Vastu Shastra Course

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चित्तौड़गढ़ दुर्ग की प्राचीन दीवारें — गिरि दुर्ग वास्तु उदाहरण
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दुर्ग/किला निर्माण के नियम — वास्तु के अनुसार

क्या आपने कभी सोचा है कि चित्तौड़गढ़, रणथंभौर या गागरोन जैसे दुर्ग सैकड़ों वर्षों तक अजेय क्यों बने रहे? इसका उत्तर सिर्फ ऊँची दीवारों में नहीं, बल्कि उस सूक्ष्म वास्तु-विज्ञान में छिपा है जिसके अनुसार प्राचीन भारत में दुर्ग-निर्माण किया जाता था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दुर्ग को राज्य के सप्तांग (सात अंगों) में से एक अनिवार्य अंग माना गया है — बिना सुदृढ़ दुर्ग के न राजा सुरक्षित, न प्रजा, न राज्य-कोष। इस अध्याय में हम दुर्ग वास्तु के प्रकार, स्थल-चयन के सिद्धांत, बहु-स्तरीय सुरक्षा-व्यवस्था और आंतरिक बसावट की योजना को विस्तार से समझेंगे। दुर्ग वास्तु का महत्व — राज्य का सप्तम अंग कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य के सात अंग बताए गए हैं — स्वामी (राजा), अमात्य (मंत्री), जनपद (राष्ट्र), दुर्ग (किला), कोष (खजाना), दंड (सेना) और मित्र (सहयोगी)। इनमें दुर्ग का स्थान केंद्रीय है, क्योंकि यही वह सुरक्षा-कवच है जो शेष छह अंगों — राजा के प्राण, मंत्रियों की सभा, कोष की संपदा और सेना के शस्त्रागार — को शत्रु से बचाता है। शुक्रनीति में भी कहा गया है कि जिस राज्य में सुदृढ़ दुर्ग नहीं, वह राज्य वैसे ही असुरक्षित है जैसे बिना कवच का योद्धा। दुर्ग केवल सैन्य संरचना नहीं थी — यह एक सम्पूर्ण नगर-व्यवस्था थी जिसमें राजमहल, प्रशासनिक भवन, मंदिर, बाज़ार, जलाशय और आवासीय क्षेत्र एक निश्चित वास्तु-योजना के अनुसार बसाए जाते थे। युद्धकाल में यही दुर्ग पूरे राज्य की अंतिम शरणस्थली बनता था, इसलिए इसका वास्तु-विन्यास अत्यंत बारीकी से तय किया जाता था। दुर्ग के प्रकार — भूभाग के अनुसार वर्गीकरण कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भूभाग की प्रकृति के अनुसार दुर्ग के चार मुख्य प्रकार बताए गए हैं। शुक्रनीति में यह वर्गीकरण और विस्तृत होकर नौ प्रकारों तक पहुँचता है। दोनों वर्गीकरणों को समझना ज़रूरी है क्योंकि राजस्थान के प्रसिद्ध दुर्ग आज भी इन्हीं श्रेणियों के जीवंत उदाहरण हैं। कौटिल्य के अनुसार चार प्रकार जलदुर्ग (Water Fort): चारों ओर या अधिकांश भाग में जल — नदी, समुद्र या विशाल जलाशय — से घिरा दुर्ग। शत्रु-सेना के लिए जल-मार्ग पार करना अत्यंत कठिन होता था। राजस्थान में गागरोन दुर्ग (झालावाड़) इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जो आहू और काली सिंध नदियों के संगम पर तीन ओर से जल से घिरा है। गिरिदुर्ग (Hill Fort): ऊँची पहाड़ी या पठार पर बना दुर्ग, जहाँ पहुँचना ही शत्रु के लिए बड़ी चुनौती होती थी। चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़, रणथंभौर