Jyotish Course

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अध्याय ३.६ — कन्या राशि | स्वभाव, ग्रह फल और सम्पूर्ण विश्लेषण | वैदिक ज्योतिष पाठ्यक्रम

राशि चक्र में सिंह के प्रताप और अहंकार के बाद कन्या राशि आती है — और एक विचित्र परिवर्तन होता है। जहाँ सिंह बड़े फैसले लेता है, वहाँ कन्या हर विवरण को परखती है। जहाँ सिंह प्रशंसा चाहता है, वहाँ कन्या पूर्णता चाहती है। पाँच वर्षों के परामर्श में कन्या राशि के जातक मुझे सबसे अधिक आत्म-आलोचक मिले हैं। ये जातक दूसरों की भूलें देखने से पहले स्वयं की भूलें देखते हैं — यह इनकी सबसे बड़ी शक्ति भी है और सबसे बड़ी कमजोरी भी। एक कन्या लग्न के जातक का उदाहरण देता हूँ — वे एक CA थे। उनकी कार्यकुशलता असाधारण थी — एक भी संख्या में गलती नहीं होती थी। परन्तु रात को नींद नहीं आती थी — मन में यह चलता रहता था कि “क्या कोई चीज छूट गई?” यह कन्या राशि का सबसे विशिष्ट लक्षण है — पूर्णता की तलाश जो कभी समाप्त नहीं होती। शास्त्र में कन्या राशि का स्वरूप “कन्या द्विस्वभावराशिः पृथ्वीतत्त्वा च शुभा स्मृता। नावायां वसती कन्या पुस्तकहस्ता विचक्षणा॥” बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, राशि स्वभावाध्याय अर्थात् — कन्या राशि द्विस्वभाव और पृथ्वी तत्त्व की है, शुभ राशि है। कन्या नाव में बैठी है, हाथ में पुस्तक लिए और विचक्षण (अत्यन्त बुद्धिमान) है। यह वर्णन कन्या राशि के स्वभाव को पूर्णतः प्रकट करता है — ज्ञान की तलाश में सदा गतिशील, हाथ में ज्ञान का उपकरण और बुद्धि से सब कुछ परखने वाली। “कन्यालग्ने जातो विद्वान् सेवाकुशलः धनी। व्यवहारकुशलो नित्यं स्वास्थ्यचिन्तापरो भवेत्॥” जातक परिजात, लग्नाध्याय जातक परिजात के अनुसार कन्या लग्न में जन्मा जातक विद्वान, सेवा में कुशल, धनवान और व्यवहार में चतुर होता है — तथा सदा स्वास्थ्य की चिन्ता करता रहता है। कन्या राशि का मूलभूत स्वरूप कन्या राशि पृथ्वी तत्त्व की द्विस्वभाव राशि है। पृथ्वी — व्यावहारिकता, स्थिरता और पोषण का प्रतीक। द्विस्वभाव — दो विपरीत गुणों का समन्वय, अर्थात् एक साथ आदर्शवादी भी और व्यावहारिक भी। कन्या राशि के स्वामी बुध हैं — बुद्धि, विश्लेषण और सेवा के कारक। बुध की स्वराशि और उच्च राशि दोनों कन्या ही है — इसलिए यहाँ बुध के गुण अपने सर्वोच्च रूप में होते हैं। कन्या राशि शुक्र की नीच राशि है — यह ध्यान देने योग्य तथ्य है। कन्या की विश्लेषणात्मकता और आलोचनात्मकता शुक्र के सौन्दर्य और भावुकता को कुचल देती है। इसीलिए कन्या राशि के जातक प्रेम में भावनाओं से अधिक तर्क से काम लेते हैं। कन्या राशि के जातकों का स्वभाव कन्या राशि के जातकों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी विश्लेषणात्मक बुद्धि है। ये जातक