मंडप एवं सभागृह निर्माण
मंदिर में गर्भगृह तक पहुँचने से पहले भक्त किन-किन संरचनाओं से होकर गुज़रता है, और स्तंभों से घिरा वह विशाल हॉल आख़िर वास्तु की दृष्टि से क्या भूमिका निभाता है? मंडप — मंदिर वास्तु का वह हिस्सा है जो सिर्फ़ भीड़ बैठाने की जगह नहीं, बल्कि गर्भगृह की पवित्रता और बाहरी संसार के बीच एक क्रमिक, सोची-समझी संक्रमण-यात्रा है। इस अध्याय में हम मंडप के प्रकार, उसके स्तंभ-निर्माण की तकनीक, और भारत के कुछ सबसे विस्मयकारी सहस्र-स्तंभ हॉल की बात करेंगे। मंडप का कार्य एवं महत्व शिल्पशास्त्र में मंडप को गर्भगृह के सामने बना वह स्तंभ-युक्त हॉल कहा गया है जहाँ भक्तगण एकत्रित होते हैं, धार्मिक अनुष्ठान, संगीत-नृत्य, प्रवचन और उत्सव मनाए जाते हैं। यह गर्भगृह की तरह बंद और अंधेरा नहीं होता — बल्कि खुला, स्तंभों से सहारा पाया हुआ, प्रकाश और हवा से भरा स्थान होता है। वास्तु की दृष्टि से मंडप का उद्देश्य है भक्त को धीरे-धीरे बाहरी सांसारिक ऊर्जा से भीतर की पवित्र, संकेंद्रित ऊर्जा की ओर ले जाना — यानी एक क्रमिक मानसिक और आध्यात्मिक तैयारी। बड़े मंदिरों में एक से अधिक मंडप क्रम में बनाए जाते हैं — भक्त एक मंडप से दूसरे में होते हुए धीरे-धीरे गर्भगृह के पास पहुँचता है। हर मंडप की छत, स्तंभ-संख्या और सजावट का स्तर बदलता जाता है, जो यात्रा में एक लयबद्ध क्रम बनाता है। यही सिद्धांत हमने मॉड्यूल 7 के अध्याय 7.3 में गर्भगृह की चर्चा करते समय भी देखा था, जहाँ जगमोहन (अंतराल मंडप) को गर्भगृह और बाहरी मंडप के बीच का सेतु बताया गया था — विस्तार से आगे इसी अध्याय में देखेंगे। मंडप के प्रकार — कार्य के अनुसार वर्गीकरण मंदिर की भव्यता और कार्यों की विविधता के अनुसार शिल्पशास्त्रों में कई प्रकार के मंडप वर्णित हैं। हर मंडप का अपना विशिष्ट उद्देश्य और स्थान होता है: अर्धमंडप — गर्भगृह के ठीक सामने बना छोटा प्रवेश-मंडप, जो मुख्य मंडप और गर्भगृह के बीच एक संक्षिप्त संक्रमण-स्थान का काम करता है। कई बार इसे जगमोहन भी कहा जाता है। महामंडप — मंदिर का सबसे बड़ा और मुख्य सभा-हॉल, जहाँ बड़ी संख्या में भक्त एकत्रित होकर दर्शन और अनुष्ठान में भाग लेते हैं। यह अक्सर कई स्तंभों की पंक्तियों से सुसज्जित होता है। नृत्य मंडप (नाट्य मंडप) — देवता के सम्मान में शास्त्रीय नृत्य और नाट्य-प्रस्तुति के लिए समर्पित मंडप, जो विशेषकर दक्षिण भारतीय मंदिरों (जैसे चिदंबरम) में बहुत विकसित रूप में मिलता है। रंग मंडप — संगीत, भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए बनाया गया खुला हॉल, जो अक्सर बेहतरीन ध्वनि-अनुकूलन (acoustics) के लिए भी जाना जाता है। कल्याण मंडप — देवी-देवता के विवाह-उत्सव (जैसे कल्याणोत्सवम्) मनाने के लिए विशेष रूप से निर्मित मंडप, जो दक्षिण भारत के बड़े मंदिरों में आमतौर पर पाया जाता है। मुक्ति मंडप (या मोक्ष मंडप) — कुछ मंदिरों में यह मंडप विशेष अनुष्ठानों और अंतिम प्रार्थनाओं के लिए आरक्षित होता है, जो मोक्ष-प्राप्ति की भावना से जुड़ा माना जाता है। हर मंदिर में ये सभी मंडप एक साथ नहीं मिलते — मंदिर के आकार, सम्प्रदाय और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार इनमें से कुछ ही बनाए जाते हैं। लेकिन बड़े द्रविड़ शैली के मंदिरों (जैसे मीनाक्षी मंदिर, मदुरई) में अक्सर एक साथ कई