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नागर शैली रेखा शिखर शेखरी - खजुराहो लक्ष्मण मंदिर वास्तु
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शिखर के प्रकार एवं निर्माण नियम

मंदिर की सबसे दूर से दिखने वाली, सबसे पहचानी जाने वाली आकृति शिखर ही है। पिछले अध्याय में हमने गर्भगृह, अधिष्ठान और उपपीठ — यानी मंदिर की नींव और आधार-संरचना — को समझा। अब उसी क्रम में सबसे ऊपर आता है शिखर, जो गर्भगृह के ठीक ऊपर उठकर मंदिर को उसका पहचान-रूप देता है। शिखर को शास्त्रों में मेरु पर्वत का प्रतीक माना गया है — ऊर्जा और भक्ति का वह ऊर्ध्वगामी मार्ग जो पृथ्वी से आकाश की ओर, गर्भगृह में स्थापित देवता से सीधे स्वर्ग की ओर उठता प्रतीत होता है। इस अध्याय में हम नागर और द्रविड़ — दोनों शैलियों में शिखर के अलग-अलग प्रकार और उनके निर्माण-नियम विस्तार से समझेंगे। नागर शैली के पाँच शिखर प्रकार नागर शैली में शुरुआत तीन मूल शिखर-प्रकारों से हुई, और दसवीं शताब्दी के बाद इनके मिश्रण से दो नई, अधिक जटिल उप-शैलियाँ विकसित हुईं। इस तरह कुल पाँच प्रकार शिल्पशास्त्रों में वर्णित मिलते हैं: लैटिना (रेखा-प्रासाद) — सबसे सामान्य और मूल प्रकार। आधार वर्गाकार होता है और चारों दीवारें केंद्र-बिंदु की ओर एक हल्के वक्र में ऊपर की ओर झुकती चली जाती हैं, अंत में एक बिंदु पर मिलती हैं। भुवनेश्वर और ओडिशा के अधिकांश प्राचीन मंदिर इसी प्रकार के हैं। फांसना (भद्र शिखर) — आधार अपेक्षाकृत अधिक चौड़ा रखा जाता है और दीवारें सीधी, कम ढलान वाली रेखा में ऊपर उठती हैं। इसकी ऊँचाई लैटिना से कम रहती है, इसलिए यह प्रायः मंडप या प्रवेश-कक्ष की छत के लिए प्रयुक्त होता है, गर्भगृह के मुख्य शिखर के लिए कम। वल्लभी — आधार आयताकार होता है और शीर्ष अर्धगोलाकार, गुम्बदाकार आकृति में समाप्त होता है — कुछ हद तक प्राचीन बौद्ध चैत्यगृहों की छत जैसा प्रभाव देता है। यह अपेक्षाकृत दुर्लभ प्रकार है। शेखरी — मूल रेखा-शिखर के इर्द-गिर्द, दोनों ओर, छोटे-छोटे सहायक शिखरों की एक या अधिक पंक्तियाँ जोड़ी जाती हैं, जिन्हें उरुशृंग कहा जाता है। इससे मुख्य शिखर के साथ एक पर्वत-श्रृंखला जैसा दृश्य प्रभाव बनता है — खजुराहो के अधिकांश मंदिर इसी शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। भूमिज — नागर शैली का सबसे नवीन रूप, जिसमें लघु-शिखरों को क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर — दोनों पंक्तियों में एक जालीनुमा, सुव्यवस्थित रचना में सजाया जाता है। इसे नागर और वेसर शैलियों के तत्वों का मिश्रण माना जाता है, और यह मुख्यतः मध्य भारत व दक्कन क्षेत्र में विकसित हुआ। द्रविड़ शैली में शिखर — एक अलग ही अर्थ यहाँ एक महत्वपूर्ण भ्रम को दूर करना ज़रूरी है — द्रविड़ शैली में “शिखर” शब्द का अर्थ नागर शैली से बिलकुल अलग है। द्रविड़ स्थापत्य में गर्भगृह के ऊपर बनने वाले पूरे पिरामिडीय टावर को विमान कहा जाता है, जो कई तल (मंज़िलों) में बँटा होता है — एक तल वाले विमान को एकतल, दो तल वाले को द्वितल, तीन तल वाले को त्रितल कहा जाता है (इस तल-प्रणाली को हम अगले अध्याय में विस्तार से समझेंगे)। विमान के सबसे ऊपर एक संकरी ग्रीवा (गर्दन जैसी संरचना) होती है, और उसी ग्रीवा के ऊपर रखा गया गुम्बदाकार या अष्टकोणीय पत्थर का शीर्ष-भाग — जिसे तकनीकी रूप से स्तूपिका कहा जाता है — उसे ही द्रविड़ परंपरा में “शिखर” नाम दिया गया है। यानी नागर शैली में शिखर पूरे टावर का नाम है, जबकि द्रविड़ शैली में शिखर सिर्फ सबसे ऊपर के छोटे मुकुट-जैसे हिस्से का नाम है — शेष पूरा ढाँचा विमान कहलाता है। तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर का तेरह मंज़िला विमान इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है, जहाँ हर तल एक लघु मंदिर-प्रतिकृति जैसा अलंकृत है। 