तलाक़ के बाद मर्द को कुछ नहीं कहा जाता, औरत को “चरित्रहीन” क्यों कहा जाता है?
“तलाक़ के बाद मर्द तो कुछ ही महीनों में दूसरी शादी कर लेता है, समाज उसे कुछ नहीं कहता — लेकिन तलाक़शुदा औरत को जिंदगी भर ‘चरित्रहीन’ या ‘बिगड़ी हुई’ क्यों समझा जाता है?” यह सवाल हजारों भारतीय महिलाएं हर दिन खुद से पूछती हैं। सीधा जवाब: इसकी वजह औरत का कोई दोष नहीं है — यह एक पुरानी पितृसत्तात्मक (patriarchal) सोच है जो औरत की ‘शुद्धता’ और ‘पारिवारिक इज्जत’ को उसके वैवाहिक स्टेटस से जोड़ती है, जबकि मर्द को इसी सोच में पूरी छूट मिलती है। यह डबल स्टैंडर्ड न तो कानून में है, न विज्ञान में — यह सिर्फ सामाजिक पूर्वाग्रह है। यह लेख सामाजिक व्यवहार, कानूनी अधिकार और ज्योतिष के पारंपरिक दृष्टिकोण को साथ रखकर समझाने की कोशिश है। ज्योतिष का हिस्सा आस्था और परंपरा का विषय है, यह किसी का चरित्र-प्रमाणपत्र नहीं है और न ही मेडिकल या कानूनी सलाह का विकल्प है। मैं (अजीत कुमार नाथ) पिछले कई वर्षों से सैकड़ों परिवारों की कुंडलियां देख रहा हूं, और एक पैटर्न बार-बार सामने आता है — जब किसी पुरुष का तलाक़ होता है, परिवार वाले उसके लिए तुरंत नया रिश्ता ढूंढना शुरू कर देते हैं। लेकिन जब एक महिला तलाक़ लेती है, चाहे उसकी कोई गलती न हो, उसे “अब कौन अपनाएगा” कहकर ताने दिए जाते हैं। यह फर्क कुंडली में नहीं, हमारी सोच में है। समाज तलाक़शुदा मर्द और औरत को अलग नज़र से क्यों देखता है — असली वजह भारत में तलाक़ की दर बढ़ी है, लेकिन इसके साथ आने वाला सामाजिक व्यवहार आज भी बहुत पुराना है। जब एक पुरुष का तलाक़ होता है, समाज मान लेता है कि “उसकी बीवी ठीक नहीं थी” या “मर्द तो मर्द है, उसे कोई परवाह नहीं”। लेकिन जब एक औरत तलाक़ लेती है — चाहे उसे घरेलू हिंसा, धोखा, या मानसिक प्रताड़ना से बचने के लिए ही क्यों न लेना पड़ा हो — पहला सवाल यही उठता है: “इसी में जरूर कोई कमी होगी”। यह डबल स्टैंडर्ड कहां से आता है? समाजशास्त्रियों के अनुसार इसकी जड़ पितृसत्तात्मक संपत्ति-व्यवस्था में है — पुरानी सोच में औरत की “शुद्धता” (chastity) परिवार की इज्जत और संपत्ति के हस्तांतरण (property transfer) से जुड़ी मानी जाती थी, जबकि मर्द की “मर्दानगी” को कभी शादी की सफलता-असफलता से नहीं आंका गया। नतीजा: तलाक़शुदा मर्द के लिए दोबारा रिश्ता ढूंढना आसान माना जाता है, जबकि तलाक़शुदा औरत को अक्सर “सेकंड हैंड”, “बिगड़ी हुई”, या “परिवार तोड़ने वाली” जैसे लेबल झेलने पड़ते हैं — चाहे तलाक़ की वजह पूरी तरह पति की हो। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में तलाक़/अलगाव लेने वाली महिलाओं का प्रतिशत पुरुषों से अधिक है — यानी ज्यादातर मामलों में महिला ही रिश्ते से निकलने का फैसला लेती है, अक्सर घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न या बेवफाई जैसी गंभीर वजहों से। इसके बावजूद सामाजिक तानों का बोझ महिला पर ही ज्यादा पड़ता है — यह आंकड़ा खुद इस पूर्वाग्रह की पोल खोलता है। समाधान की दिशा: यह सोच पीढ़ियों से चली आ रही है, इसलिए रातोंरात