“बच्चा तो पराया खून है” — गोद लिए बच्चे को लेकर परिवार का रवैया, सच और अधिकार
“बच्चा तो पराया खून है, बड़ा होकर असली माँ-बाप को ढूंढ लेगा” — गोद लिए बच्चे के माता-पिता को अक्सर यही सुनना पड़ता है, कभी रिश्तेदारों से तंज़ में, कभी पड़ोसियों की उत्सुक निगाहों में। सच यह है कि माँ-बाप और बच्चे के बीच का असली बंधन खून से नहीं, बल्कि रोज़ की देखभाल, भरोसे और समय से बनता है — यह बात सिर्फ भावना नहीं, अटैचमेंट साइकोलॉजी का प्रमाणित विज्ञान है, और भारत का कानून भी गोद लिए बच्चे को जन्मे बच्चे के बराबर ही अधिकार देता है। यह लेख गोद लेने (adoption) को लेकर समाज में फैली शर्म और चुप्पी को समझने के लिए है — कानूनी और वैज्ञानिक जानकारी के लिए। ज्योतिष का हिस्सा आस्था और परंपरा का विषय है, इसे चिकित्सा या कानूनी सलाह न समझें। एडॉप्शन प्रोसेस के लिए हमेशा CARA (cara.wcd.gov.in) और अधिकृत एजेंसी से संपर्क करें। मैंने अपने पाठकों से सैकड़ों कहानियाँ सुनी हैं, और गोद लिए बच्चों के माता-पिता की चिट्ठियाँ कुछ अलग ही होती हैं — उनमें डर कम, थकान ज़्यादा होती है। थकान इस बात की कि हर रिश्तेदारी में, हर स्कूल फॉर्म में, हर “असली माँ कौन है” जैसे सवाल में उन्हें अपने परिवार को सही ठहराना पड़ता है। जबकि प्यार, रातों की नींद, बुखार में जागना — यह सब उतना ही सच है जितना किसी भी जन्मे बच्चे के माता-पिता के लिए। — अजीत कुमार नाथ, संस्थापक, AstroVgyaan विज्ञान क्या कहता है — क्या माँ-बच्चे का बंधन सच में “खून” से बनता है? “अपना खून” वाली सोच जितनी गहरी है, विज्ञान की खोज उतनी ही साफ़ है — माँ-बाप और बच्चे के बीच का लगाव (attachment) जीन से नहीं, बल्कि लगातार, भरोसेमंद देखभाल से बनता है। मनोवैज्ञानिक जॉन बाउल्बी का अटैचमेंट थ्योरी (Attachment Theory) दशकों से यही दिखाता आया है — बच्चा उस व्यक्ति से गहरा जुड़ाव बनाता है जो उसकी ज़रूरतों को लगातार, समय पर पूरा करता है, चाहे वह जैविक माता-पिता हो या नहीं। कई अध्ययनों में गोद लिए बच्चों और उनके दत्तक माता-पिता के बीच का सुरक्षित लगाव (secure attachment) जन्मे बच्चों जितना ही मज़बूत पाया गया है, खासकर जब गोद लेना जल्दी उम्र में हुआ हो। भारत में केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) के आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में 4,515 बच्चे कानूनी रूप से गोद लिए गए — यह 2015 के बाद सबसे ज़्यादा संख्या है। लेकिन मांग और उपलब्धता में भारी अंतर है: हर एक उपलब्ध बच्चे के लिए लगभग 13 प्रतीक्षारत माता-पिता हैं, और प्रतीक्षा अवधि 2022 के 3 साल से बढ़कर 2025 में लगभग 3.5 साल हो चुकी है। यानी जो परिवार गोद लेते हैं, वे बरसों के इंतज़ार, कागज़ी जाँच और होम-स्टडी से गुज़रकर यह ज़िम्मेदारी चुनते हैं — यह किसी “मजबूरी” का फ़ैसला नहीं, एक सोचा-समझा, वैध और गहरा प्रतिबद्ध निर्णय है। तो क्या करें: बंधन बनाने के लिए जल्दी और लगातार जुड़ाव सबसे ज़रूरी है — त्वचा-से-त्वचा संपर्क (skin-to-skin), एक ही व्यक्ति का बार-बार