और जैसलमेर जैसे भारत के सबसे प्रसिद्ध दुर्ग इसी श्रेणी में आते हैं। चित्तौड़गढ़ भारत का सबसे बड़ा दुर्ग परिसर है, जो लगभग 180 मीटर ऊँची पहाड़ी पर लगभग 700 एकड़ क्षेत्र में फैला है। वनदुर्ग (Forest Fort): घने जंगल, कंटीली झाड़ियों और दुर्गम वनस्पति से घिरा दुर्ग, जहाँ शत्रु-सेना का मार्ग खोजना और रसद पहुँचाना दुष्कर होता था। शेरगढ़ दुर्ग (बारां) इसका उदाहरण माना जाता है, जो घने जंगलों के बीच स्थित है। धान्वदुर्ग (Desert Fort): जल-रहित, मरुस्थलीय या शुष्क भूभाग में बना दुर्ग, जहाँ आक्रमणकारी सेना के लिए जल और रसद की आपूर्ति अत्यंत कठिन हो जाती थी। जैसलमेर दुर्ग को थार मरुस्थल में स्थित होने के कारण इस श्रेणी का भी उदाहरण माना जाता है, यद्यपि यह पहाड़ी पर भी स्थित है इसलिए इसे गिरि-धान्व मिश्रित दुर्ग भी कहा जा सकता है। शुक्रनीति के अनुसार नौ प्रकार शुक्रनीति में दुर्ग-वर्गीकरण को अधिक सूक्ष्मता से नौ भागों में बाँटा गया है — एरण (मिट्टी-टीले पर), पारिख (गहरी खाई से घिरा), वन (सघन वन-सुरक्षित), धान्वन (मरुस्थलीय), जल (जलाशय-सुरक्षित), गिरि (पर्वतीय), सैन्य (सेना द्वारा सतत रक्षित शिविर-दुर्ग), सहाय (मित्र-राज्यों की सहायता से सुरक्षित) और मिश्र (उपरोक्त दो या अधिक प्रकारों का संयोजन)। भैंसरोड़गढ़ दुर्ग (चित्तौड़गढ़ ज़िला) मिश्र-दुर्ग का सुंदर उदाहरण है — यह चंबल और बामनी नदियों के संगम पर एक ऊँची चट्टान पर बना है, जो इसे एक साथ गिरिदुर्ग और जलदुर्ग दोनों बनाता है। शास्त्रों में मिश्र-दुर्ग को सर्वाधिक सुरक्षित माना गया है क्योंकि इसमें एक से अधिक प्राकृतिक बाधाएँ शत्रु के मार्ग में आती हैं। दुर्ग स्थल चयन के सिद्धांत दुर्ग के लिए स्थल-चयन एक अत्यंत सावधानीपूर्ण प्रक्रिया थी। शास्त्रों के अनुसार आदर्श दुर्ग-स्थल में निम्न विशेषताएँ अनिवार्य मानी गई हैं — पर्याप्त ऊँचाई या प्राकृतिक बाधा जो शत्रु की दृष्टि और गति दोनों को सीमित करे, स्वच्छ एवं प्रचुर जल-स्रोत जो दीर्घकालीन घेराबंदी में भी सूखे नहीं, उपजाऊ आसपास की भूमि जो युद्धकाल में खाद्यान्न की आपूर्ति दे सके, तथा दृढ़ भूमि जो भारी प्राचीर और भवनों का भार सह सके। दलदली, अत्यधिक चट्टानी या भूकंप-प्रवण भूमि को वर्जित माना गया है। कौटिल्य विशेष रूप से इस बात पर बल देते हैं कि दुर्ग-स्थल ऐसा हो जहाँ से राज्य के प्रमुख मार्गों, व्यापारिक पथों और सीमावर्ती क्षेत्रों पर निगरानी रखी जा सके। यही कारण है कि अधिकांश ऐतिहासिक दुर्ग व्यापार-मार्गों या नदी-घाटियों के प्रवेश-बिंदुओं पर स्थित मिलते हैं — यह केवल सुरक्षा ही नहीं, आर्थिक नियंत्रण की भी रणनीति थी। सुरक्षा-रिंग व्यवस्था — खाई, प्राचीर एवं बुर्ज कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दुर्ग की सुरक्षा-व्यवस्था को अत्यंत बारीक तकनीकी विवरण के साथ बताया गया है। यह एक बहु-स्तरीय, संकेंद्रित (concentric) रक्षा-प्रणाली थी जिसमें बाहर से