प्रकार के मंडप — नृत्य मंडप, कल्याण मंडप, सहस्र-स्तंभ मंडप — एक ही परिसर में देखने को मिलते हैं। स्तंभ निर्माण — वर्गाकार से वृत्ताकार तक की तकनीक मंडप के स्तंभ केवल छत को सहारा देने वाले खंभे नहीं, बल्कि शिल्पशास्त्र में वर्णित एक सुनिश्चित ज्यामितीय प्रक्रिया से गढ़े गए कला-रूप हैं। परंपरागत निर्माण-विधि में शिल्पी पत्थर के एक वर्गाकार खंड (चतुष्कोण) से शुरुआत करता है, फिर उसके कोनों को काटकर उसे अष्टकोण (आठ भुजाओं वाला) रूप देता है, फिर अष्टकोण के कोनों को पुनः काटकर सोलह-भुजा (षोडशकोण) आकार बनाता है, और अंत में इसी प्रक्रिया को दोहराते हुए स्तंभ को लगभग वृत्ताकार रूप तक पहुँचाया जाता है। यह क्रमिक परिवर्तन — वर्ग से अष्टकोण, अष्टकोण से षोडशकोण, और अंततः वृत्त — केवल तकनीकी कुशलता नहीं दर्शाता, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से स्थूल (भौतिक, वर्गाकार) से सूक्ष्म (आध्यात्मिक, वृत्ताकार) की ओर यात्रा को भी दर्शाता है। स्तंभ के शीर्ष भाग पर अक्सर कमल-कलिका (लोटस बड) के आकार की चूड़ी अथवा घट-पल्लव अलंकरण बनाया जाता है, जो स्तंभ को दृश्यात्मक रूप से पूर्णता प्रदान करता है। स्तंभ का आधार (पादबंध) सामान्यतः वर्गाकार ही रखा जाता है ताकि वह अधिष्ठान की मौल्डिंग-रेखाओं से सामंजस्य बना सके — जिसकी चर्चा हमने अध्याय 7.3 में अधिष्ठान के पंचवर्ग विवरण में की थी। संगीतमय स्तंभ — विट्ठल मंदिर, हम्पी का चमत्कार स्तंभ-निर्माण की कला अपने चरम पर हम्पी के विट्ठल मंदिर परिसर के रंग मंडप में देखने को मिलती है, जहाँ 56 पत्थर के स्तंभ बनाए गए हैं जिन्हें “संगीतमय स्तंभ” (musical pillars) या “सरेगामा स्तंभ” कहा जाता है। हल्के से थपथपाने पर ये स्तंभ भारतीय शास्त्रीय संगीत के सप्तक स्वर — सा, रे, ग, म, प, ध, नी — के समान ध्वनि उत्पन्न करते हैं। प्रत्येक बड़ा स्तंभ सात पतले उप-स्तंभों (मिनी-पिलर) से घिरा होता है, और हर उप-स्तंभ की मोटाई तथा आंतरिक संरचना अलग होने के कारण अलग स्वर उत्पन्न करती है। विजयनगर साम्राज्य के शिल्पियों ने बिना किसी आधुनिक ध्वनि-विज्ञान उपकरण के, केवल पत्थर की मोटाई, लंबाई और खोखलेपन के सटीक अनुपात से यह स्वर-सामंजस्य प्राप्त किया था — जो प्राचीन भारतीय वास्तु-विज्ञान में ध्वनि-भौतिकी (acoustics) की गहरी समझ का प्रमाण है। यह विट्ठल मंदिर परिसर, जिसमें प्रसिद्ध पत्थर रथ (स्टोन चैरियट) भी स्थित है, स्वयं भी एक भव्य मंडप-संरचना पर आधारित है और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का हिस्सा है। सहस्र-स्तंभ मंडप — भारत के विस्मयकारी उदाहरण कुछ मंदिरों में मंडप इतना विशाल बनाया गया कि उसमें सैकड़ों-हज़ारों स्तंभ खड़े किए गए, जिन्हें “सहस्र-स्तंभ मंडप” (thousand-pillar hall) कहा जाता है। वारंगल (तेलंगाना) का काकतीय-कालीन रुद्रेश्वर (हज़ार स्तंभ) मंदिर, जो लगभग 1163 ईस्वी में राजा रुद्र देव द्वारा निर्मित माना जाता है, इस शैली का प्राचीनतम और प्रसिद्ध उदाहरण है — यद्यपि आज उसमें से कई स्तंभ काल के प्रभाव से नष्ट हो चुके हैं। मदुरई के मीनाक्षी अम्मन मंदिर परिसर का प्रसिद्ध “आयिरम काल मंडपम” (सहस्र-स्तंभ मंडप) एक और उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें वास्तव में 985 अलंकृत स्तंभ हैं — प्रत्येक स्तंभ पर यालि (पौराणिक सिंह-जैसे प्राणी),



