शादी के कई साल बाद भी बच्चा नहीं हुआ तो सबसे पहले औरत को ही “बांझ” क्यों कहा जाता है? सच यह है कि चिकित्सा विज्ञान के अनुसार बांझपन के लगभग 40-50% मामलों में वजह पुरुष होती है — फिर भी समाज लगभग हमेशा पत्नी को ही दोषी ठहराता है, जबकि असली जांच कभी दोनों पक्षों की एक साथ होती ही नहीं।
यह लेख चिकित्सा विज्ञान और ज्योतिष, दोनों दृष्टिकोणों को समझने के लिए है। जो भी दंपति संतान की चिंता से जूझ रहे हैं, उन्हें सबसे पहले किसी योग्य स्त्री-रोग एवं एंड्रोलॉजी विशेषज्ञ से मिलकर दोनों की जांच करवानी चाहिए, यह न किसी का पाप है, न किसी की कमी, बल्कि एक चिकित्सीय स्थिति है जिसका इलाज ज़्यादातर मामलों में सम्भव है।
मैंने अपने वर्षों के अध्ययन में देखा है कि जो दंपति संतान की चिंता लेकर मेरे पास आते हैं, उनमें ज़्यादातर पत्नी अकेले ही पूजा-पाठ, उपाय और डॉक्टरी जांच करवाती रहती है, जबकि पति की जांच तक नहीं होती, यह सबसे बड़ी चूक है जो मैं बार-बार देखता हूं, और यही इस लेख को लिखने की सबसे बड़ी वजह है।

विज्ञान क्या कहता है — बांझपन में पुरुष और महिला की बराबर की भूमिका
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के अनुमान के अनुसार पुरुष बांझपन दंपतियों की कुल समस्याओं में करीब 10-15% हिस्सा है, पर यह आंकड़ा सीमित सैंपल के कारण संभवतः कम आंका गया है, आधुनिक शोध बताते हैं कि लगभग आधे मामलों में पुरुष-कारक भी शामिल होता है। पिछले तीन दशकों में औसत शुक्राणु संख्या 60 मिलियन प्रति मिली से घटकर करीब 20 मिलियन प्रति मिली रह गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2021 गाइडलाइन के अनुसार सामान्य शुक्राणु संख्या 16 मिलियन प्रति मिली या उससे अधिक मानी जाती है, और अध्ययनों में पाया गया है कि हर चार में से केवल एक भारतीय पुरुष के वीर्य पैरामीटर पूरी तरह सामान्य सीमा में आते हैं। मोटापा, डायबिटीज़, मेटाबॉलिक सिंड्रोम, पर्यावरणीय प्रदूषण, लगातार तनाव, धूम्रपान-शराब, वैरिकोसील (अंडकोष की नसों में सूजन) और देर से माता-पिता बनने का फैसला, ये सब पुरुष बांझपन के प्रमुख कारण माने जाते हैं।
समाधान की दिशा में सबसे पहला कदम है वीर्य विश्लेषण यानी सीमन एनालिसिस, एक सामान्य, सस्ती और दर्द-रहित लैब जांच जो अधिकतर पुरुष-कारक कारणों की पहचान कुछ ही घंटों में कर देती है। भारत में लगभग 2.8 करोड़ प्रजनन-आयु के दंपति बांझपन से जूझते हैं, और इनमें से जो इलाज तक पहुंचते हैं उनमें से 20-25% को आईवीएफ की ज़रूरत पड़ती है। कई कारण जीवनशैली में बदलाव, दवाओं या वैरिकोसील की मामूली सर्जरी से ठीक हो जाते हैं, गंभीर मामलों में आईसीएसआई तकनीक से एक स्वस्थ शुक्राणु सीधे अंडे में डालकर गर्भधारण संभव बनाया जाता है। इलाज शुरू करने से पहले यह ज़रूर देखें कि क्लीनिक एआरटी अधिनियम 2021 के तहत पंजीकृत हो, इससे इलाज की गुणवत्ता और मरीज़ के अधिकार दोनों सुरक्षित रहते हैं।

ज्योतिष में बांझपन — पंचम भाव, पुत्र कारक गुरु और पुरुष कुंडली में शुक्र-मंगल की भूमिका
पारंपरिक ज्योतिष में संतान-सुख का मुख्य विचार पंचम भाव, उसके स्वामी और पुत्र कारक ग्रह गुरु से किया जाता है, इस विषय पर हमारी वेबसाइट पर पंचमेश, गुरु और सप्तमांश यानी D7 कुंडली का पूरा गहन विश्लेषण पहले से उपलब्ध है, इसका लिंक नीचे दिया गया है। पर जब बात सिर्फ पत्नी की कुंडली देखने तक सीमित रह जाती है, तो यह अधूरी तस्वीर होती है, पारंपरिक सिद्धांतों में पुरुष की कुंडली में शुक्र यानी वीर्य और प्रजनन-ऊर्जा का कारक, और मंगल यानी शारीरिक बल तथा रक्त व जनन-तंत्र का कारक, इनकी स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। पंचम भाव, सप्तम भाव या अष्टम भाव में शुक्र-मंगल पर राहु, शनि या अन्य पाप ग्रहों की दृष्टि अथवा युति को परंपरागत रूप से एक बाधा-सूचक संकेत माना जाता है।