🛕 शिखर व मंदिर-संरचना संबंधी सलाह चाहिए? शैली-चयन से लेकर अनुपात तक — विशेषज्ञ वास्तु सलाह से अपने मंदिर-निर्माण को शास्त्र-सम्मत बनाएं। वास्तु परामर्श लें → आमलक और कलश — शिखर का समापन नागर शैली में शिखर की ऊर्ध्वगामी रेखा अंततः एक क्षैतिज, नालीदार, चक्राकार पत्थर पर जाकर रुकती है, जिसे आमलक कहा जाता है — इसका आकार आँवले के फल से मिलता-जुलता होने के कारण यह नाम पड़ा। आमलक के ठीक ऊपर एक कलश (घट के आकार का शीर्ष-भाग) स्थापित किया जाता है, जिसे बिंदु भी कहा जाता है — यह समस्त ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं के एक बिंदु पर संकेंद्रित होने और अमरत्व के कलश का प्रतीक माना गया है। द्रविड़ शैली में यही समापन-बिंदु स्तूपिका (शिखर) और उसके ऊपर के छोटे कलश से पूरा होता है। दोनों शैलियों में यह समान भावना है — चाहे रचना अलग हो, मंदिर के शीर्ष-बिंदु को हमेशा एक पवित्र, ऊर्जा-संकेंद्रण-सूचक प्रतीक से ही पूर्ण किया जाता है, कभी खाली नहीं छोड़ा जाता। शिखर-निर्माण के व्यावहारिक नियम गर्भगृह के ठीक ऊपर — शिखर (या द्रविड़ शैली में विमान) की केंद्र-रेखा हमेशा गर्भगृह की मूर्ति के ठीक ऊपर से गुज़रनी चाहिए, कोई पार्श्व-विचलन स्वीकार्य नहीं। चरणबद्ध निर्माण — शिखर हमेशा उपपीठ, अधिष्ठान और गर्भगृह-भित्ति के पूर्ण होने के बाद ही आरंभ किया जाता है, कभी नींव के साथ एक साथ नहीं बनाया जाता। अनुपात-संतुलन — शिखर की ऊँचाई गर्भगृह के आकार और अधिष्ठान की ऊँचाई के अनुपात में तय की जाती है, ताकि मंदिर देखने में न बहुत नुकीला-असंतुलित लगे, न बहुत दबा हुआ। सामग्री की एकरूपता — परंपरागत निर्माण में शिखर उसी पत्थर या सामग्री से बनाया जाता है जिससे शेष मंदिर बना हो, ताकि संरचनात्मक भार-वितरण एकसमान रहे। शीर्ष प्रतीक अनिवार्य — चाहे आमलक-कलश हो या स्तूपिका-कलश, शिखर को बिना शीर्ष-प्रतीक के अधूरा माना जाता है; निर्माण पूर्णता की अंतिम रस्म भी इसी कलश-स्थापना के साथ जुड़ी होती है। ⬅️ पिछला अध्याय: गर्भगृह, अधिष्ठान एवं उपपीठ निर्माण | अगला अध्याय: एक/द्वि/त्रि-तल मंदिर संरचना सामान्य प्रश्न (FAQ) 1. नागर और द्रविड़ शैली में “शिखर” शब्द का अर्थ अलग क्यों है?नागर शैली में शिखर पूरे टावर का नाम है, जबकि द्रविड़ शैली में यह सिर्फ विमान के सबसे ऊपर के गुम्बदाकार शीर्ष-भाग (स्तूपिका) का नाम है — शेष टावर को विमान कहा जाता है। यह भाषायी भिन्नता शुरुआत में भ्रमित कर सकती है, पर दोनों परंपराओं में यह भेद स्पष्ट रूप से स्थापित है। 2. खजुराहो के मंदिर किस शिखर-प्रकार के उदाहरण हैं?खजुराहो के अधिकांश मंदिर शेखरी प्रकार के हैं, जहाँ मुख्य रेखा-शिखर के इर्द-गिर्द छोटे उरुशृंग (सहायक शिखर) जोड़े गए हैं, जिससे पर्वत-श्रृंखला जैसा भव्य दृश्य-प्रभाव बनता है। 3. आमलक और कलश में क्या अंतर है?आमलक शिखर के शीर्ष पर

