नगर निर्माण — मार्ग, वीथी, राजधानी का वास्तु
गाँव की सड़कें छोटी और सीमित होती हैं, लेकिन जब वही बसावट एक बड़े नगर या राजधानी में बदलती है, तो मार्गों की एक पूरी पदानुक्रमित व्यवस्था खड़ी करनी पड़ती है — चौड़ाई, दिशा, उपयोग और यहाँ तक कि यातायात के प्रकार तक तय करने वाली। इस अध्याय में हम शिल्पशास्त्र की मार्ग-वीथी शब्दावली, सड़कों की मानक चौड़ाई, और राजधानी नगर में राजमहल तथा व्यवसायों की बसावट कैसे तय होती थी — इन सबको विस्तार से समझेंगे। सड़कों का त्रिविध कार्य प्राचीन स्थपतियों (नगर-वास्तुकारों) की दृष्टि में सड़कें केवल आवागमन का साधन नहीं थीं। शिल्पशास्त्र इन्हें तीन कार्यों में बाँटता है — पहला, यातायात के लिए राजमार्ग; दूसरा, भवन-भूखंडों की सीमा तय करने वाला उपकरण (पद-विन्यास इसी सड़क-योजना पर आधारित होता था); और तीसरा, स्वच्छता एवं मुक्त वायु-संचार की धमनी। इसीलिए सड़क-योजना को पद-विन्यास (भूखंड-विभाजन) से पहले नहीं, बल्कि उसी के साथ एक समन्वित प्रक्रिया माना गया। वीथी शब्दावली — मार्गों के शास्त्रीय नाम मयमत एवं मानसार में हर प्रकार के मार्ग का एक अलग शास्त्रीय नाम है, जो उसकी दिशा, बनावट अथवा उपयोग को दर्शाता है: राजपथ — पूर्व से पश्चिम चलने वाला प्रमुख मार्ग। राजवीथी — जिसके दोनों छोरों पर द्वार लगे हों। संधिवीथी — जिसमें अन्य मार्गों के संधि-स्थल (जंक्शन) आते हों। महाकाल अथवा वामन — दक्षिण दिशा में स्थित मार्ग। मंगलवीथी — गाँव अथवा नगर का पूरा चक्कर लगाने वाली परिधि-सड़क, चौड़ाई 1 से 5 दंड तक। ब्रह्मवीथी — केंद्र (ब्रह्मस्थान) से होकर गुज़रने वाला मार्ग, जिसे सड़क-जाल की “नाभि” कहा गया है — यह सीधे अध्याय 3.6 में पढ़े गए ब्रह्मस्थान के महत्व से जुड़ता है। नाराचपथ — आड़े द्वारों (transverse doors) से युक्त मार्ग। वामनपथ — उत्तर दिशा की ओर मुख किए, द्वार व अर्गला से सुसज्जित अपेक्षाकृत संकरे मार्ग। इन सभी में राजपथ एवं राजवीथी सबसे प्रमुख माने जाते थे — इन्हीं के सहारे राष्ट्रीय राजमार्गों से नगर का सीधा जुड़ाव होता था। ध्यान देने योग्य है कि तिरछे (विकर्ण) मार्ग शास्त्रों में सामान्यतः वर्जित थे — केवल पहाड़ी क्षेत्रों जैसी विवशता में ही विकर्ण मार्ग स्वीकार किए जाते थे, अन्यथा सभी सड़कें पूर्व-पश्चिम अथवा उत्तर-दक्षिण दिशा में सीधी रखी जाती थीं। सड़कों की चौड़ाई एवं यातायात-पृथक्करण देवी पुराण के अनुसार राजमार्ग की चौड़ाई 10 धनुष (लगभग 40 हाथ) होनी चाहिए, ताकि मनुष्य, घोड़े, हाथी और वाहन बिना किसी रुकावट के स्वतंत्र रूप से आ-जा सकें। इसी क्रम में देश-मार्ग (देश को जोड़ने वाली सड़क) 30 धनुष, ग्राम-मार्ग 20 धनुष, और सीमा-मार्ग केवल 10 धनुष चौड़ा रखने का निर्देश मिलता है — यानी मार्ग जितना बड़ा क्षेत्र जोड़ता, उतना ही अधिक चौड़ा होना अनिवार्य था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में एक और दिलचस्प व्यवस्था मिलती है — रथों के लिए अलग मार्ग, पशुओं (गाय-भैंस) के लिए अलग, हाथियों के लिए अलग, और छोटे चतुष्पदों तथा पैदल मनुष्यों के लिए अलग मार्ग बनाने का निर्देश था। यानी आज की “यातायात पृथक्करण” (traffic segregation) की अवधारणा — जिसे हम आधुनिक शहरी योजना में नई मानते हैं — भारत में 2,000 वर्ष से भी पुरानी परंपरा है। समरांगण सूत्रधार के अनुसार एक आदर्श नगर में कुल 34 