भीतर की ओर खाई, प्राचीर, कँगूरे (parapet) और बुर्ज (watch-tower) क्रमिक रूप से रखे जाते थे। त्रि-स्तरीय खाई (परिखा) व्यवस्था दुर्ग की दीवार के चारों ओर तीन समानांतर खाइयाँ खोदी जाती थीं, जिनकी चौड़ाई क्रमिक रूप से घटती थी — सबसे बाहरी खाई 14 दण्ड चौड़ी, मध्य खाई 12 दण्ड चौड़ी, और सबसे भीतरी खाई 10 दण्ड चौड़ी रखी जाती थी (एक दण्ड लगभग 1.8-2 मीटर के बराबर माना जाता है)। तीनों खाइयों के बीच 1 दण्ड की दूरी छोड़ी जाती थी, जिस पर कंटीली झाड़ियाँ या बाँस लगाए जाते थे ताकि शत्रु-सैनिक खाइयों के बीच खड़े होकर भी सुरक्षित न रह सकें। इन खाइयों में जल भरा जाता था या इन्हें शुष्क रखकर उनमें नुकीले कीलें व शूल गाड़े जाते थे — दोनों ही स्थिति में शत्रु के लिए इन्हें पार करना अत्यंत जोखिमपूर्ण होता था। प्राचीर (रैम्पार्ट) निर्माण खाइयों के भीतर मुख्य प्राचीर बनाई जाती थी, जिसकी विशिष्टता कौटिल्य ने 6 दण्ड ऊँची और 12 दण्ड चौड़ी आधार पर बताई है — अर्थात ऊँचाई से दोगुनी चौड़ाई, जिससे प्राचीर स्थिर व दृढ़ रहे। इसका निर्माण मिट्टी को हाथियों से रौंदकर सघन बनाया जाता था (गजाभिघट्टित मृत्तिका), और परतों के

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नगर निर्माण — मार्ग, वीथी, राजधानी का वास्तु

गाँव की सड़कें छोटी और सीमित होती हैं, लेकिन जब वही बसावट एक बड़े नगर या राजधानी में बदलती है, तो मार्गों की एक पूरी पदानुक्रमित व्यवस्था खड़ी करनी पड़ती है — चौड़ाई, दिशा, उपयोग और यहाँ तक कि यातायात के प्रकार तक तय करने वाली। इस अध्याय में हम शिल्पशास्त्र की मार्ग-वीथी शब्दावली, सड़कों की मानक चौड़ाई, और राजधानी नगर में राजमहल तथा व्यवसायों की बसावट कैसे तय होती थी — इन सबको विस्तार से समझेंगे। सड़कों का त्रिविध कार्य प्राचीन स्थपतियों (नगर-वास्तुकारों) की दृष्टि में सड़कें केवल आवागमन का साधन नहीं थीं। शिल्पशास्त्र इन्हें तीन कार्यों में बाँटता है — पहला, यातायात के लिए राजमार्ग; दूसरा, भवन-भूखंडों की सीमा तय करने वाला उपकरण (पद-विन्यास इसी सड़क-योजना पर आधारित होता था); और तीसरा, स्वच्छता एवं मुक्त वायु-संचार की धमनी। इसीलिए सड़क-योजना को पद-विन्यास (भूखंड-विभाजन) से पहले नहीं, बल्कि उसी के साथ एक समन्वित प्रक्रिया माना गया। वीथी शब्दावली — मार्गों के शास्त्रीय नाम मयमत एवं मानसार में हर प्रकार के मार्ग का एक अलग शास्त्रीय नाम है, जो उसकी दिशा, बनावट अथवा उपयोग को दर्शाता है: राजपथ — पूर्व से पश्चिम चलने वाला प्रमुख मार्ग। राजवीथी — जिसके दोनों छोरों पर द्वार लगे हों। संधिवीथी — जिसमें अन्य मार्गों के संधि-स्थल (जंक्शन) आते हों। महाकाल अथवा वामन — दक्षिण दिशा में स्थित मार्ग। मंगलवीथी — गाँव अथवा नगर का पूरा चक्कर लगाने वाली परिधि-सड़क, चौड़ाई 1 से 5 दंड तक। ब्रह्मवीथी — केंद्र (ब्रह्मस्थान) से होकर गुज़रने वाला मार्ग, जिसे सड़क-जाल की “नाभि” कहा गया है — यह सीधे