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गर्भगृह वास्तु स्थापत्य - हम्पी शिवलिंग गर्भगृह
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गर्भगृह, अधिष्ठान एवं उपपीठ निर्माण

शिल्पशास्त्रों में मंदिर को केवल एक इमारत नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा की देह के रूप में देखा गया है। मंदिर का हर अंग शरीर के किसी न किसी भाग का प्रतीक है — नींव पैर हैं, आधार-चबूतरा जांघ-घुटने हैं, दीवारें शरीर हैं, और शिखर सिर। पिछले अध्याय में हमने नागर, द्रविड़ और वेसर — तीन प्रासाद-शैलियों का अंतर समझा; अब हम मंदिर की नींव से लेकर गर्भगृह तक — यानी उपपीठ, अधिष्ठान और गर्भगृह — के निर्माण-नियमों को विस्तार से समझेंगे। यही तीन भाग किसी भी शैली के मंदिर की बुनियाद तय करते हैं, चाहे ऊपर शिखर किसी भी रूप में क्यों न बना हो। मंदिर की देह-रचना — नींव से शिखर तक वास्तुशास्त्र के अनुसार मंदिर के ब्रह्मसूत्र (केंद्रीय ऊर्ध्वाधर रेखा) की दिशा में नीचे से ऊपर की ओर क्रमशः पाँच प्रमुख भाग बनते हैं — उपपीठ (या जगती), अधिष्ठान, गर्भगृह की भित्ति (दीवार), शिखर, और अंत में आमलक-कलश। परंपरा में इसे देवता के शरीर से जोड़कर समझाया जाता है — उपपीठ चरणों (पैरों) का रूपक है जो पूरे मंदिर को सहारा देता है, अधिष्ठान जांघ और घुटनों जैसा है, गर्भगृह को घेरने वाली भित्ति शरीर और भुजाओं का प्रतीक है, और शिखर सिर व मुकुट का। यह रूपक सिर्फ काव्यात्मक नहीं — यह शिल्पियों को यह याद दिलाता रहता है कि हर भाग का अनुपात एक-दूसरे से जुड़ा होना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे शरीर के अंग एक-दूसरे के अनुपात में होते हैं। उपपीठ — मंदिर की नींव और आधार चबूतरा उपपीठ मंदिर के सबसे नीचे बनने वाला ऊँचा चबूतरा है, जिसे कहीं-कहीं जगती भी कहा जाता है। यह हर मंदिर में अनिवार्य नहीं — छोटे मंदिरों में सीधे अधिष्ठान से निर्माण शुरू हो सकता है, पर बड़े और विशेषकर दक्षिण भारतीय द्रविड़ शैली के मंदिरों में उपपीठ का होना लगभग नियम जैसा माना गया है। इसके तीन मुख्य प्रयोजन हैं — पहला, मंदिर को आसपास की भूमि से ऊँचा उठाकर वर्षा-जल और बाढ़ से सुरक्षित रखना; दूसरा, दर्शनार्थियों के लिए एक प्रदक्षिणा-योग्य ऊँचा मंच तैयार करना; और तीसरा, मंदिर को दूर से देखने पर ही एक भव्य, ऊँचा और पूज्य स्वरूप देना। उपपीठ की अपनी अलग मौल्डिंग-रचना होती है, जो आगे बनने वाले अधिष्ठान की मौल्डिंग को प्रतिबिंबित करती है, जिससे पूरी संरचना में एक दृश्य लय बनी रहती है। बड़े मंदिर परिसरों में उपपीठ की ऊँचाई कई फीट तक हो सकती है, और इसी पर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ बनाई जाती हैं। अधिष्ठान — गर्भगृह की नींव और पंचवर्ग मौल्डिंग अधिष्ठान गर्भगृह की भित्ति के ठीक नीचे बनने वाला आधार-स्तर है, और इसे मंदिर का सबसे निचला अनिवार्य अंग माना गया है — उपपीठ के विपरीत, हर मंदिर में अधिष्ठान अवश्य होता है, चाहे वह छोटा हो या बड़ा। काश्यपशिल्प जैसे प्राचीन शिल्पग्रंथों में अधिष्ठान की पाँच अनिवार्य परतों का वर्णन मिलता है, जिन्हें सम्मिलित रूप से पंचवर्ग कहा जाता है, और जिन अधिष्ठानों में ये पाँचों परतें पूर्ण रूप से मौजूद हों उन्हें शास्त्र में सर्वश्रेष्ठ अधिष्ठान