किसी भी समस्या को उसके सूक्ष्मतम विवरण तक तोड़कर देखते हैं। गलतियाँ पकड़ने में ये असाधारण होते हैं — और इसीलिए उत्कृष्ट लेखापाल, वकील, चिकित्सक और शोधकर्ता बनते हैं। सेवा भाव इनका एक और प्रमुख गुण है — ये जातक दूसरों की सहायता में स्वाभाविक रूप से आगे आते हैं। परन्तु कन्या राशि की कमजोरियाँ भी उतनी ही विशिष्ट हैं। अत्यधिक आलोचना — ये जातक दूसरों की भूलें बहुत जल्दी देख लेते हैं और बता भी देते हैं, जो सम्बन्धों में कठिनाई पैदा करता है। चिन्ता — इन जातकों का मन हमेशा किसी न किसी बात की चिन्ता में रहता है। पूर्णतावाद — इनके लिए “काफी अच्छा” कभी काफी नहीं होता, जिससे ये कभी-कभी समय पर निर्णय नहीं ले पाते। कन्या राशि में सभी ग्रह — विस्तृत फल कन्या में सूर्य: सूर्य यहाँ मित्र राशि में है। नेतृत्व विश्लेषण और सेवा के माध्यम से। सरकारी सेवा में विशेष सफलता। पिता विद्वान और सेवाभावी। स्वास्थ्य के प्रति सचेत। कन्या में चन्द्र: चन्द्र यहाँ शत्रु राशि में है। मन में अनावश्यक चिन्ता और विश्लेषण। भावनाओं को तर्क से समझने का प्रयास। परन्तु माता के साथ सम्बन्ध गहरा और व्यावहारिक। कन्या में मंगल: मंगल यहाँ शत्रु राशि में है। ऊर्जा बिखरी हुई होती है — एक काम से दूसरे काम पर। परन्तु विवरण में ध्यान देने की क्षमता से काम सटीक होता है। स्वास्थ्य सेवा में मंगल की ऊर्जा अच्छी काम आती है। कन्या में बुध: स्वगृह और उच्च — बुध अपने सर्वोत्तम रूप में। विश्लेषण, लेखन, संचार और व्यापार में असाधारण क्षमता। बहुभाषी। शोध और तकनीक में विशेष प्रतिभा। कन्या में गुरु: गुरु यहाँ शत्रु राशि में है। ज्ञान व्यावहारिक और सूक्ष्म होता है परन्तु आध्यात्मिक गहराई कम। सेवा क्षेत्र में ज्ञान का उपयोग। विवाह में विलम्ब हो सकता है। कन्या में शुक्र: नीच का शुक्र — प्रेम में तर्क अधिक, भावना कम। सौन्दर्य में रुचि परन्तु आलोचनात्मक दृष्टि। वैवाहिक जीवन में आलोचना से बचना आवश्यक। नीचभंग के संयोग से शुभ फल सम्भव। कन्या में शनि: शनि यहाँ मित्र राशि में है। अनुशासन और विश्लेषण का अद्भुत संयोग — शोध, लेखापरीक्षण और तकनीकी कार्यों में असाधारण सफलता। करियर में धीरे परन्तु निश्चित प्रगति। कन्या में राहु: राहु यहाँ तकनीक और विश्लेषण में असाधारण महत्त्वाकांक्षा देता है। IT, data science और research में विशेष सफलता। परन्तु मन में अत्यधिक चिन्ता। कन्या में केतु: केतु यहाँ पूर्वजन्म की सेवा और ज्ञान का संकेत देता है। आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा में रुचि। परन्तु विवरण में अत्यधिक उलझने की प्रवृत्ति। कन्या लग्न — बारह भावों का विस्तृत विश्लेषण प्रथम भाव — कन्या (बुध स्वामी): कन्या लग्न के जातक पतले, मध्यम कद के और बुद्धिमान दिखते हैं। आँखें चमकदार