अध्याय १.१ — हस्त-रेखा विज्ञान का परिचय और इतिहास | सामुद्रिक शास्त्र की प्राचीन विद्या

हस्त-रेखा विज्ञान का परिचय एवं इतिहास - साधु आशीर्वाद मुद्रा

हस्त-रेखा विज्ञान — यह नाम सुनते ही अनेक लोगों के मन में एक जिज्ञासा जागती है। क्या वास्तव में हाथ की रेखाओं से भविष्य जाना जा सकता है? क्या यह केवल अन्धविश्वास है या इसके पीछे कोई गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य है? पाँच वर्षों के ज्योतिष और सामुद्रिक परामर्श के अनुभव में मैंने हजारों हाथ देखे हैं — और एक बात निश्चित रूप से कह सकता हूँ — हस्त-रेखा विज्ञान एक गहरी और प्राचीन भारतीय विद्या है जो मानव स्वभाव, स्वास्थ्य और भाग्य के रहस्यों को उजागर करती है।

जब मैं किसी जातक का हाथ पहली बार देखता हूँ तो एक विचित्र अनुभव होता है — मानो उस व्यक्ति की पूरी जीवन-यात्रा मेरी आँखों के सामने खुलती जाती है। एक बार एक युवक आए — मुश्किल से पच्चीस वर्ष के। उनके हाथ में जीवन-रेखा खण्डित थी, मस्तिष्क-रेखा पर एक गहरा द्वीप था और भाग्य-रेखा ही नहीं थी। मैंने कहा — आप अभी बहुत कठिन दौर से गुजर रहे हैं, स्वास्थ्य और मन दोनों पर दबाव है, परन्तु पैंतीसवें वर्ष के बाद जीवन में एक नई शुरुआत होगी। उन्होंने बताया कि वे एक गम्भीर बीमारी से उबर रहे थे और नौकरी भी गई थी। आज वे एक सफल उद्यमी हैं। यह हस्त-रेखा विज्ञान की शक्ति है।

हस्त-रेखा विज्ञान का प्राचीन इतिहास

हस्त-रेखा विज्ञान भारत में अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित है। कर-लक्षणं (सामुद्रिक शास्त्र) के प्रस्तावना में प्रो. प्रफुल्लकुमार मोदी ने स्पष्ट लिखा है — “हस्तरेखा-ज्ञान का प्रचार भारतवर्ष में बहुत प्राचीन काल से रहा है। पुराणों में, बौद्धों के पालि धर्मशास्त्रों में तथा जैनों के प्राकृत आगमों में भी इसका उल्लेख पाया जाता है।” संस्कृत में इस विद्या को “सामुद्रिक शास्त्र” कहा गया है।

अग्निपुराण के अनुसार प्राचीन काल में समुद्र ऋषि ने अपने शिष्य गर्ग को इस विद्या का अध्ययन कराया था। इसीलिए इसे “सामुद्रिक” कहते हैं — क्योंकि इसके आदि प्रवर्तक समुद्र ऋषि थे।

“लक्षणं यत्समुद्रेण गर्गायोक्तं यथा पुरा।”

अग्निपुराण, पृ. २४२

वराहमिहिर ने अपने सुप्रसिद्ध ज्योतिष ग्रन्थ “बृहत्संहिता” के महापुरुषलक्षण नामक सर्ग (अध्याय ६७-६९) में हस्त-रेखा विज्ञान का विस्तृत वर्णन किया है। वराहमिहिर के टीकाकार उत्पलभट्ट ने “यथाह समुद्रः” कहकर बहुत से श्लोक समुद्र ऋषि प्रणीत उद्धृत किये हैं। जिनसेनाचार्य ने “हरिवंशपुराण” के २३वें सर्ग के ५५वें श्लोक से १०७वें श्लोक तक नर-लक्षण का वर्णन किया है जिसमें हस्त-लक्षण और उनकी सार्थकता है।

शास्त्रों में हस्त-रेखा विज्ञान की महिमा

“पावइ लाहालाहं सुहदुक्खं जीविअं च मरणं च। रेहाहिं जीवलोए पुरिसो विजयं जयं च तहा॥”