माना गया है: उपान — सबसे नीचे की परत, अधिष्ठान का आधार-तल, जो सीधे भूमि से जुड़ती है। जगती — उपान के ऊपर बनने वाली चौड़ी, ऊँची पट्टी जो पूरे ढाँचे को स्थिरता देती है। कुमुद (या कुम्भ) — प्रायः त्रिफलक अथवा गोलाकार उभार वाली परत, जो अधिष्ठान की सबसे विशिष्ट पहचान मानी जाती है। कम्प (पट्टि) — एक पतली, गहराई वाली पट्टी जो कंठ (गला-भाग) के दोनों ओर बनाई जाती है और छाया-प्रकाश का सुंदर प्रभाव देती है। पट्टिका — सबसे ऊपर की मोटी, आयताकार परत, जिस पर सीधे गर्भगृह की भित्ति खड़ी होती है। इन पाँचों परतों की ऊँचाई और चौड़ाई परस्पर एक निश्चित अनुपात (ताल-मान पद्धति) में बाँधी जाती है, ताकि पूरा अधिष्ठान देखने में सुडौल और संतुलित लगे — न बहुत दबा हुआ, न बहुत ऊँचा। यही कारण है कि पारंपरिक मंदिर-निर्माण में अधिष्ठान की डिज़ाइन तय करने का काम अनुभवी स्थपति ही करते हैं, क्योंकि थोड़ी सी भी अनुपात-चूक पूरे मंदिर के दृश्य-संतुलन को बिगाड़ सकती है। 🛕 मंदिर या पूजा घर निर्माण में सहायता चाहिए? गर्भगृह की दिशा, माप और अनुपात से जुड़े संदेह दूर करने के लिए विशेषज्ञ वास्तु सलाह लें। वास्तु परामर्श लें → गर्भगृह — मंदिर का सबसे पवित्र केंद्र गर्भगृह शब्द ही अपना अर्थ बताता है — “गर्भ” यानी कोख और “गृह” यानी घर। यह मंदिर का वह आंतरिक कक्ष है जिसमें मुख्य देवता या प्रतीक-मूर्ति स्थापित होती है, और यही पूरे मंदिर की संरचना का केंद्र-बिंदु होता है — सब कुछ, उपपीठ से लेकर शिखर तक, गर्भगृह के इर्द-गिर्द ही योजनाबद्ध किया जाता है। गर्भगृह हमेशा सबसे ऊँचे शिखर के ठीक नीचे स्थित होता है, ताकि शिखर की समस्त ऊर्जा-रेखा गर्भगृह के केंद्र पर सीधे उतरे। हमने मॉड्यूल 3 में वास्तु पुरुष मंडल और ब्रह्मस्थान का विस्तार से अध्ययन किया था — गर्भगृह का ठीक स्थान और माप उसी मंडल के केंद्रीय पदों से निकाला जाता है, जिससे मंदिर की पूरी ऊर्जा-संरचना केंद्रित रहती है। गर्भगृह-निर्माण के कुछ शास्त्र-सम्मत नियम हर शैली और हर क्षेत्र में लगभग समान रूप से पाए जाते हैं: आकार सदैव वर्गाकार — गर्भगृह का मूल आकार वर्गाकार (चतुरस्र) रखा जाता है, क्योंकि वर्ग को वास्तु पुरुष मंडल की सबसे स्थिर और संतुलित आकृति माना गया है। केवल एक द्वार — गर्भगृह में सामान्यतः एक ही प्रवेश-द्वार रखा जाता है, ताकि पवित्रता और ऊर्जा का संकेंद्रण बना रहे; एकाधिक द्वार या खिड़कियाँ ऊर्जा को बिखेर देती हैं, ऐसा शास्त्र मानते हैं। दीवारें मोटी और सीलबंद — गर्भगृह की भित्तियाँ अन्य कक्षों से अधिक मोटी रखी जाती हैं, जिससे संरचनात्मक मजबूती के साथ-साथ भीतर एक शांत, अंधकारपूर्ण और एकाग्रता-योग्य वातावरण भी बना रहे। सीधे शिखर के नीचे — गर्भगृह की छत के ठीक ऊपर से शिखर आरंभ होता है, कोई विचलन नहीं रखा जाता। दिशा और मूर्ति-स्थापन — मूर्ति को गर्भगृह के ठीक केंद्र-बिंदु (ब्रह्मस्थान) पर स्थापित किया जाता है, और मंदिर का मुख सामान्यतः पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखा जाता है — यह नियम हमने अध्याय 7.1 में भूमि-चयन के संदर्भ में भी देखा था। तीनों भागों का अनुपात एक-दूसरे से क्यों जुड़ा है भारतीय मंदिर-स्थापत्य में उपपीठ, अधिष्ठान, भित्ति और शिखर की ऊँचाइयों के बीच शास्त्रों में निश्चित अनुपात