मार्ग होते — 17 पूर्व-पश्चिम एवं 17 ही उत्तर-दक्षिण दिशा में — जिसमें राजमार्ग (केंद्रीय मुख्य पथ, नगर के आकार अनुसार 24/20/16 हाथ चौड़ा), दो महारथ्या (बड़े रथ-मार्ग), चार यानमार्ग (वाहन-पथ, हर एक के दोनों ओर जंघापथ यानी पैदल-पथ सहित), और दो घंटामार्ग (परकोटे के सहारे चलने वाले मार्ग) शामिल थे। सड़कें बीच में कछुए की पीठ जैसी उठी हुई बनाई जातीं और कंकड़-बजरी से मज़बूत की जातीं, तथा दोनों ओर जल-निकासी नालियाँ होतीं। नगर-वर्गीकरण — मार्ग-संख्या के अनुसार मयमत ग्रंथ में सड़कों की संख्या के अनुसार नगरों को क्रमिक रूप से वर्गीकृत किया गया है — छोटे दंडक नगर से शुरू होकर बड़े नगरों तक। जैसे-जैसे मार्गों की संख्या बढ़ती जाती (1 से 11 तक), नगर का आकार, महत्व और सामाजिक जटिलता भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती। इसी क्रम के अंतिम, सबसे विशाल प्रकार राजधानी और साम्राज्य-मुख्यालय के लिए आरक्षित थे — जिनकी चर्चा अगले भाग में करेंगे। राजधानी नगर की विशेष व्यवस्था साम्राज्य-मुख्यालय वाले नगर को “जयांग” कहा गया है — इसमें पूर्व-पश्चिम 9 एवं उत्तर-दक्षिण 9 मार्गों का सघन जाल होता, चार दिशाओं में चार मुख्य द्वार तथा चार कोनों पर चार अतिरिक्त द्वार होते। इससे भी बड़ा “विजय” नगर होता, जिसमें 10×10 मार्ग होते और जहाँ राजकीय दुर्ग स्थापित किया जाता। सबसे बड़ा और सर्वोच्च वर्ग “सर्वतोभद्र” नगर का है — 11×11 मार्गों वाला यह नगर राजधानी के लिए आदर्श माना गया, जिसमें राजमहल केंद्रीय ब्रह्मस्थान को छोड़कर कहीं भी बनाया जा सकता था (ब्रह्मस्थान को अछूता रखने का यही सिद्धांत हमने अध्याय 3.6 में घर एवं मंदिर दोनों के लिए देखा था)। राजमहल के सामने एक विशाल प्रांगण होता जहाँ अंतःपुर (रनिवास) स्थित होता। सर्वतोभद्र नगर में पूर्व दिशा की ओर जाने वाला प्रमुख मार्ग “राजवीथी” कहलाता, और उसके दोनों किनारों पर धनी वर्ग के भवन बनाए जाते, उनके निकट व्यापारियों की बस्ती, दक्षिण में बुनकर और उत्तर में बढ़ई/रथकार (पहिया बनाने वाले कारीगर) बसाए जाते — यानी राजवीथी के सहारे ही पूरे नगर का व्यावसायिक मानचित्र तय होता था। जयपुर शहर, जिसे महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 18वीं सदी में शास्त्रोक्त नगर-योजना के आधार पर बसाया, आज भी इस चौकोर (चेसबोर्ड जैसी) ग्रिड-प्रणाली का सबसे प्रसिद्ध जीवंत उदाहरण है — जहाँ राजपथ, वीथियाँ एवं केंद्रीय राजमहल परिसर आज भी उसी शास्त्रीय खाके में मौजूद हैं। सड़क-सौंदर्य एवं मनोवैज्ञानिक सिद्धांत शास्त्रकारों ने केवल यातायात ही नहीं, सड़क के सौंदर्य-मनोविज्ञान पर भी ध्यान दिया। लंबी सीधी सड़क पर देखने वाले की आँख को कहीं टिकने के लिए कुछ चाहिए होता है — इसीलिए मार्गों के मध्य-बिंदुओं और चौराहों पर मंदिर, स्तंभ अथवा ऊँचे वृक्ष लगाने का निर्देश मिलता है, तथा इन चौराहों पर सभा-भवन जैसी सार्वजनिक इमारतें बनाई जातीं। भवनों की कतारें भी एक-दूसरे से सुसंगत रखी जातीं, जिसका उदाहरण रामायण में वर्णित अयोध्या नगरी में मिलता है। 🛣️ अपने भूखंड की सड़क-दिशा का वास्तु जानना चाहते हैं? हमारे वास्तु विशेषज्ञों से परामर्श लें और समझें कि मुख्य सड़क, कोने का प्लॉट अथवा टी-जंक्शन का आपके भवन पर वास्तु प्रभाव क्या होता है। अभी परामर्श बुक करें → सामान्य प्रश्न (FAQ) राजपथ और राजवीथी