कर-लक्षणं, गाथा २ (समुद्र ऋषि)

समुद्र ऋषि इस मूल गाथा में कहते हैं — इस जीवलोक में मनुष्य लाभ और हानि, सुख और दुःख, जीवन और मरण, जय और पराजय — ये सब रेखाओं के बल से पाता है। यह कितना गहरा सत्य है। हाथ की रेखाएँ केवल भाग्य की सूचक नहीं — वे जीवन की सम्पूर्ण यात्रा का दर्पण हैं।

“करग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्दः प्रभाते कर दर्शनम्॥”

प्राचीन श्लोक — हस्त-रेखा-विज्ञान, पं. गोपेशकुमार ओझा

अर्थात् — हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी निवास करती हैं, हाथ के मध्य में सरस्वती और हाथ के मूल में गोविन्द। इसलिए प्रातःकाल उठते ही हाथ के दर्शन करने चाहिए। यह श्लोक हमारे दैनिक जीवन में हाथ के महत्त्व को दर्शाता है। हाथ केवल कर्म का साधन नहीं — यह ज्ञान (सरस्वती), समृद्धि (लक्ष्मी) और ईश्वर (गोविन्द) का त्रिवेणी संगम है।

अथर्ववेद में भी हाथ की महिमा का वर्णन है — “श्रयं ते हस्तो भगवान् श्रयं ते बलवत्तर।” अर्थात् — आपका हाथ ही भगवान है, आपका हाथ ही बलवत्तर है। पण्डित गोपेशकुमार ओझा ने अपनी महत्त्वपूर्ण पुस्तक “हस्त-रेखा-विज्ञान” में इस सन्दर्भ का उल्लेख करते हुए कहा है — “भाग्य और कर्म दोनों ही हाथ में हैं।”

भारतीय और पाश्चात्य हस्त-रेखा विज्ञान में अन्तर

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात समझनी है। भारतीय सामुद्रिक शास्त्र और पाश्चात्य palmistry में मूलभूत अन्तर है। प्रो. मोदी ने कर-लक्षणं की प्रस्तावना में स्पष्ट किया है — “भारतीय पद्धति रेखाओं, शंख तथा चक्रों पर ज़्यादा जोर देती है जबकि पाश्चात्य पद्धति में नाना आकृतियों और रेखाओं को महत्त्व दिया गया है तथा उसमें एक ही रेखा के अर्थों में बहुधा भेद पड़ जाता है।”

भारतीय हस्त-रेखा विज्ञान की विशेषताएँ इस प्रकार हैं। पहली — भारतीय पद्धति में पुरुष का दाहिना हाथ और स्त्री का बायाँ हाथ देखा जाता है। समुद्र ऋषि ने कर-लक्षणं की तृतीय गाथा में स्पष्ट कहा है —

“दाहिणहत्थे पुरिसाण लक्खणं वामयम्मि महिलाणं। रेहाहिं सुद्ध णिञ्झाइऊण तो लक्खणं सुणह॥”

कर-लक्षणं, गाथा ३

अर्थात् — पुरुषों के लक्षण दाहिने हाथ की तथा स्त्रियों के बायें हाथ की रेखाओं को खूब ध्यान से देखकर जाने जाते हैं। दूसरी — भारतीय पद्धति में मणिबन्ध (कलाई) की रेखाओं को विशेष महत्त्व दिया गया है जबकि पाश्चात्य पद्धति में इनकी उपेक्षा होती है। तीसरी — शंख, स्वस्तिक, मत्स्य, पद्म, चक्र जैसे शुभ चिह्न भारतीय पद्धति में विशेष महत्त्व रखते हैं।

हाथ का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्त्व

पण्डित गोपेशकुमार ओझा ने अपनी पुस्तक “हस्त-रेखा-विज्ञान” में हाथ के आध्यात्मिक महत्त्व पर विस्तृत प्रकाश डाला है। वे लिखते हैं — “हमारे शास्त्रकारों ने हाथ को विविध भागों में विभाजित किया है।” ये भाग हैं — ब्रह्मतीर्थ, पितृतीर्थ, प्रजापतितीर्थ, मातृस्थान, भानुस्थान, वन्धुस्थान, विद्यास्थान, सूत्रस्थान और कर्म का स्थान।