देखभाल करना, बच्चे की भावनाओं को गंभीरता से लेना। यह ठीक वही चीज़ें हैं जो किसी भी जन्मे बच्चे के लिए भी ज़रूरी होती हैं — गोद लेने में कोई “अतिरिक्त” काम नहीं है, सिर्फ शुरुआत अलग होती है। यह भेदभाव कहां से आया — जात-पात, वंश और “अपने खून” की सोच भारत में गोद लेने को लेकर झिझक की जड़ें गहरी और पुरानी हैं। शोध बताते हैं कि इसके केंद्र में एक मान्यता है — “खून” और वंश का महत्व भावनात्मक जुड़ाव से ज़्यादा माना जाता रहा है, जाति-शुद्धता, कुल का नाम और जैविक विरासत को भावनात्मक बंधन से ऊपर रखा गया। आज भी ज़्यादातर परिवार ऐसे बच्चे को गोद लेने से हिचकते हैं जिसकी जातीय पृष्ठभूमि पता न हो — बच्चे की सेहत से पहले उसकी “जाति और खानदान” के बारे में सवाल पूछे जाते हैं। बॉलीवुड और मीडिया ने भी इस सोच को बढ़ावा दिया है — ज़्यादातर फिल्मों में गोद लेना या तो “दान-पुण्य का काम” दिखाया जाता है या निःसंतान दंपति की “मजबूरी”, कभी भी एक सामान्य, गर्व से लिया गया पारिवारिक फ़ैसला नहीं। इसी झिझक का नतीजा है कि भारत में दत्तक माता-पिता अपने परिवार और सामाजिक दायरे में गोद लेने की बात तो खुलकर करते हैं (95% से ज़्यादा), लेकिन खुद बच्चे को यह बात बताने में बहुत हिचकते हैं — एक शोध में सिर्फ 12.8% भारतीय माता-पिता ने अपने बच्चे को उसके गोद लिए होने के बारे में बताया था, बाकी टालते रहे या कभी नहीं बताने का इरादा रखा। ग्रामीण इलाकों और रूढ़िवादी समुदायों में यह भेदभाव और तीखा हो जाता है — दत्तक माता-पिता को स्कूल फॉर्म में “असली पिता का नाम” जैसी माँगों से बार-बार जूझना पड़ता है, जो हर बार परिवार को फिर से साबित करने जैसा भावनात्मक बोझ बन जाता है। ज्योतिष में संतान भाव — गोद लिए बच्चे को लेकर एक बड़ी गलतफहमी पारंपरिक ज्योतिष में पंचम भाव (5th house) को संतान-सुख, स्नेह और पालन-पोषण की क्षमता से जोड़ा जाता है — लेकिन यह भाव माता-पिता के अपने स्वभाव, धैर्य और पालन-पोषण की क्षमता को दर्शाता है, न कि यह कि बच्चा जैविक है या गोद लिया हुआ। कुछ लोग यह गलत धारणा फैलाते हैं कि गोद लिया बच्चा परिवार के लिए “अशुभ” होता है या उसकी कुंडली परिवार से मेल नहीं खाती — यह एक हानिकारक और आधारहीन अंधविश्वास है, जिसका शास्त्रीय ज्योतिष में कोई ठोस आधार नहीं है। असल में हर बच्चे की अपनी जन्मकुंडली स्वतंत्र और पूर्ण होती है — चाहे वह जन्म से परिवार में आया हो या गोद लिया गया हो। जिस तरह संतान में देरी के पीछे पंचमेश, गुरु और सप्तमांश (D7) का विश्लेषण होता है (विस्तार से यहाँ पढ़ें), उसी तरह गोद लेने का फ़ैसला भी परिवार के लिए एक सामान्य, वैध रास्ता है — इसे किसी “दोष” या कुंडली-मेल की कमी से जोड़ना ज्योतिष का दुरुपयोग है, न कि उसका सही प्रयोग। अनकहा पहलू — दुख गोद लेने से नहीं, चुप्पी से मिलता है जिस बात पर सबसे कम चर्चा होती है, वह यह है: बच्चे को सबसे ज़्यादा चोट यह जानकर नहीं लगती कि वह गोद लिया गया था — चोट तब लगती है जब उसे यह सच सालों
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