और अभिव्यक्तिशील। हाथ की उँगलियाँ लम्बी। स्वभाव में विनम्रता और सेवाभाव। द्वितीय भाव — तुला (शुक्र स्वामी): धन भाव का स्वामी शुक्र — धन कला, व्यापार और सौन्दर्य उद्योग से। वाणी मधुर और प्रभावशाली। परिवार में सौन्दर्यप्रिय वातावरण। तृतीय भाव — वृश्चिक (मंगल स्वामी): पराक्रम भाव का स्वामी मंगल — साहस गहरा और रहस्यमय। लेखन में तीव्रता और गहराई। छोटे भाई-बहनों से जटिल सम्बन्ध। चतुर्थ भाव — धनु (गुरु स्वामी): गृह भाव का स्वामी गुरु — घर में धार्मिक और ज्ञानमय वातावरण। माता विद्वान। भूमि और सम्पत्ति का सुख। गृह जीवन में विस्तार। पञ्चम भाव — मकर (शनि स्वामी): बुद्धि भाव का स्वामी शनि — बुद्धि अनुशासित और दीर्घकालिक सोच वाली। सन्तान में विलम्ब हो सकता है। प्रेम में गम्भीरता। षष्ठ भाव — कुम्भ (शनि स्वामी): शत्रु भाव का स्वामी शनि — शत्रु धीरे-धीरे परन्तु दीर्घकाल तक परेशान कर सकते हैं। स्वास्थ्य में नसों और पाचन पर ध्यान। सप्तम भाव — मीन (गुरु स्वामी): विवाह भाव का स्वामी गुरु — जीवनसाथी विद्वान, धार्मिक

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अध्याय ३.५ — सिंह राशि | स्वभाव, ग्रह फल और सम्पूर्ण विश्लेषण | वैदिक ज्योतिष पाठ्यक्रम

सिंह राशि — नवग्रहों के राजा सूर्य की एकमात्र राशि। पाँच वर्षों के ज्योतिष परामर्श में सिंह लग्न के जातकों में मैंने एक बात हमेशा देखी है — इनकी उपस्थिति में कमरे का वातावरण स्वतः बदल जाता है। जैसे सिंह जंगल का राजा होता है, वैसे ही सिंह लग्न के जातक अपने समूह के स्वाभाविक नेता होते हैं। इन्हें किसी ने नेता नहीं बनाया — ये स्वतः ही नेता होते हैं। एक सिंह लग्न के जातक का स्मरण होता है — वे एक सामान्य परिवार से थे, परन्तु जब भी किसी सभा में जाते, लोग उनकी बात सुनते। उनकी आवाज में एक ऐसा प्रभाव था जो बिना किसी प्रयास के आता था। यह सूर्य की शक्ति है — जब सूर्य अपनी ही राशि में हो, तो उसका प्रकाश स्वाभाविक रूप से फैलता है। शास्त्र में सिंह राशि का स्वरूप “सिंहः क्षत्रियजातिश्च वनचारी महाबलः। पित्तप्रकृतिरुच्यते स्थिरराशिः पुमान् स्मृतः॥” बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, राशि स्वभावाध्याय अर्थात् — सिंह राशि क्षत्रिय जाति की है, वन में विचरण करने वाली है, महाबली है, पित्त प्रकृति की है, स्थिर राशि है और पुरुष संज्ञा की है। वराहमिहिर ने बृहज्जातक में सिंह राशि के विषय में कहा है — “सिंहे जातो राजप्रियः यशस्वी” — सिंह राशि में जन्मा जातक राजा का प्रिय और यशस्वी होता है। “सिंहलग्ने जातो राजसेवी धनवान् प्रतापी। स्वाभिमानी सत्यवादी शूरः सर्वत्र पूज्यते॥” जातक परिजात, लग्नाध्याय जातक परिजात के अनुसार सिंह लग्न में जन्मा जातक राजसेवी, धनवान, प्रतापी, स्वाभिमानी, सत्यवादी और