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नागर शैली मंदिर - भुवनेश्वर लिंगराज मंदिर वास्तु स्थापत्य
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प्रासाद के प्रकार — नागर, द्रविड़ एवं वेसर शैली में अंतर

क्या आपने कभी सोचा है कि उत्तर भारत के मंदिरों का शिखर ऊपर की ओर पतला होता हुआ नुकीला क्यों दिखता है, जबकि दक्षिण भारत के मंदिरों में विशाल, रंग-बिरंगे गोपुरम सीढ़ीनुमा आकार में उठते हैं? ये कोई संयोग नहीं, बल्कि हज़ारों साल पुराने शिल्पशास्त्रों में वर्णित तीन अलग-अलग प्रासाद-शैलियों का परिणाम है। मंदिर वास्तु शास्त्र में इन्हें नागर, द्रविड़ और वेसर शैली कहा गया है। पिछले अध्याय में हमने मंदिर-निर्माण योग्य भूमि और दिशा का चयन सीखा; अब हम समझेंगे कि एक बार भूमि तय हो जाने के बाद, मंदिर की बाहरी संरचना — यानी प्रासाद — किस शैली में बनेगी, और इसका निर्णय क्षेत्र, परंपरा और उपलब्ध शिल्पकारों पर कैसे निर्भर करता है। शिल्पशास्त्र में तीन प्रासाद शैलियाँ क्यों बताई गई हैं? पूर्व मध्यकालीन शिल्पशास्त्रों में भारत को तीन भौगोलिक क्षेत्रों में बाँटकर तीन मंदिर-शैलियाँ बताई गई हैं। हिमालय और विंध्य पर्वतों के बीच का प्रदेश नागर शैली का घर माना गया, कृष्णा और कावेरी नदियों के बीच की भूमि द्रविड़ शैली की, और विंध्य पर्वत तथा कृष्णा नदी के बीच का मध्य क्षेत्र वेसर शैली का। यह विभाजन सिर्फ भूगोल तक सीमित नहीं — हर क्षेत्र की जलवायु, उपलब्ध पत्थर, स्थानीय राजवंशों की परंपरा और शिल्पकारों की तकनीक ने मिलकर हर शैली को अपना विशिष्ट रूप दिया। तीनों शैलियाँ पंचायतन स्थापत्य-परंपरा से विकसित हुई मानी जाती हैं, और तीनों में गर्भगृह तथा मंडप — दोनों मूल तत्व सामान्य रूप से मौजूद रहते हैं। अंतर मुख्यतः शिखर के आकार, मंदिर की योजना और बाहरी सज्जा में दिखता है। नागर शैली — उत्तर भारत का प्रासाद स्थापत्य नागर शैली हिमालय से लेकर विंध्य पर्वत तक फैले उत्तर भारत के मंदिरों में प्रचलित रही। इसके सबसे पुराने उदाहरण गुप्तकालीन मंदिरों में मिलते हैं — देवगढ़ का दशावतार मंदिर और भितरगाँव का ईंट-निर्मित मंदिर। नागर शैली की सबसे बड़ी पहचान इसका रेखा शिखर है — एक वक्राकार, ऊपर की ओर क्रमशः पतला होता हुआ टावर जो सीधा गर्भगृह के ऊपर खड़ा होता है। शिखर के शीर्ष पर एक घंटाकार या पहियेनुमा पत्थर की संरचना होती है जिसे आमलक कहते हैं, और सबसे ऊपर कलश। मंदिर की मूल भूमि आयताकार होती है, जिसके बीच के दोनों ओर क्रमिक विमान (प्रक्षेप) निकलते हैं — एक-एक विमान वाला भाग त्रिरथ कहलाता है, दो-दो वाला सप्तरथ और चार-चार वाला नवरथ। इन प्रक्षेपों के कारण मंदिर का आधार तिकोना-सा दिखने लगता है। नागर मंदिरों में सामान्यतः चार कक्ष माने गए हैं — गर्भगृह (मूर्ति का स्थान), जगमोहन (प्रवेश मंडप), नाट्यमंदिर (नृत्य-संगीत हेतु) और भोगमंदिर (भोग-प्रसाद हेतु)। प्रारंभिक नागर मंदिरों में स्तंभों का प्रयोग कम था, पर समय के साथ मंडप में स्तंभ जुड़ते गए। दक्षिण भारत के विपरीत, नागर शैली में मंदिर की चारदीवारी और गोपुरम पर विशेष ज़ोर नहीं दिया जाता — मंदिर प्रायः खुले परिसर में खड़ा दिखता है। उत्तर से दक्षिण तक इतने बड़े भौगोलिक विस्तार के कारण नागर शैली में भी क्षेत्रीय विविधता आई, जिसे शिल्पशास्त्री मुख्यतः तीन उप-शैलियों में बाँटते हैं: ओडिशा शैली — भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर और कोणार्क का सूर्य मंदिर इसके प्रमुख उदाहरण हैं; यहाँ शिखर को देउल कहा जाता है और रेखा-देउल का आकार विशेष रूप से सीधा-ऊँचा होता है। मध्य भारतीय (चंदेल) शैली — खजुराहो के मंदिर समूह इसकी पहचान हैं; यहाँ शिखर के साथ छोटे-छोटे उप-शिखर (उरुशृंग) जोड़कर एक पर्वत-श्रृंखला जैसा प्रभाव बनाया जाता है। पश्चिम भारतीय (सोलंकी) शैली — गुजरात का मोढेरा सूर्य मंदिर और राजस्थान के दिलवाड़ा जैन मंदिर इसके उदाहरण हैं; यहाँ बारीक नक्काशी और सभामंडप की भव्यता विशेष रूप से देखी जाती है। द्रविड़ शैली — दक्षिण भारत का प्रासाद स्थापत्य द्रविड़ शैली का संबंध मुख्यतः तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल के मंदिरों से है, हालाँकि इसके कुछ प्रारंभिक नमूने उत्तर और मध्य भारत में भी मिलते हैं — जैसे ऐहोल का लाडखान मंदिर। यह शैली पल्लव वंश (लगभग 7वीं शताब्दी) में उभरी और चोल, विजयनगर तथा नायक शासकों के समय अपने चरम पर पहुँची। द्रविड़ शैली की सबसे बड़ी पहचान इसका पिरामिडीय विमान है — गर्भगृह के ऊपर मंज़िल-दर-मंज़िल घटता हुआ ढाँचा, जो अंत में एक गुम्बदाकार स्तूपिका पर समाप्त होता है। समय के साथ इन मंज़िलों पर मूर्तियों और अलंकरण की मात्रा बढ़ती चली गई। द्रविड़ मंदिर की एक और खास पहचान है इसका गोपुरम — प्रवेश द्वार पर बना विशाल, बहुमंज़िला और अत्यंत अलंकृत टावर, जो कई बार मंदिर के मुख्य विमान से भी ऊँचा और अधिक भव्य बना दिया जाता है। द्रविड़ मंदिर परिसर चारदीवारी (प्राकार) से घिरा होता है, और बड़े मंदिरों में एक से अधिक संकेंद्रित प्राकार भी मिलते हैं। परिसर के भीतर स्तंभों पर टिके बड़े सभामंडप, गलियारे, मंदिर-तालाब (पुष्करिणी) और रथ-यात्रा हेतु चौड़ी सड़कें भी शामिल की जाती हैं। शिव मंदिरों में एक अलग नंदी मंडप और विष्णु मंदिरों में गरुड़ मंडप बनाने की परंपरा भी द्रविड़ शैली में विशेष रूप से देखी जाती है। बृहदेश्वर मंदिर, तंजावुर — चोल काल की द्रविड़ स्थापत्य-कला का शिखर, इसका विमान लगभग 66 मीटर ऊँचा है। मीनाक्षी मंदिर, मदुरै — नायक काल में बने भव्य, बहुरंगी गोपुरमों के लिए विश्वप्रसिद्ध। कैलासनाथ मंदिर, कांचीपुरम — पल्लव राजा राजसिंह और उनके पुत्र महेंद्र तृतीय द्वारा निर्मित, द्रविड़ शैली का प्रारंभिक उत्कृष्ट उदाहरण। शोर मंदिर, महाबलिपुरम — समुद्र-तट पर बना पल्लवकालीन मंदिर, प्रारंभिक द्रविड़ शैली की सादगी दर्शाता है। 🛕 अपने घर के मंदिर/पूजा घर का वास्तु जांचें बड़े प्रासाद निर्माण से पहले या घर के पूजा-स्थान की दिशा तय करने में सहायता चाहिए? विशेषज्ञ वास्तु सलाह पाएं। वास्तु परामर्श लें → वेसर शैली — नागर और द्रविड़ का सुंदर संगम वेसर शैली विंध्य पर्वत और कृष्णा नदी के बीच के मध्य-दक्कन क्षेत्र में विकसित हुई और पूर्व-मध्यकाल में इसका उदय माना जाता है। यह मूलतः एक मिश्रित शैली है जिसमें नागर और द्रविड़ — दोनों के लक्षण एक साथ दिखते हैं। कल्याणी के परवर्ती चालुक्यों और बाद में होयसल वंश द्वारा बनाए गए मंदिर इस शैली के सबसे प्रमुख उदाहरण हैं। वेसर मंदिरों में द्रविड़ शैली जैसे स्तरित विमान तो होते हैं, पर ये स्तर एक-दूसरे के अधिक निकट रखे जाते हैं, जिससे मंदिर की कुल ऊँचाई द्रविड़ मंदिरों की तुलना में कम रहती है और बनावट अधिक सुडौल दिखती है। कहीं-कहीं बौद्ध चैत्यों जैसी अर्धचंद्राकार