हमारे शास्त्रकारों ने हाथ में देवताओं का वास माना है। “करग्रे वसते लक्ष्मी” — इस श्लोक में हाथ को एक देव-स्थान के रूप में वर्णित किया गया है। विभिन्न प्रकार की मुद्राएँ — प्रणाम-मुद्रा, परशु-मुद्रा, गदा-मुद्रा, श्रावाहनी-मुद्रा, वेणु-मुद्रा — ये सब हाथ की विशेष स्थितियाँ हैं जो विशेष भावों और शक्तियों को जागृत करती हैं।

इसके अतिरिक्त, हाथ और मस्तिष्क का अत्यन्त गहरा सम्बन्ध है। हस्त-रेखा-विज्ञान में पण्डित ओझा ने बताया है कि मस्तिष्क के सहस्रों ज्ञान-तन्तुओं द्वारा विचार और शक्ति हमारे हाथों और उँगलियों में आती है। इसीलिए मानसिक स्वास्थ्य का प्रतिबिम्ब हाथ की रेखाओं में स्पष्ट दिखता है।

हस्त-रेखा विज्ञान और वैदिक ज्योतिष का सम्बन्ध

पाँच वर्षों के ज्योतिष परामर्श में मैंने एक बात बहुत गहराई से अनुभव की है — हस्त-रेखा विज्ञान और वैदिक ज्योतिष एक-दूसरे के पूरक हैं। जो भाग्य कुण्डली में दिखता है, वह हाथ की रेखाओं में भी प्रतिबिम्बित होता है। यह संयोग नहीं है — यह उस दिव्य व्यवस्था का प्रमाण है जो इस ब्रह्माण्ड को संचालित करती है।

वराहमिहिर ने अपनी बृहत्संहिता में जब ग्रह-लक्षण और नरलक्षण का वर्णन किया तो उन्होंने हाथ के ग्रह-क्षेत्रों (पर्वतों) का भी विस्तृत वर्णन किया। हाथ में नौ ग्रह-क्षेत्र होते हैं — गुरु-क्षेत्र, शनि-क्षेत्र, सूर्य-क्षेत्र, बुध-क्षेत्र, मंगल-क्षेत्र, शुक्र-क्षेत्र, चन्द्र-क्षेत्र आदि। जिस व्यक्ति का जो ग्रह-क्षेत्र उन्नत और पुष्ट होता है, उसमें उस ग्रह के गुण स्वाभाविक रूप से होते हैं।

एक उदाहरण देता हूँ — एक जातक आए जिनकी कुण्डली में गुरु अत्यन्त बलवान था। जब हाथ देखा तो गुरु-पर्वत (तर्जनी के नीचे का उभार) अत्यन्त पुष्ट और उन्नत था। दोनों संकेत एक ही दिशा में थे — ज्ञान, उदारता और आध्यात्मिक प्रवृत्ति। यह संगति ही हस्त-रेखा विज्ञान और ज्योतिष के एकीकरण की शक्ति है।

हाथ के दस भाग — शास्त्रोक्त विभाजन

पण्डित गोपेशकुमार ओझा के अनुसार हमारे शास्त्रकारों ने हाथ को दस भागों में विभाजित किया है। ये दस भाग हैं — ब्राह्मतीर्थ (अँगूठे के मूल में), पितृतीर्थ (तर्जनी और अँगूठे के बीच में), प्रजापतितीर्थ (कनिष्ठिका के बाद), मातृस्थान, भानुस्थान, वन्धुस्थान, विद्यास्थान, सूत्रस्थान, कर्मस्थान और करतल-मध्य।

उँगलियों के अग्रभाग को “देवतीर्थ” कहते हैं। कार्य-विशेष के लिये हाथ का भाग विशेष, निर्दिष्ट है। उदाहरण के लिये — पितरों को तर्पण करना हो तो पितृतीर्थ से, जातकर्म संस्कार के समय ब्राह्मणिका से घी या शहद चटाना हो तो ब्रह्मतीर्थ से।