शूर होता है — सर्वत्र उसका सम्मान होता है। सिंह राशि का मूलभूत स्वरूप सिंह राशि अग्नि तत्त्व की स्थिर राशि है। अग्नि — ऊर्जा, प्रकाश, नेतृत्व और उत्साह का प्रतीक। स्थिर — जो एक बार ठान ले वह करके रहे, जो एक बार लक्ष्य तय करे उससे न हटे। इन दोनों का संयोग सिंह राशि को एक ऐसी राशि बनाता है जो अपने उद्देश्य में अटल और अपनी ऊर्जा में प्रज्वलित रहती है। सिंह राशि के स्वामी सूर्य हैं — आत्मा, नेतृत्व और राजसत्ता के कारक। सूर्य की स्वराशि होने के कारण यहाँ सूर्य के सभी गुण — आत्मविश्वास, नेतृत्व, उदारता और तेज — अपने शुद्धतम रूप में प्रकट होते हैं। सिंह राशि में शनि नीच के होते हैं — सूर्य और शनि का परस्पर विरोध यहाँ सबसे स्पष्ट रूप से दिखता है। शनि की विनम्रता और धीमापन सिंह के प्रताप और गति के साथ नहीं चलता। सिंह राशि के जातकों का स्वभाव सिंह राशि के जातकों की सबसे बड़ी शक्ति उनका आत्मविश्वास है। ये जातक जो सोचते हैं वह कर सकते हैं — यह विश्वास इनके भीतर गहराई से होता है। इनकी उदारता असाधारण होती है — ये जातक देने में विश्वास रखते हैं। एक सच्चा सिंह जातक कभी किसी को खाली हाथ नहीं जाने देता। परन्तु सिंह राशि की कमजोरियाँ भी उतनी ही स्पष्ट हैं। सबसे बड़ी कमजोरी है — अहंकार। ये जातक आलोचना सहन नहीं कर पाते। जब कोई इनकी गलती बताए तो ये बचाव में आ जाते हैं। दूसरी कमजोरी — प्रशंसा की आवश्यकता। इन्हें सराहना चाहिए — यदि नहीं मिली तो ये अन्दर से टूट जाते हैं परन्तु बाहर दिखाते नहीं। तीसरी — शासन करने की इच्छा। ये जातक हर जगह नेतृत्व चाहते हैं — जब यह नहीं मिलता तो असन्तुष्ट हो जाते हैं। सिंह राशि में सभी ग्रह — विस्तृत फल सिंह में सूर्य: स्वगृह — सूर्य अपनी राशि में। आत्मविश्वास, नेतृत्व और प्रताप अपने उत्कृष्ट रूप में। सरकारी सेवा और राजनीति में असाधारण सफलता। पिता का प्रभाव जीवन पर गहरा। स्वास्थ्य अच्छा रहता है। सिंह में चन्द्र: चन्द्र यहाँ शत्रु राशि में है। मन और भावनाएँ अहंकार से संघर्ष करती हैं। परन्तु सामाजिक जीवन में लोकप्रियता। माता प्रतापी होती हैं। मन में उतार-चढ़ाव परन्तु दिखाते नहीं। सिंह में मंगल: मंगल यहाँ मित्र राशि में है और अत्यन्त शुभ होता है। साहस और नेतृत्व का असाधारण संयोग। सेना, प्रशासन और खेल में विशेष सफलता। ऐसे जातक जो काम हाथ में लेते हैं उसे पूरा करके छोड़ते हैं। सिंह में बुध: बुध यहाँ शत्रु राशि में है। बुद्धि की चतुरता अहंकार से कभी-कभी अवरुद्ध हो जाती है। परन्तु वाणी में एक अधिकारपूर्ण प्रभाव होता है। नेतृत्वकारी लेखन और भाषण में सफलता। सिंह में गुरु: गुरु यहाँ मित्र राशि में है। ज्ञान और नेतृत्व का असाधारण संयोग — ये जातक विद्वान नेता बनते हैं। धर्म और शिक्षा में उच्च पद। सन्तान प्रतापी। भाग्य