवता या तत्व से जोड़ने की अधिक स्वतंत्रता मिलती है। उदाहरण के लिए, स्थण्डिल (49 पद) का उपयोग विशेष रूप से यज्ञ और हवन से जुड़ी संरचनाओं की योजना में होता था, जहाँ अग्नि-स्थान की सटीक स्थिति बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती थी।
⭐ ६४ और ८१ पद सबसे महत्वपूर्ण क्यों माने जाते हैं
पूरी ३२-मंडल शृंखला में से आज केवल दो मंडल वास्तव में व्यापक रूप से प्रयोग होते हैं — मण्डूक/चण्डित (64 पद) और परमशायिक (81 पद)। मयमतम् और बृहत्संहिता दोनों में इन दोनों को विशेष स्थान दिया गया है क्योंकि इनकी कोशिका-संख्या इतनी है कि हर महत्वपूर्ण दिशा, उप-दिशा और देवता को एक स्पष्ट स्थान मिल जाता है — न बहुत कम कि विवरण अधूरा रह जाए, न बहुत ज़्यादा कि सामान्य निर्माण में लागू करना अव्यावहारिक हो जाए। परंपरागत रूप से 64-पद मंडल का उपयोग मंदिर निर्माण के लिए और 81-पद मंडल का उपयोग गृह निर्माण के लिए किया जाता रहा है — इन दोनों को हम अगले दो अध्यायों (३.३ और ३.४) में पूरे विस्तार से समझेंगे, जिसमें हर पद का नाम, अधिष्ठाता देवता और व्यावहारिक उपयोग शामिल होगा।
🔍 शेष मंडल — व्यवहार में दुर्लभ क्यों हैं
100 पद से आगे 11×11 (121 पद) से लेकर 32×32 (1,024 पद) तक के मंडल शास्त्रों में वर्णित तो हैं, लेकिन व्यावहारिक निर्माण में लगभग कभी उपयोग नहीं होते। इसके तीन मुख्य कारण हैं। पहला, इतनी बड़ी योजना केवल विशाल राजमहल, बहु-भवन मंदिर परिसर, या नगर-नियोजन जैसी दुर्लभ परियोजनाओं में ही व्यावहारिक होती है — सामान्य घर या मंदिर के लिए इतनी सूक्ष्मता की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। दूसरा, जैसे-जैसे कोशिकाएँ बढ़ती हैं, हर कोशिका का आकार इतना छोटा हो जाता है कि ज़मीन पर उसे सटीकता से चिह्नित करना कठिन हो जाता था — प्राचीन काल में यह माप रस्सी और लकड़ी के औज़ारों से होता था, जिनकी सीमाएँ थीं। तीसरा, समय के साथ 64 और 81 पद के मंडल इतने मानक बन गए कि बाकी शृंखला ग्रंथों में केवल सैद्धांतिक पूर्णता के लिए दर्ज रह गई, व्यवहार में शिल्पशास्त्रियों की पाठ्य-परंपरा में इन्हें आगे नहीं बढ़ाया गया। इसीलिए आधुनिक वास्तु-सलाहकार भी लगभग हमेशा इन्हीं दो मंडलों का संदर्भ देते हैं, बाकी शृंखला का उल्लेख केवल ऐतिहासिक पूर्णता के लिए किया जाता है।
❓ सामान्य प्रश्न (FAQ)
1. क्या घर बनाते समय सभी ३२ मंडल में से चुनना पड़ता है?
नहीं। व्यवहार में लगभग हमेशा 81-पद (परमशायिक) मंडल का ही उपयोग होता है। बाकी शृंखला शास्त्रीय ज्ञान के लिए है, दैनिक निर्माण-निर्णय के लिए नहीं।
2. सकल या पेचक जैसे छोटे मंडल आज किस काम आते हैं?
ये आज मुख्यतः घर के भीतर छोटी पूजा-वेदी, तुलसी-चौरा या स्तंभ-स्थापना जैसी सूक्ष्म संरचनाओं में प्रतीकात्मक रूप से प्रयोग होते हैं, पूरे भवन की योजना में नहीं।
3. क्या पद जितने ज़्यादा हों, वास्तु उतना ही बेहतर माना जाता है?
नहीं। पद की संख्या संरचना के आकार और उद्देश्य के अनुसार होनी चाहिए। ज़्यादा पद का मतलब बेहतर वास्तु नहीं, बल्कि अधिक सूक्ष्म विभाजन है — जो हर भवन के लिए ज़रूरी नहीं।
4. 64 और 81 पद वाले मंडल में मुख्य अंतर क्या है?
64-पद मंडल परंपरागत रूप से मंदिर-निर्माण के लिए और 81-पद मंडल गृह-निर्माण के लिए प्रयोग होता है — दोनों की देवता-स्थिति और उपयोग अगले दो अध्यायों में विस्तार से बताए गए हैं।
5. क्या यह ३२ मंडल वर्गीकरण सभी शास्त्रीय ग्रंथों में समान है?
मूल सिद्धांत — भुजा को n भागों में बाँटकर n² पद बनाना — सभी प्रमुख ग्रंथों (मयमतम्, मानसार, बृहत्संहिता) में समान है, हालाँकि नामों और छोटे विवरणों में क्षेत्रीय भिन्नता मिलती है।
अगले अध्याय में हम 64-पद मण्डूक/चण्डित मंडल को पूरे विस्तार से समझेंगे — मंदिर निर्माण में इसका उपयोग, हर पद की देवता-स्थिति, और यह गर्भगृह की योजना को कैसे निर्धारित करता है।
🎓 पिछला अध्याय: अध्याय ३.१ — वास्तु पुरुष मंडल क्या है | अगला अध्याय: ३.३ — मण्डूक/चण्डित मंडल (६४ पद)
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Ajit Kumar Nath — AstroVgyaan ke sansthapak aur research lead. Inka vishwas hai ki gyan ka asli uddeshya seva hai — isliye inka kaam kabhi bhi vyaktigat consultation ya paid sessions tak simit nahi raha. Vedic Jyotish (Parashari Hora Shastra, Jaimini Sutram, Bhrigu Nandi Nadi), Lal Kitab, Vastu Shastra aur Ank Jyotish (Numerology) par varshon ka swatantra adhyayan aur shodh karke, unhe saral, imandaar aur research-aadharit lekhon ke roop mein sabke liye free upalabdh karana — yahi inka jeevan-uddeshya hai. Research aur collaboration ke liye: astrovgyaan@gmail.com