नहीं बदलेगी — लेकिन परिवार के स्तर पर बदलाव शुरू हो सकता है। जब कोई महिला तलाक़ लेती है, परिवार का पहला सवाल “उसने क्या गलती की” नहीं, बल्कि “वह अब कैसे सुरक्षित और आत्मनिर्भर रह सकती है” होना चाहिए। कानूनी और आर्थिक सहायता, काउंसलिंग, और बिना जज किए सुनना — यही असली सपोर्ट है। ज्योतिष में तलाक़ — सप्तम भाव और लिंग-निरपेक्ष सच्चाई हमारी साइट पर तलाक़/अलगाव के ज्योतिषीय कारणों — सप्तम भाव पर पाप-ग्रहों की दृष्टि, दशा-अंतर्दशा का समय, राहु-केतु का प्रभाव — पर पहले ही एक विस्तृत लेख मौजूद है (लेख के अंत में लिंक दिया गया है)। यहां जो बात समझना जरूरी है वह यह है: सप्तम भाव की पीड़ा पति और पत्नी दोनों की कुंडली में बराबर देखी जाती है — यह किसी एक पक्ष विशेष, खासकर सिर्फ स्त्री, का “दोष” नहीं होता। क्लासिकल ज्योतिष में जब भी वैवाहिक कलह या वियोग योग बनता है, दोनों कुंडलियों का बराबर अध्ययन किया जाता है। एक जरूरी और ईमानदार चेतावनी: कई बार समाज में यह गलत धारणा फैलाई जाती है कि “तलाक़शुदा औरत की कुंडली खराब है” — जबकि सच यह है कि तलाक़ के योग किसी की कुंडली में हों भी, तो इसका मतलब यह कभी नहीं कि वह व्यक्ति चरित्रहीन है या दोषी है। ज्योतिष रिश्ते की जटिलता को समझने का एक पारंपरिक तरीका है, यह किसी का चरित्र-प्रमाणपत्र नहीं है। यह आस्था का विषय है, वैज्ञानिक निदान (diagnosis) नहीं। अनकहा पहलू — जब तलाक़ मांगने पर औरत को “पागल” या “गैर-जिम्मेदार” साबित करने की कोशिश होती है यह वह पहलू है जिस पर बहुत कम बात होती है। कई मामलों में जब कोई महिला घरेलू हिंसा या प्रताड़ना से तंग आकर तलाक़ या अलगाव की बात उठाती है, तो उसकी आवाज़ को कमज़ोर करने के लिए परिवार या पति का पक्ष उसे “मानसिक रूप से अस्थिर”, “जिद्दी”, या “अवसाद में” करार देने की कोशिश करता है — कभी-कभी जबरन काउंसलर या डॉक्टर के पास ले जाकर, कभी रिश्तेदारों के सामने बार-बार यह बात दोहराकर। मकसद साफ है: अगर औरत को “अस्थिर” साबित कर दिया जाए, तो उसकी शिकायत और उसका फैसला दोनों कमज़ोर पड़ जाते हैं, और घरेलू हिंसा जैसे असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। यह अकेली घटना नहीं है — महिला अधिकार संगठनों और मीडिया रिपोर्ट्स में ऐसे मामले दर्ज हुए हैं जहां महिलाओं को जबरन इंस्टीट्यूशनलाइज़ (जबरन भर्ती) करने की कोशिश की गई ताकि उनकी घरेलू हिंसा की शिकायत या तलाक़ की मांग को कमजोर किया जा सके। यह एक गंभीर कानूनी अपराध है — किसी भी वयस्क को उसकी सहमति के बिना मानसिक स्वास्थ्य संस्थान में भर्ती नहीं किया जा सकता। मैं (अजीत कुमार नाथ) ऐसे कई मामलों से रूबरू हुआ हूं जहां महिला के परिवार वाले खुद यह मान बैठते हैं कि “बेटी की सोच बिगड़ गई है, इसलिए वह तलाक़ मांग रही है” — जबकि असलियत में वह सालों की तकलीफ के बाद हिम्मत जुटाकर बाहर निकलने की कोशिश कर रही होती है। सबसे पहले उसकी बात को गंभीरता से सुनना जरूरी है, उसे “पागल” कहकर चुप कराना नहीं। 🤝 अगर आप या आपकी कोई
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