अनुकूल। सिंह में शुक्र: शुक्र यहाँ शत्रु राशि में है। प्रेम में अहंकार — ये जातक प्रेम में भी नेता बनना चाहते हैं। कला में रुचि परन्तु सुक्ष्म भावों की कमी। विवाह में अहंकार के टकराव की सम्भावना। सिंह में शनि: नीच का शनि — यहाँ सूर्य-शनि का सर्वाधिक स्पष्ट विरोध। जीवन में अनुशासन बनाए रखना कठिन। करियर में बाधाएँ। परन्तु नीचभंग के संयोग से यह नीच शनि असाधारण राजयोग दे सकता है। सिंह में राहु: राहु यहाँ नेतृत्व में असाधारण महत्त्वाकांक्षा देता है। मीडिया, राजनीति और मनोरंजन में सफलता के योग। परन्तु अहंकार और भ्रम से सावधानी। सिंह में केतु: केतु यहाँ नेतृत्व के प्रति वैराग्य देता है। पूर्वजन्म में राजसत्ता के अनुभव का संकेत। आध्यात्मिक नेतृत्व में रुचि। सिंह लग्न — बारह भावों का विस्तृत विश्लेषण प्रथम भाव — सिंह (सूर्य स्वामी): सिंह लग्न के जातक शारीरिक रूप से आकर्षक, मजबूत और तेजस्वी होते हैं। चाल में एक राजसी भाव होता है। बाल घने और केश में विशेष ध्यान देते हैं। स्वभाव में गर्व और आत्मसम्मान। द्वितीय भाव — कन्या (बुध स्वामी): धन भाव का स्वामी बुध — धन बुद्धि और व्यापार से आता है। वाणी में विश्लेषणात्मक क्षमता। परिवार में व्यावसायिक वातावरण। तृतीय भाव — तुला (शुक्र स्वामी): पराक्रम भाव का स्वामी शुक्र — साहस में कला और कूटनीति। लेखन और कला में रुचि। छोटे भाई-बहनों से प्रेमपूर्ण सम्बन्ध। चतुर्थ भाव — वृश्चिक (मंगल स्वामी): गृह भाव का स्वामी मंगल — घर में ऊर्जा और कभी-कभी तनाव। माता साहसी और दृढ़। सम्पत्ति के विषय में संघर्ष हो सकता है। परन्तु भूमि का लाभ होता है। पञ्चम भाव — धनु (गुरु स्वामी): बुद्धि भाव का स्वामी गुरु — असाधारण बुद्धि और दार्शनिक सोच। सन्तान विद्वान और धार्मिक। राजनीति और नेतृत्व में सफलता। षष्ठ भाव — मकर (शनि स्वामी): शत्रु भाव का

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अध्याय ३.४ — कर्क राशि | स्वभाव, ग्रह फल और सम्पूर्ण विश्लेषण | वैदिक ज्योतिष पाठ्यक्रम

वैदिक ज्योतिष में कर्क राशि वह राशि है जो हृदय को सबसे गहरे तक छूती है। पाँच वर्षों के ज्योतिष परामर्श में कर्क लग्न या कर्क राशि के जातकों में मैंने एक विशेषता हमेशा देखी है — ये जातक जिससे प्रेम करते हैं उसके लिए सब कुछ कर सकते हैं। माँ के प्रेम जैसी भावना इनके भीतर होती है — पोषण करने की, सुरक्षित करने की, घर बनाने की। परन्तु जब इनका विश्वास टूटता है तो ये बहुत लम्बे समय तक उस दर्द को भीतर रखते हैं — बाहर नहीं आने देते। एक कर्क लग्न की महिला जातक का स्मरण होता है जो अपने परिवार के लिए सब कुछ करती थीं — बच्चों के लिए, पति के लिए, सास-ससुर के लिए। परन्तु स्वयं के लिए कुछ नहीं माँगती थीं। जब कुण्डली देखी तो पाया — लग्नेश चन्द्रमा