अध्याय 3.6 में पढ़े गए ब्रह्मस्थान के महत्व से जुड़ता है। नाराचपथ — आड़े द्वारों (transverse doors) से युक्त मार्ग। वामनपथ — उत्तर दिशा की ओर मुख किए, द्वार व अर्गला से सुसज्जित अपेक्षाकृत संकरे मार्ग। इन सभी में राजपथ एवं राजवीथी सबसे प्रमुख माने जाते थे — इन्हीं के सहारे राष्ट्रीय राजमार्गों से नगर का सीधा जुड़ाव होता था। ध्यान देने योग्य है कि तिरछे (विकर्ण) मार्ग शास्त्रों में सामान्यतः वर्जित थे — केवल पहाड़ी क्षेत्रों जैसी विवशता में ही विकर्ण मार्ग स्वीकार किए जाते थे, अन्यथा सभी सड़कें पूर्व-पश्चिम अथवा उत्तर-दक्षिण दिशा में सीधी रखी जाती थीं। सड़कों की चौड़ाई एवं यातायात-पृथक्करण देवी पुराण के अनुसार राजमार्ग की चौड़ाई 10 धनुष (लगभग 40 हाथ) होनी चाहिए, ताकि मनुष्य, घोड़े, हाथी और वाहन बिना किसी रुकावट के स्वतंत्र रूप से आ-जा सकें। इसी क्रम में देश-मार्ग (देश को जोड़ने वाली सड़क) 30 धनुष, ग्राम-मार्ग 20 धनुष, और सीमा-मार्ग केवल 10 धनुष चौड़ा रखने का निर्देश मिलता है — यानी मार्ग जितना बड़ा क्षेत्र जोड़ता, उतना ही अधिक चौड़ा होना अनिवार्य था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में एक और दिलचस्प व्यवस्था मिलती है — रथों के लिए अलग मार्ग, पशुओं (गाय-भैंस) के लिए अलग, हाथियों के लिए अलग, और छोटे चतुष्पदों तथा पैदल मनुष्यों के लिए अलग मार्ग बनाने का निर्देश था। यानी आज की “यातायात पृथक्करण” (traffic segregation) की अवधारणा — जिसे हम आधुनिक शहरी योजना में नई मानते हैं — भारत में 2,000 वर्ष से भी पुरानी परंपरा है। समरांगण सूत्रधार के अनुसार एक आदर्श नगर में कुल 34 मार्ग होते — 17 पूर्व-पश्चिम एवं 17 ही उत्तर-दक्षिण दिशा में — जिसमें राजमार्ग (केंद्रीय मुख्य पथ, नगर के आकार अनुसार 24/20/16 हाथ चौड़ा), दो महारथ्या (बड़े रथ-मार्ग), चार यानमार्ग (वाहन-पथ, हर एक के दोनों ओर जंघापथ यानी पैदल-पथ सहित), और दो घंटामार्ग (परकोटे के सहारे चलने वाले मार्ग) शामिल थे। सड़कें बीच में कछुए की पीठ जैसी उठी हुई बनाई जातीं और कंकड़-बजरी से मज़बूत की जातीं, तथा दोनों ओर जल-निकासी नालियाँ होतीं। नगर-वर्गीकरण — मार्ग-संख्या के अनुसार मयमत ग्रंथ में सड़कों की संख्या के अनुसार नगरों को क्रमिक रूप से वर्गीकृत किया गया है — छोटे दंडक नगर से शुरू होकर बड़े नगरों तक। जैसे-जैसे मार्गों की संख्या बढ़ती जाती (1 से 11 तक), नगर का आकार, महत्व और सामाजिक जटिलता भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती। इसी क्रम के अंतिम, सबसे विशाल प्रकार राजधानी और साम्राज्य-मुख्यालय के लिए आरक्षित थे — जिनकी चर्चा अगले भाग में करेंगे। राजधानी नगर की विशेष व्यवस्था साम्राज्य-मुख्यालय वाले नगर को “जयांग” कहा गया है — इसमें पूर्व-पश्चिम 9 एवं उत्तर-दक्षिण 9 मार्गों का सघन जाल होता, चार दिशाओं में चार मुख्य द्वार तथा चार कोनों पर चार अतिरिक्त द्वार होते। इससे भी बड़ा “विजय” नगर होता, जिसमें 10×10 मार्ग होते और जहाँ राजकीय दुर्ग स्थापित किया जाता। सबसे बड़ा और सर्वोच्च वर्ग “सर्वतोभद्र” नगर का है — 11×11 मार्गों वाला यह नगर राजधानी के लिए आदर्श माना गया, जिसमें राजमहल केंद्रीय ब्रह्मस्थान को छोड़कर कहीं भी बनाया जा सकता था (ब्रह्मस्थान को अछूता रखने का यही सिद्धांत हमने अध्याय 3.6 में घर एवं मंदिर दोनों के लिए देखा था)। राजमहल के सामने एक विशाल प्रांगण होता जहाँ अंतःपुर (रनिवास) स्थित होता। सर्वतोभद्र नगर में पूर्व दिशा की ओर जाने वाला प्रमुख मार्ग “राजवीथी” कहलाता, और उसके दोनों किनारों पर धनी वर्ग के भवन बनाए जाते, उनके निकट व्यापारियों की बस्ती, दक्षिण में बुनकर और उत्तर में बढ़ई/रथकार (पहिया बनाने वाले कारीगर) बसाए जाते — यानी राजवीथी के सहारे ही पूरे नगर का व्यावसायिक मानचित्र तय होता था। जयपुर शहर, जिसे महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 18वीं सदी में शास्त्रोक्त नगर-योजना के आधार पर बसाया, आज भी इस चौकोर (चेसबोर्ड जैसी) ग्रिड-प्रणाली का सबसे प्रसिद्ध जीवंत उदाहरण है — जहाँ राजपथ, वीथियाँ एवं केंद्रीय राजमहल परिसर आज भी उसी शास्त्रीय खाके में मौजूद हैं। सड़क-सौंदर्य एवं मनोवैज्ञानिक सिद्धांत शास्त्रकारों ने केवल यातायात ही नहीं, सड़क के सौंदर्य-मनोविज्ञान पर भी ध्यान दिया। लंबी सीधी सड़क पर देखने वाले की आँख को कहीं टिकने के लिए कुछ चाहिए होता है — इसीलिए मार्गों के मध्य-बिंदुओं और चौराहों पर मंदिर, स्तंभ अथवा ऊँचे वृक्ष लगाने का निर्देश मिलता है, तथा इन चौराहों पर सभा-भवन जैसी सार्वजनिक इमारतें बनाई जातीं। भवनों की कतारें भी एक-दूसरे से सुसंगत रखी जातीं, जिसका उदाहरण रामायण में वर्णित अयोध्या नगरी में मिलता है। 🛣️ अपने भूखंड की सड़क-दिशा का वास्तु जानना चाहते हैं? हमारे वास्तु विशेषज्ञों से परामर्श लें और समझें कि मुख्य सड़क, कोने का प्लॉट अथवा टी-जंक्शन का आपके भवन पर वास्तु प्रभाव क्या होता है। अभी परामर्श बुक करें → सामान्य प्रश्न (FAQ) राजपथ और राजवीथी

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ग्राम नियोजन के सिद्धांत

क्या प्राचीन भारत में गाँव किसी अनियोजित, स्वतःस्फूर्त ढंग से बसते थे, या उनके पीछे भी मंदिर और घर जैसा ही सुनिश्चित शास्त्रीय खाका होता था? मॉड्यूल 8 में हम वास्तु शास्त्र के दायरे को घर और मंदिर से आगे बढ़ाकर पूरे मानव-बसावट — गाँव, नगर, दुर्ग, जलाशय और वृक्षारोपण — तक ले जाते हैं। इस पहले अध्याय में हम देखेंगे कि शिल्पशास्त्र ग्राम-नियोजन को किस तरह देखता था, कितने प्रकार के गाँव मान्य थे, और एक आदर्श गाँव की आंतरिक बनावट कैसी होती थी। गाँव — नगर-नियोजन की मूल इकाई मानसार शिल्पशास्त्र के अनुसार गाँव और नगर की योजना में कोई मौलिक अंतर नहीं माना गया — गाँव को “लघु रूप में नगर” कहा गया है। भोज द्वारा रचित समरांगण सूत्रधार ग्रंथ में तो पूरे राष्ट्र की