यह विभाजन केवल धार्मिक नहीं है — इसका हस्त-रेखा विश्लेषण में भी महत्त्व है। जिस क्षेत्र में रेखा प्रकट हो, उस क्षेत्र के देवता या तत्त्व से उस रेखा का सम्बन्ध जोड़कर फल बताया जाता है।

हस्त-रेखा विज्ञान के मूलभूत सिद्धान्त

इस पाठ्यक्रम में आगे बढ़ने से पहले हस्त-रेखा विज्ञान के कुछ मूलभूत सिद्धान्तों को समझना आवश्यक है जो मेरे पाँच वर्षों के अनुभव और शास्त्रों के अध्ययन से निकले हैं।

पहला सिद्धान्त — हाथ बदलता है: हाथ की रेखाएँ स्थायी नहीं होतीं — वे जीवन के साथ बदलती हैं। जैसे-जैसे व्यक्ति के विचार, कर्म और जीवन-शैली बदलती है, वैसे-वैसे हाथ की रेखाएँ भी बदलती हैं। पण्डित ओझा ने भी यह स्पष्ट किया है। मैंने स्वयं देखा है — एक जातक जिनकी जीवन-रेखा खण्डित थी, दस वर्ष बाद जब उन्होंने अपना जीवन बदला तो रेखा भी सुधर गई।

दूसरा सिद्धान्त — एक रेखा से फल मत बताओ: कर-लक्षणं में समुद्र ऋषि और हस्त-रेखा-विज्ञान में पण्डित ओझा दोनों ने यही कहा है — किसी एक लक्षण से फल नहीं कहना चाहिए, अन्य लक्षणों से तुलना कर फलादेश करना उचित है। एक रेखा केवल एक संकेत है — सम्पूर्ण हाथ एक चित्र है।

तीसरा सिद्धान्त — दोनों हाथ देखो: दाहिना हाथ भाग्य और कर्म को दर्शाता है जो इस जन्म में प्राप्त हुआ है। बायाँ हाथ जन्मजात क्षमताओं और पूर्वजन्म के संस्कारों को। दोनों हाथों की तुलना करके ही सम्पूर्ण विश्लेषण सम्भव है।

चौथा सिद्धान्त — रेखाओं का रंग और स्वरूप: कर-लक्षणं की गाथा २३-२५ में रेखाओं के स्वरूप और रंग का विस्तृत वर्णन है। रेखाएँ पल्लवित (शाखाओं वाली), विच्छिन्न (टूटी हुई), विरल (कम), विषम (असमान), हरित, स्फुटित (फटी), विवर्ण (बेरंग), नील (नीली) और रूक्ष होती हैं — और इन सबका अलग-अलग फल होता है।

“पल्लिवआ विच्छिण्णा विरला विसमा य णिदिसे रेहा। हरिआ फुडिअ विवण्णा नीला रुक्खा तहा चेव॥”

कर-लक्षणं, गाथा २३

पाँचवाँ सिद्धान्त — रेखाओं के साथ चिह्न भी देखो: हाथ पर केवल रेखाएँ ही नहीं, अनेक शुभ-अशुभ चिह्न भी होते हैं। मत्स्य, शंख, स्वस्तिक, पद्म, चक्र — ये शुभ चिह्न हैं। काकपद, द्वीप (Island), जाली — ये अशुभ संकेत हैं। वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में इन चिह्नों का विस्तृत वर्णन किया है।

हस्त-रेखा विज्ञान पाठ्यक्रम की संरचना

इस पाठ्यक्रम में हम क्रमबद्ध रूप से हस्त-रेखा विज्ञान का अध्ययन करेंगे — एकदम आधार से लेकर उन्नत स्तर तक। प्रत्येक अध्याय में शास्त्रोक्त श्लोकों के साथ व्यावहारिक अनुभव भी समाहित होगा।

मॉड्यूल २ में हम हाथ के सामान्य स्वरूप का अध्ययन करेंगे — हाथ के प्रकार, रंग, त्वचा की कोमलता, हाथ का आकार और इनसे क्या जाना जा सकता है। वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में कहा है — जिनके हाथ वानर के समान हों वे धनी होते हैं और जिनके व्याघ्र के समान हों वे पापी। हाथ का सामान्य स्वरूप ही बहुत कुछ बता देता है।