द्वादश भाव में था और शनि से दृष्ट था। यह आत्म-विस्मरण का योग था। जब उन्हें समझाया गया कि अपनी देखभाल करना भी धर्म है, तब उनके जीवन में सन्तुलन आया। शास्त्र में कर्क राशि का स्वरूप “कर्कटो जलचारी स्यात् श्वेतवर्णः कफात्मकः। चरराशिः स्त्रीसंज्ञश्च ब्राह्मणजातिरुच्यते॥” बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, राशि स्वभावाध्याय अर्थात् — कर्क राशि जल में विचरण करने वाली है, श्वेत वर्ण की है, कफ प्रकृति की है, चर स्वभाव की है, स्त्री संज्ञा की है और ब्राह्मण जाति की मानी गई है। वराहमिहिर ने बृहज्जातक में कर्क के विषय में कहा है — “कर्कटे जलचरो जातो धनधान्यसमृद्धः” — कर्क राशि में जन्मा जातक धन और धान्य से समृद्ध होता है। “कर्कलग्ने जातस्य माताभक्तिः धनागमः। जलसम्बन्धी व्यवसायः सुखी गृहे सदा भवेत्॥” जातक परिजात, लग्नाध्याय जातक परिजात के अनुसार कर्क लग्न में जन्मे जातक की माता के प्रति भक्ति होती है, धन का आगमन होता है, जल से सम्बन्धित व्यवसाय शुभ होता है और घर में सुख रहता है। कर्क राशि का मूलभूत स्वरूप कर्क राशि जल तत्त्व की चर राशि है। जल — भावनाओं, करुणा, गहराई और पोषण का प्रतीक। चर — गतिशील, परिवर्तनशील, नई परिस्थितियों में ढल जाने वाला। इन दोनों का संयोग कर्क राशि को एक ऐसी राशि बनाता है जो भीतर से अत्यन्त गहरी परन्तु बाहर से अत्यन्त अनुकूलनशील है। कर्क राशि के स्वामी चन्द्रमा हैं — मन, माता और भावनाओं के कारक। चन्द्रमा की स्वराशि होने के कारण यहाँ भावनाएँ अपने स्वाभाविक और शुद्धतम रूप में प्रकट होती हैं। कर्क राशि का प्रतीक केकड़ा है — जिसका कठोर बाहरी आवरण उसकी कोमल आन्तरिक सत्ता की रक्षा करता है। यही कर्क जातकों का स्वभाव है — बाहर से कठोर या उदासीन दिखते हैं, परन्तु भीतर से अत्यन्त संवेदनशील होते हैं। कर्क राशि में गुरु उच्च के होते हैं — यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। जब गुरु का ज्ञान और विस्तार कर्क की करुणा और भावनात्मक गहराई से मिलता है, तो यह संयोग असाधारण ज्ञान और आध्यात्मिकता देता है। कर्क राशि में मंगल नीच के होते हैं — मंगल का आक्रामक और तात्कालिक स्वभाव यहाँ भावनाओं में उलझ जाता है। कर्क राशि के जातकों का स्वभाव कर्क राशि के जातकों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी सहानुभूति और करुणा है। ये जातक दूसरों का दर्द महसूस कर सकते हैं — यह एक दुर्लभ क्षमता है। इसीलिए ये उत्कृष्ट देखभालकर्ता, माता-पिता, शिक्षक और चिकित्सक बनते हैं। घर और परिवार इनके लिए केवल रहने का स्थान नहीं — यह इनकी आत्मा का आधार है। परन्तु कर्क राशि की कमजोरियाँ भी उतनी ही स्पष्ट हैं। अत्यधिक भावुकता — ये जातक कभी-कभी भावनाओं में इतने डूब जाते हैं कि तर्क काम नहीं करता। अतीत से