योजना का आधार ही गाँव को बनाया गया है: बड़े राष्ट्र में लगभग 9,154 गाँव, मध्यम राष्ट्र में 5,384 और छोटे राष्ट्र में 1,548 गाँव होने का उल्लेख मिलता है — और हर राष्ट्र के आधे गाँवों में से चुनिंदा बड़े गाँवों को व्यवस्थित रूप से नगर के रूप में विकसित करने का सिद्धांत बताया गया है। यानी अधिकांश भारतीय नगरों की जड़ें मूलतः सुनियोजित गाँवों में ही थीं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में गाँव की एक व्यावहारिक, प्रशासनिक परिभाषा भी मिलती है — एक आदर्श गाँव में कम से कम 100 और अधिकतम 500 कृषक अथवा शूद्र परिवार बसाए जाने चाहिए, और गाँव की सीमा लगभग 1-2 क्रोश (लगभग 2-4 किलोमीटर) तक फैली होनी चाहिए ताकि पड़ोसी गाँव एक-दूसरे की रक्षा में सहायक हो सकें। सीमा-निर्धारण नदी, पर्वत, वन, गुफा, कृत्रिम संरचना अथवा शाल्मली (सेमल), शमी (खेजड़ी) और क्षीरवृक्ष (दूध देने वाले वृक्ष) जैसे विशेष वृक्षों से किया जाता था — यह अध्याय 8.5 में वृक्षों से संबंधित नियमों से भी जुड़ता है। आकृति के अनुसार गाँव के आठ प्रकार (मानसार) मानसार शिल्पशास्त्र गाँवों को उनकी आकृति और सड़क-योजना के आधार पर आठ प्रमुख वर्गों में बाँटता है। हर प्रकार की अपनी विशिष्ट पहचान, उपयुक्त स्थल और सामाजिक उपयुक्तता होती है: दंडक — डंडे या फालेंक्स जैसी सीधी आकृति; सड़कें केंद्र में समकोण पर काटती हैं, पूर्व-पश्चिम एवं उत्तर-दक्षिण चलती हैं। यह ब्राह्मणों, ऋषियों और विद्वानों के लिए उपयुक्त माना गया, जिसमें 12 से 3,000 तक घर हो सकते हैं। सर्वतोभद्र — वर्गाकार अथवा आयताकार, मंडूक अथवा स्थंडिल पद्धति से आंतरिक कक्षों में विभाजित; बड़े गाँवों एवं नगरों के लिए उपयुक्त, सुरक्षा की दृष्टि से मज़बूत माना गया। नंद्यावर्त — सर्वतोभद्र जैसा ही किंतु अत्यंत शुभ माना गया, “आनंद का धाम”; विशेष रूप से ब्राह्मण-बस्तियों के लिए उपयुक्त, वर्गाकार अथवा आयताकार आकृति में 1 से 5 प्रमुख मार्ग। पद्मक — कमल के आकार जैसी संरचना, इसकी पाँच उप-किस्में शास्त्रों में वर्णित हैं। स्वस्तिक — सड़कें स्वस्तिक चिह्न के अनुरूप बनाई जाती हैं; दो प्रमुख मार्ग केंद्र में पूर्व-पश्चिम एवं उत्तर-दक्षिण मिलते हैं। प्रस्तार — शाब्दिक अर्थ “शय्या जैसा फैला हुआ”; तीन पूर्व-पश्चिम मार्गों को तीन से सात आड़े मार्ग काटते हैं। कार्मुक — धनुष के आकार जैसी अर्ध-वृत्ताकार अथवा अर्ध-दीर्घवृत्ताकार संरचना; नदी-तट अथवा समुद्र-तट पर बसाए जाने के लिए विशेष रूप से उपयुक्त, प्रायः व्यापारी एवं श्रमिक वर्ग के लिए। चतुर्मुख — पूर्व-पश्चिम दिशा में फैला वर्गाकार अथवा आयताकार गाँव, जिसके केंद्र में प्रायः एक प्रमुख देव-मंदिर स्थापित किया जाता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि सभी आठ प्रकारों में उत्तर-दक्षिण चलने वाली सड़कों की संख्या पूर्व-पश्चिम सड़कों से अधिक रखी जाती थी, ताकि पूर्व-पश्चिम दिशा में भवन खुले रहें और भारत