मॉड्यूल ३ में उँगलियों और अँगूठे का विस्तृत विश्लेषण होगा। कर-लक्षणं में समुद्र ऋषि ने उँगलियों के पर्वों (पोरों), उनके बीच के अन्तर और उँगलियों की विशेषताओं का अत्यन्त सूक्ष्म विश्लेषण किया है। मॉड्यूल ४ में ग्रह-क्षेत्र (पर्वत) का अध्ययन होगा। मॉड्यूल ५ में मणिबन्ध (कलाई) की रेखाओं का — जो भारतीय पद्धति की एक विशेषता है। मॉड्यूल ६ से ११ तक पाँच प्रमुख रेखाओं और अन्य महत्त्वपूर्ण रेखाओं का विस्तृत अध्ययन होगा। मॉड्यूल १२ में सम्पूर्ण हस्त विश्लेषण की उन्नत पद्धति सीखेंगे।

पाँच प्रमुख रेखाएँ — भारतीय शास्त्र के अनुसार

कर-लक्षणं की गाथा १२ में समुद्र ऋषि ने पाँच प्रमुख रेखाओं का उल्लेख किया है जो पुरुष के हाथ के पूर्वकर्म को सूचित करती हैं —

“विज्जाकुलधणरूवं रेहितअं आउ-उह्रेहाओ। पंच वि रेहाओ करे जणस्स पयदंति पुव्वकयं॥”

कर-लक्षणं, गाथा १२

अर्थात् — पुरुष के हाथ की पंचरेखाएँ उसके पूर्वजन्म के कर्मों को सूचित करती हैं। इनमें तीन विद्या, कुल और धन-रूप हैं, एक आयु की रेखा और एक ऊर्ध्व-रेखा है। ये पाँच रेखाएँ हैं — विद्या-रेखा (मस्तिष्क-रेखा), कुल-रेखा (हृदय-रेखा), धन-रेखा (भाग्य-रेखा), आयु-रेखा (जीवन-रेखा) और ऊर्ध्व-रेखा (सूर्य-रेखा)। यह वर्गीकरण पाश्चात्य palmistry से भिन्न है और भारतीय परम्परा का विशिष्ट योगदान है।

क्या हस्त-रेखा विज्ञान वैज्ञानिक है?

यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है — और उत्तर देने से पहले मैं एक बात स्पष्ट कर दूँ। विज्ञान वह है जो अनुभव और प्रयोग से सिद्ध हो। हस्त-रेखा विज्ञान सहस्रों वर्षों के अनुभव का संकलन है। हजारों ऋषियों, आचार्यों और विद्वानों ने लाखों हाथ देखे और उनके अनुभवों को शास्त्रों में संकलित किया।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भी स्वीकार किया है कि हाथ की रेखाएँ और हाथ का स्वरूप कुछ रोगों का संकेत दे सकते हैं। Down’s Syndrome में हाथ पर एक विशेष रेखा होती है जिसे “Simian Line” कहते हैं। हृदय रोग के रोगियों में हाथ की विशेष संरचना देखी गई है। पण्डित ओझा ने अपनी पुस्तक में उल्लेख किया है कि एक बार अँगूठे की शिराओं को ठीक करके लकवे के रोग को रोका जा सकता है — यह आधुनिक विज्ञान से भी प्रमाणित हो चुका है।

परन्तु मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह कहता है — हस्त-रेखा विज्ञान को केवल “वैज्ञानिक” या “अवैज्ञानिक” के खाँचे में मत डालिये। यह एक समग्र दर्शन है जो मनुष्य के शरीर, मन, कर्म और भाग्य को एक साथ देखता है।

किस हाथ से क्या जाना जाता है — एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न

पाँच वर्षों के अनुभव में यह प्रश्न सबसे अधिक पूछा गया है — “कौन सा हाथ देखते हैं?” इसका उत्तर शास्त्र और अनुभव दोनों मिलाकर यह है —