यहाँ एक बहुत ज़रूरी स्पष्टीकरण देना ज़रूरी है, ये सभी योग-संयोग अत्यंत सामान्य हैं और लाखों स्वस्थ, संतानवान लोगों की कुंडली में भी पाए जाते हैं। यह किसी भी तरह से चिकित्सीय निदान नहीं है और न ही होना चाहिए। परंपरागत रीति में जब कुंडली मिलान की बात आती है तो अक्सर सिर्फ स्त्री की कुंडली में संतान-दोष ढूंढा जाता है, जबकि शास्त्रों में यह विचार दोनों, वर और वधू, दोनों की कुंडली के लिए बराबर बताया गया है। इसलिए यदि परिवार में ज्योतिषीय परामर्श लिया भी जाए, तो पति और पत्नी दोनों की कुंडली एक साथ, बराबरी से देखी जानी चाहिए, न कि सिर्फ स्त्री की।
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यही वह पहलू है जिस पर हमारे समाज में सबसे कम बात होती है। डॉक्टर और शोधकर्ता बार-बार यह बताते हैं कि जब दंपति संतान की समस्या लेकर क्लीनिक पहुंचते हैं, तो अक्सर पहले सिर्फ पत्नी की जांच शुरू होती है, पति अपनी वीर्य जांच करवाने से शर्म, झिझक या “मर्दानगी पर सवाल” के डर से मना कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि असली कारण सामने आने में महीनों, कभी-कभी सालों की देरी हो जाती है, और तब तक पत्नी अकेले ही यह बोझ ढोती है, ताने सुनती है, कभी-कभी दूसरी शादी की धमकी या तलाक़ तक की नौबत झेलती है, जबकि रिपोर्ट आने पर पता चलता है कि वजह पति की तरफ से थी।
यह पैटर्न इतना आम है कि कई फर्टिलिटी विशेषज्ञ अब स्पष्ट सलाह देते हैं, पहली जांच हमेशा दोनों पति-पत्नी की एक साथ करवाई जानी चाहिए, बारी-बारी से नहीं। सेमन एनालिसिस उतनी ही सामान्य और ज़रूरी जांच है जितनी महिला की हार्मोन और अल्ट्रासाउंड जांच, इसमें शर्म या डर की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। जब तक यह सोच नहीं बदलेगी, तब तक निर्दोष महिलाएं गलत तरीके से दोषी ठहराई जाती रहेंगी।
मैं हमेशा यही कहता हूं, अगर कुंडली मिलान और पूजा-पाठ के साथ-साथ दोनों पति-पत्नी एक साथ अपनी मेडिकल जांच करवा लें, तो आधी परेशानी वहीं सुलझ जाती है, अकेले स्त्री को दोष देना न सिर्फ अन्यायपूर्ण है, बल्कि इलाज में देरी की सबसे बड़ी वजह भी है।

भारत में कानूनी अधिकार व नियम — एआरटी (नियमन) अधिनियम 2021
दिसंबर 2021 में पारित और जनवरी 2022 से लागू, एआरटी यानी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (नियमन) अधिनियम 2021 भारत में हर आईवीएफ क्लीनिक, एआरटी बैंक और डोनर प्रोग्राम को नियंत्रित करता है। इस कानून के तहत हर क्लीनिक का राष्ट्रीय एआरटी एवं सरोगेसी रजिस्ट्री में पंजीकरण अनिवार्य है, क्लीनिकों को दो श्रेणियों में बांटा गया है, आईयूआई तक सीमित लेवल-1 और आईवीएफ व रिसर्च करने वाले लेवल-2। कानून डोनर-स्क्रीनिंग मानक तय करता है, उम्र-सीमा निर्धारित करता है और लिखित सहमति अनिवार्य बनाता है। इसका सीधा फायदा मरीज़ों को यह है कि अब बिना पंजीकरण वाले, गैर-मानक तरीके अपनाने वाले क्लीनिकों से बचा जा सकता है, इलाज शुरू करने से पहले क्लीनिक का एआरटी रजिस्ट्री पंजीकरण ज़रूर जांच लें।
परिवार व जीवनसाथी को क्या समझना चाहिए
- बिना दोनों की जांच के किसी एक को दोष न दें, आंकड़े साफ़ बताते हैं कि वजह पुरुष या महिला, दोनों में से कोई भी हो सकती है।
- संतान न होना वैवाहिक जीवन की असफलता नहीं है, यह एक इलाज-योग्य चिकित्सीय स्थिति है, ज़्यादातर मामलों में सही निदान से समाधान मिल जाता है।
- दोनों पति-पत्नी को भावनात्मक सहारा चाहिए, अकेले पत्नी को उपाय, व्रत और जांच के लिए जिम्मेदार न ठहराएं।
- ताने, तुलना और दूसरी शादी या तलाक़ की धमकी से समस्या हल नहीं होती, बल्कि इलाज में देरी और रिश्ते में दरार बढ़ती है।
- इलाज में समय लग सकता है, धैर्य रखें और किसी योग्य विशेषज्ञ की निरंतर निगरानी में उपचार जारी रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. क्या बांझपन हमेशा महिला की वजह से होता है?
