अध्याय ७.५ — चर दशा गणना विधि: आपकी अपनी टाइमलाइन कैसे बनती है | Jaimini Sutram Course
विंशोत्तरी दशा में सबकी कुल दशा १२० वर्ष की होती है, चाहे कुंडली कुछ भी हो। लेकिन जैमिनी की अपनी दशा-पद्धति में यह संख्या हर व्यक्ति के लिए अलग होती है — किसी की ८० वर्ष, किसी की १००, किसी की ९५। ऐसा क्यों? क्योंकि जैमिनी की चर दशा नक्षत्र से नहीं, सीधे राशियों से गणित होती है — और हर राशि अपने स्वामी की स्थिति के हिसाब से अपनी अलग समय-अवधि खुद तय करती है। यही जैमिनी का दूसरा बड़ा, मूलभूत योगदान है — अर्गला और चर कारक के बाद। चर दशा क्या है — विंशोत्तरी से बुनियादी अंतर विंशोत्तरी दशा चंद्रमा की नक्षत्र-स्थिति से शुरू होती है और हर ग्रह की दशा एक निश्चित वर्षों तक चलती है — सूर्य ६, चंद्रमा १०, मंगल ७, राहु १८, गुरु १६, शनि १९, बुध १७, केतु ७, शुक्र २० — कुल १२० वर्ष। यह सबके लिए समान है। जैमिनी की चर दशा बिल्कुल अलग सोच से बनती है — यहाँ लग्न से शुरुआत होती है, और हर राशि की दशा-अवधि उसकी अपनी कुंडली के हिसाब से गणना की जाती है। यहाँ मेरी सोच यह है — इस फर्क को समझना ज़रूरी है क्योंकि यह दो प्रकार की ज्योतिष-सोच दिखाता है। विंशोत्तरी एक “सार्वभौमिक घड़ी” जैसी है जो सबके लिए एक जैसी चलती है। चर दशा एक “व्यक्तिगत घड़ी” है जो खुद कुंडली के भीतर से अपनी लय निकालती है — किसी के लिए तेज़ी से, किसी के लिए धीरे। दिशा का निर्धारण — क्रम या उत्क्रम? सबसे पहला कदम है यह तय करना कि पूरी दशा-श्रृंखला क्रम (सीधी, आगे की तरफ) चलेगी या उत्क्रम (उलटी, पीछे की तरफ)। इसके लिए जैमिनी एक खास सूत्र देता है — लग्न से नवम राशि देखनी होती है। बारह राशियों को लग्न से शुरू करके तीन-तीन के चार समूह (पद) में बाँट लें — पहला पद (लग्न से १-२-३), दूसरा पद (४-५-६), तीसरा पद (७-८-९), चौथा पद (१०-११-१२)। अगर नवम राशि पहले या तीसरे पद (यानी विषम-पद) में आए, तो पूरी चर दशा लग्न से क्रम (आगे की दिशा, जैसे मेष→वृष→मिथुन) में चलती है। अगर नवम राशि दूसरे या चौथे पद (सम-पद) में आए, तो उत्क्रम (पीछे की दिशा) में चलती है। उदाहरण: अगर लग्न तुला है, तो तुला से नवम राशि मिथुन है। लग्न से गिनती करें — तुला (१), वृश्चिक (२), धनु (३), मकर (४), कुंभ (५), मीन (६), मेष (७), वृषभ (८), मिथुन (९) — नवम स्थान तीसरे पद (७-८-९) में आता है, जो विषम है। इसलिए इस कुंडली की पूरी चर दशा क्रम में चलेगी — तुला के बाद वृश्चिक, फिर धनु, आगे इसी तरह। हर राशि की दशा कितने वर्ष की — गणना विधि अब असली सवाल — हर राशि की दशा कितने वर्ष चलेगी? जैमिनी का जवाब सुंदर है: उस राशि से उसके स्वामी तक गिनती करो (उस राशि की अपनी पद-दिशा में — पहले-तीसरे पद की राशियों के लिए क्रम, दूसरे-चौथे पद की राशियों के लिए उत्क्रम), जितनी राशियाँ गिनकर स्वामी तक पहुँचते हो, उतने ही वर्ष उस राशि की दशा होगी। अगर स्वामी