भारतीय सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार पुरुष का दाहिना हाथ और स्त्री का बायाँ हाथ प्रमुख रूप से देखा जाता है। परन्तु दोनों हाथों का अध्ययन आवश्यक है। दाहिना हाथ कर्म-भाग्य (जो आपने इस जन्म में अर्जित किया), बायाँ हाथ जन्मजात क्षमताएँ और पूर्वजन्म के संस्कार बताता है। जब दोनों हाथों में समानता हो तो फल निश्चित। जब भिन्नता हो तो कर्म और भाग्य में अन्तर है।

मैंने एक जातक को देखा जिनके बायें हाथ में अत्यन्त उत्तम रेखाएँ थीं — जीवन-रेखा गहरी और लम्बी, भाग्य-रेखा स्पष्ट, सूर्य-रेखा प्रकट। परन्तु दाहिने हाथ में सब रेखाएँ खण्डित और अस्पष्ट थीं। यह संकेत था कि जन्मजात प्रतिभा असाधारण है परन्तु कर्म-पुरुषार्थ में कमी। मैंने उन्हें समझाया और उन्होंने जब परिश्रम बढ़ाया तो धीरे-धीरे दाहिने हाथ की रेखाएँ भी सुधरने लगीं।

हस्त-रेखा विज्ञान सीखने की विधि

इस पाठ्यक्रम में भाग लेने वाले प्रत्येक विद्यार्थी से मेरा अनुरोध है — केवल पढ़ो मत, अभ्यास करो। जितने अधिक हाथ देखोगे, उतनी अधिक गहराई आएगी। समुद्र ऋषि ने कर-लक्षणं में और वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में जो लिखा है वह सहस्रों अनुभवों का सार है — उसे केवल पढ़कर नहीं, देखकर और परखकर समझना होगा।

पण्डित ओझा ने हस्त-रेखा-विज्ञान में कहा है — “यदि कोई विचित्र हाथ देखने में आवे तो उसकी छाप और विवरण भेजने का अनुग्रह करें।” यह एक सच्चे विद्वान का दृष्टिकोण है — सतत सीखते रहने का। मैं भी अपने पाँच वर्षों के अनुभव में यही कहूँगा — हर हाथ कुछ नया सिखाता है।

इस पाठ्यक्रम में हम एक-एक विषय को इतनी गहराई से समझेंगे कि आप स्वयं हाथ देखकर सही और सटीक विश्लेषण कर सकें। प्रत्येक अध्याय में शास्त्रोक्त श्लोक, व्यावहारिक उदाहरण और सामान्य प्रश्नों के उत्तर होंगे। अपनी कुण्डली और हस्त-रेखा का सम्पूर्ण विश्लेषण करवाने के लिए WhatsApp पर परामर्श बुक करें। प्रामाणिक रत्न और उपाय के लिए EffectiveGems.com से सम्पर्क करें।

अगले अध्याय की ओर

इस प्रथम अध्याय में हमने हस्त-रेखा विज्ञान का इतिहास, उसके शास्त्रीय आधार, भारतीय और पाश्चात्य पद्धतियों का अन्तर, हाथ का आध्यात्मिक महत्त्व और इस विद्या के मूलभूत सिद्धान्त समझे। अगले अध्याय में हम हाथ के सामान्य स्वरूप का विस्तृत अध्ययन करेंगे — हाथ के प्रकार कौन से हैं, हाथ का रंग क्या बताता है, त्वचा की कोमलता और कठोरता से क्या जाना जाता है — वराहमिहिर की बृहत्संहिता और पण्डित ओझा की हस्त-रेखा-विज्ञान दोनों के प्रकाश में।

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Ajit Kumar Nath
Lekhak: Ajit Kumar Nath

Ajit Kumar Nath — AstroVgyaan ke sansthapak aur research lead. Inka vishwas hai ki gyan ka asli uddeshya seva hai — isliye inka kaam kabhi bhi vyaktigat consultation ya paid sessions tak simit nahi raha. Vedic Jyotish (Parashari Hora Shastra, Jaimini Sutram, Bhrigu Nandi Nadi), Lal Kitab, Vastu Shastra aur Ank Jyotish (Numerology) par varshon ka swatantra adhyayan aur shodh karke, unhe saral, imandaar aur research-aadharit lekhon ke roop mein sabke liye free upalabdh karana — yahi inka jeevan-uddeshya hai. Research aur collaboration ke liye: astrovgyaan@gmail.com

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