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⭐ पाठकों के अनुभव

AstroVgyaan पाठक क्या कहते हैं

★★★★★

"Ajit ji ke articles पढ़়कर पहली बार Jyotish समष् में आयी। Shani ki Dasha का विश्लेषण इतना सरल आर सटीक था कि मुष्े अपने जीवन की घटनाएं समष् में आइं।"

R
Rahul Sharma
📍 Delhi
★★★★★

"Vedic Jyotish ke baare mein itni gehri jaankari Hindi mein kahin nahi mili. Kundali ke 12 bhaavon ka explanation bahut clear tha."

P
Priya Gupta
📍 Lucknow
★★★★★

"Graha Dasha calculator bahut upyogi hai. Mujhe pata chala ki agle 3 saal mein kaun si Dasha chal rahi hai aur uska prabhav kya hoga."

A
Amit Tiwari
📍 Varanasi
★★★★★

"Ajit ji ka 6 saal ka anubhav saaf dikhta hai unke articles mein. Shani Mahadasha ke baare mein jo unhone likha, wo mere jeevan se bilkul match karta tha."

S
Sunita Devi
📍 Patna
★★★★★

"Nakshatra aur unke fal ke baare mein jo series hai wo adbhut hai. Mere Nakshatra Rohini ke baare mein jo likha, wo 100% sahi tha."

M
Manish Verma
📍 Jaipur
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