उस राशि से दूसरे स्थान में हो → १ वर्ष अगर स्वामी तीसरे स्थान में हो → २ वर्ष …इसी तरह आगे बढ़ते हुए, अगर स्वामी बारहवें स्थान में हो → ११ वर्ष अगर स्वामी खुद उसी राशि में बैठा हो (स्वग्रही) → पूरे १२ वर्ष (पूरा चक्र) इसके बाद दो ज़रूरी सुधार होते हैं: अगर स्वामी उच्च राशि में हो, तो १ वर्ष जोड़ दिया जाता है; अगर नीच राशि में हो, तो १ वर्ष घटा दिया जाता है। यह छोटा सा स्पर्श दिखाता है कि जैमिनी कितनी सूक्ष्मता से ग्रह की अवस्था को भी दशा-गणना में शामिल करता है — सिर्फ स्थिति नहीं, उसकी गुणवत्ता भी मायने रखती है। 🔮 अपनी चर दशा की पूरी तालिका निकलवाएं यह गणना बहुत सूक्ष्म है — सटीक जन्म-विवरण के साथ अपनी कुंडली बनवाएं। फ्री कुंडली बनाएं → वृश्चिक और कुंभ — जब राशि के दो स्वामी हों जैमिनी पद्धति में वृश्चिक राशि के दो स्वामी माने जाते हैं — मंगल और केतु (क्योंकि केतु को वृश्चिक का सह-स्वामी माना गया है), और कुंभ के भी दो स्वामी — शनि और राहु। जब किसी राशि के दो स्वामी हों, तो एक साफ नियम लगता है: अगर एक स्वामी उसी राशि में हो और दूसरा कहीं और हो, तो दूसरे वाले (जो बाहर है) तक की गिनती ली जाती है — जो अपनी ही राशि में बैठा है वह इस हिसाब में “उपयोगी नहीं” माना जाता है। अगर दोनों ही अपनी-अपनी राशि में बैठे हों, तो सीधे १२ वर्ष। अगर दोनों बाहर, अलग-अलग राशियों में हों, तो जो ग्रहयुक्त (दूसरे ग्रहों के साथ संग में) हो, वह बली माना जाता है — उसी तक गिनती ली जाती है। अगर ग्रह-युक्ति भी बराबर हो, तो नैसर्गिक बल (चर > स्थिर > द्विस्वभाव राशि में बैठे ग्रह का क्रम) देखा जाता है — यही तर्क हम अर्गला के बाधकापवाद नियम में भी देख चुके हैं, इसलिए जैमिनी प्रणाली कितनी आपस में जुड़ी हुई है, यह यहाँ फिर से साफ होता है। दशा का क्रम — पूरा उदाहरण चक्र ग्रंथ में दिया गया एक उदाहरण दिखाता है कि तुला-लग्न की कुंडली में पूरी चर दशा क्रम से इस तरह चल सकती है: तुला (२ वर्ष) → वृश्चिक (९) → धनु (५) → मकर (६) → कुंभ (७) → मीन (१०) → मेष (१) → वृषभ (७) → मिथुन (८) → कर्क (८) → सिंह (६) → कन्या (७) — इस पूरे चक्र का कुल ८६ वर्ष हुआ। ध्यान दें — यह कुल १२० (विंशोत्तरी जैसा) नहीं है, न ही किसी निश्चित संख्या के बराबर। हर कुंडली का अपना, अनोखा कुल होता है — यही चर दशा की सबसे खास बात है। अंतर्दशा की झलक — १४४ आवृत्ति ग्रंथ एक ज़रूरी सूत्र भी देता है — “यावद्विवेक-मावृत्तिर्भानाम्” — हर राशि की महादशा के भीतर, बाकी सभी १२ राशियों की अंतर्दशा (उप-अवधि) बनती है। इसलिए १२ महादशाओं × १२ अंतर्दशाओं = १४४ अंतर्दशा-आवृत्ति पूरी चर दशा में होती हैं। अंतर्दशा की अवधि महादशा के वर्ष को १२ से आनुपातिक रूप से बाँटकर निकाली जाती है। इसकी पूरी विधि और फल-विचार
अध्याय ७.५ — चर दशा गणना विधि: आपकी अपनी टाइमलाइन कैसे बनती है | Jaimini Sutram Course Read Post »