चिपकना — जो हो गया उसे भूल नहीं पाते। चन्द्रमा के घटने-बढ़ने की तरह इनका मन भी उतार-चढ़ाव में रहता है — एक दिन बहुत प्रसन्न, दूसरे दिन बहुत उदास। और सबसे बड़ी कमजोरी — दूसरों पर निर्भरता। ये जातक अकेले नहीं रह सकते — इन्हें सदा किसी अपने का सहारा चाहिए। कर्क राशि में सभी ग्रह — विस्तृत फल कर्क में सूर्य: सूर्य यहाँ मित्र राशि में है। नेतृत्व भावनाओं से प्रेरित होता है — ये जातक लोगों के हृदय को जीतकर नेतृत्व करते हैं। माता और पिता दोनों का प्रभाव जीवन पर गहरा होता है। सरकारी और सामाजिक कार्यों में सफलता। कर्क में चन्द्र: स्वगृह — चन्द्रमा अपनी राशि में। भावनाएँ स्वाभाविक और शुद्ध रूप में प्रकट होती हैं। माता से असाधारण प्रेम। मन सुखी और सन्तुष्ट। लोकप्रियता और सामाजिक सुख अधिक होता है। यदि शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा हो तो और भी शुभ। कर्क में मंगल: नीच का मंगल — कठिन स्थिति। साहस और ऊर्जा भावनाओं में उलझ जाती है। क्रोध और फिर पश्चाताप का चक्र। परन्तु नीचभंग के संयोग — गुरु या शनि की युति या दृष्टि — इसे शुभ बना सकते हैं। माता के स्वास्थ्य पर ध्यान आवश्यक है। कर्क में बुध: बुध यहाँ शत्रु राशि में है। बुद्धि भावनाओं से प्रभावित होती है — तर्क और भावना में टकराव। परन्तु भावनात्मक बुद्धि (emotional intelligence) असाधारण होती है। लेखन में भावनात्मक गहराई और काव्यात्मकता। कर्क में गुरु: उच्च का गुरु — सर्वोत्तम। ज्ञान करुणा और भावना से युक्त हो जाता है। ऐसे जातक असाधारण गुरु, शिक्षक और मार्गदर्शक बनते हैं। धन, सन्तान और धर्म — सब शुभ। पाँच वर्षों के अनुभव में मैंने देखा है कि कर्क राशि में उच्च गुरु वाले जातकों का जीवन सदा एक दिव्य सुरक्षा में रहता है। कर्क में शुक्र: शुक्र यहाँ मित्र राशि में है। प्रेम गहरा और समर्पित होता है। घर को सुन्दर और आरामदायक बनाने की प्रवृत्ति। कला और संगीत में गहरी रुचि। वैवाहिक जीवन सुखी। कर्क में शनि: शनि यहाँ शत्रु राशि में है। मन में अवसाद और चिन्ता की प्रवृत्ति। माता के साथ सम्बन्ध में जटिलता। परन्तु यदि शनि बलवान हो तो जीवन में कठिनाइयों से सीखकर असाधारण परिपक्वता आती है। कर्क में राहु: राहु यहाँ मन में भ्रम और भावनात्मक उथल-पुथल देता है। माता के साथ सम्बन्ध में रहस्य हो सकता है। परन्तु रहस्यमय और तकनीकी क्षेत्रों में सफलता के योग बनते हैं। कर्क में केतु: केतु यहाँ पूर्वजन्म की भावनात्मक गहराई का संकेत देता है। ये जातक आध्यात्मिक रूप से अत्यन्त संवेदनशील होते हैं। माता के साथ कर्मिक सम्बन्ध होता है। कर्क लग्न — बारह भावों का विस्तृत विश्लेषण प्रथम भाव — कर्क

अध्याय ३.४ — कर्क राशि | स्वभाव, ग्रह फल और सम्पूर्ण विश्लेषण | वैदिक ज्योतिष पाठ्यक्रम Read Post »