में सामान्यतः उत्तर-दक्षिण चलने वाली हवा भवनों के भीतर स्वतंत्र रूप से प्रवाहित हो सके, जबकि पूर्व-पश्चिम सड़कों की लंबाई अधिक रखकर धूल के गुबार को बस्ती में प्रवेश करने से रोका जाता था — यह शुद्ध रूप से जलवायु-वैज्ञानिक सोच का परिणाम है। आदर्श गाँव की आंतरिक बनावट मानसार के अनुसार हर गाँव ईंट अथवा पत्थर की एक चारदीवारी से घिरा होता था, और उसके बाहर एक चौड़ी व गहरी खाई खोदी जाती थी जो आक्रमण की स्थिति में बाधा उत्पन्न करे। चारों दिशाओं के मध्य में एक-एक — कुल चार — मुख्य द्वार, तथा चार कोनों पर चार अतिरिक्त द्वार बनाए जाते थे। दीवार के भीतर पूरे गाँव के चक्कर लगाती एक बड़ी परिधि-सड़क होती थी, और इसके अतिरिक्त दो बड़ी सड़कें विपरीत मुख्य द्वारों को आपस में जोड़ते हुए केंद्र में एक-दूसरे को काटती थीं — जहाँ प्रायः एक मंदिर अथवा सभा-भवन बनाया जाता था, ठीक वैसे ही जैसे हमने अध्याय 7.7 में मंदिर के मंडप की चर्चा में देखा था। इस प्रकार गाँव चार मुख्य खंडों में बँट जाता, और हर खंड आगे उप-सड़कों से कई छोटे खंडों में विभाजित होता। मुख्य सड़कों पर बने घरों की भूतल मंज़िल पर दुकानें होतीं, जबकि परिधि-सड़क पर पुस्तकालय एवं अतिथि-गृह जैसी सार्वजनिक इमारतें बनाई जातीं। जल-निकासी हेतु नालियाँ भूमि के ढलान के अनुसार बनाई जातीं, और तालाब-कुंड बस्ती के भीतर ही ऐसी जगह खोदे जाते जहाँ अधिकतम निवासी आसानी से पहुँच सकें — इसका विस्तृत वर्णन हम अध्याय 8.4 में जलाशय-निर्माण के संदर्भ में करेंगे। मंदिर, उद्यान और सार्वजनिक स्थल भी इसी सुविधाजनक ढंग से वितरित किए जाते। वर्ण एवं व्यवसाय के अनुसार बसावट शिल्पशास्त्रों में एक ही जाति अथवा व्यवसाय के लोगों को गाँव के एक ही हिस्से में बसाने की परंपरा मिलती है। सबसे उत्तम स्थान (प्रायः केंद्र के निकट) ब्राह्मणों एवं शिल्पियों/वास्तुकारों (स्थपति) के लिए आरक्षित माना गया — शिल्पियों को इतना सम्मानजनक स्थान देना संस्कृत साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है। इसके विपरीत, निम्न मानी गई बस्तियाँ एवं श्मशान भूमि गाँव की चारदीवारी के बाहर, विशेषतः उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थापित करने का निर्देश है, और चामुंडा जैसी उग्र देवियों के मंदिर भी दीवार के बाहर ही बनाए जाते थे। आज के दृष्टिकोण से जातिगत विभाजन का यह पक्ष स्पष्ट रूप से उस युग की सामाजिक संरचना को दर्शाता है, जो वर्तमान समतावादी मूल्यों से मेल नहीं खाता — हम इसे केवल ऐतिहासिक-शास्त्रीय जानकारी के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, आज के नगर-नियोजन के लिए अनुशंसा के रूप में नहीं। इस अध्याय से जो व्यावहारिक और कालातीत सीख ली जा सकती है, वह है: दिशा-आधारित हवा एवं प्रकाश का ध्यान, केंद्रीय सामुदायिक स्थल की अवधारणा, और जल-निकासी व जलाशयों की सुनियोजित व्यवस्था

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