नहीं। आधुनिक शोध के अनुसार लगभग 40-50% मामलों में पुरुष-कारक शामिल होता है। बिना दोनों की जांच के किसी एक को दोष देना चिकित्सकीय रूप से गलत है।
2. क्या कुंडली देखकर बांझपन का पक्का पता चल सकता है?
नहीं। पंचम भाव या शुक्र-मंगल पर पाप ग्रह की दृष्टि जैसे योग बहुत सामान्य हैं और स्वस्थ, संतानवान लोगों की कुंडली में भी मिलते हैं। सिर्फ मेडिकल जांच ही असली कारण बता सकती है।
3. डॉक्टर को कब दिखाना चाहिए?
सामान्यतः एक साल की सतत कोशिश के बाद भी गर्भधारण न होने पर, और अगर पत्नी की उम्र 35 से अधिक है तो 6 महीने बाद ही जांच करवा लेनी चाहिए।
4. इलाज के क्या विकल्प उपलब्ध हैं?
जीवनशैली में बदलाव, दवाइयां, वैरिकोसील जैसी मामूली सर्जरी, आईयूआई, और गंभीर मामलों में आईवीएफ या आईसीएसआई, कारण के अनुसार डॉक्टर सही विकल्प सुझाते हैं।
5. क्या फर्टिलिटी इलाज बहुत महंगा और अक्सर असफल होता है?
लागत क्लीनिक और तकनीक पर निर्भर करती है, पर एआरटी अधिनियम 2021 के बाद पंजीकृत क्लीनिकों में मानक और पारदर्शिता बेहतर हुई है। सही और समय पर निदान से सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है।
सारांश
- बांझपन में लगभग 40-50% मामलों में वजह पुरुष होती है, फिर भी समाज अक्सर अकेले पत्नी को दोषी मानता है।
- पिछले तीन दशकों में औसत शुक्राणु संख्या में भारी गिरावट आई है, जीवनशैली और पर्यावरण इसके बड़े कारण हैं।
- वीर्य विश्लेषण एक सामान्य, सस्ती जांच है जिससे अधिकतर पुरुष-कारक कारणों की पहचान हो जाती है।
- ज्योतिष में पंचम भाव, गुरु के साथ-साथ पुरुष की कुंडली में शुक्र-मंगल भी देखे जाते हैं, पर ये संकेत निदान नहीं, केवल परंपरागत संकेत हैं।
- पहली जांच हमेशा दोनों पति-पत्नी की एक साथ होनी चाहिए, बारी-बारी से नहीं, इससे इलाज में देरी और गलत दोषारोपण दोनों रुकते हैं।
- एआरटी अधिनियम 2021 के तहत पंजीकृत क्लीनिक चुनना मरीज़ के अधिकार और इलाज की गुणवत्ता, दोनों सुरक्षित रखता है।
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अभी अपनी रिपोर्ट पाएंनिष्कर्ष
जो दंपति संतान की चिंता में मेरे पास आते हैं, उनसे मैं हमेशा कहता हूं, दोष ढूंढने से पहले जांच करवाइए, दोनों मिलकर, सच सामने आने पर बोझ बंट जाता है, और इलाज का रास्ता भी साफ़ दिखता है। कुंडली और उपाय अपनी जगह हैं, पर सही चिकित्सीय जांच और एक-दूसरे का साथ ही असली समाधान की नींव है।
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Ajit Kumar Nath — AstroVgyaan ke sansthapak aur research lead. Inka vishwas hai ki gyan ka asli uddeshya seva hai — isliye inka kaam kabhi bhi vyaktigat consultation ya paid sessions tak simit nahi raha. Vedic Jyotish (Parashari Hora Shastra, Jaimini Sutram, Bhrigu Nandi Nadi), Lal Kitab, Vastu Shastra aur Ank Jyotish (Numerology) par varshon ka swatantra adhyayan aur shodh karke, unhe saral, imandaar aur research-aadharit lekhon ke roop mein sabke liye free upalabdh karana — yahi inka jeevan-uddeshya hai. Research aur collaboration ke liye: astrovgyaan@gmail.com






