
मॉड्यूल १ के पांचों अध्यायों में हमने वास्तु शास्त्र की परिभाषा, परंपरा, पौराणिक कथा, पंचभूत और दिशाओं को समझा। लेकिन एक सवाल अब तक अनुत्तरित है — यह सारा ज्ञान आया कहां से? किन किताबों में यह लिखा है, और इस कोर्स के हर दावे का स्रोत क्या है? इसी सवाल का जवाब इस आखिरी अध्याय में है — मॉड्यूल १ का समापन, दो ग्रंथों के परिचय के साथ।
📋 इस अध्याय में क्या सीखेंगे
- विश्वकर्मप्रकाशः — नागर परंपरा का प्रामाणिक ग्रंथ
- मयमतम् — द्रविड़ परंपरा का मानक ग्रंथ
- दोनों ग्रंथों का साझा सन्दर्भ — मत्स्य पुराण की परंपरा
- इस कोर्स में इन ग्रंथों का उपयोग कैसे होगा
📖 विश्वकर्मप्रकाशः — नागर परंपरा का प्रामाणिक ग्रंथ
विश्वकर्मप्रकाशः (वास्तुशास्त्रम्) — यह ग्रंथ नागर वास्तु परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। इसका सम्पादन एवं हिन्दी टीका महर्षि अभय कात्यायन द्वारा की गई है, और यह चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी से प्रकाशित है। यह ग्रंथ १४ अध्यायों में विभाजित है, और लगभग ३०० पृष्ठों में फैला हुआ है।
इसमें भूमि-चयन और परीक्षा, मुहूर्त-निर्णय, निर्माण-सामग्री, नींव एवं शिलान्यास संस्कार (८१ पद वास्तु सहित), मंदिर एवं राजप्रासाद निर्माण, द्वार-नियम, जलाशय-निर्माण, वृक्ष-छेदन के नियम, गृह-प्रवेश विधि, और दुर्ग-निर्माण जैसे विषय गहराई से समझाए गए हैं। इसके अतिरिक्त इसमें दो विशेष अध्याय भी हैं — शल्य-निर्णय और वेध-निर्णय — जो भवन-दोष विश्लेषण पर केंद्रित हैं। इस कोर्स के मॉड्यूल ४ (गृह निर्माण) और मॉड्यूल ६ (गृह प्रवेश) का बड़ा हिस्सा इसी ग्रंथ पर आधारित होगा।
📚 मयमतम् — द्रविड़ परंपरा का मानक ग्रंथ
मयमतम् द्रविड़ वास्तु परंपरा का मानक ग्रंथ है, जिसके रचयिता पारंपरिक रूप से दानवराज मय माने जाते हैं। इस कोर्स में जिस संस्करण का अध्ययन किया गया है, उसमें हिन्दी व्याख्या (“शिवार्पिता”) डॉ. (श्रीमती) शैलजा पाण्डेय द्वारा की गई है, और यह भी चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन से प्रकाशित है। यह ग्रंथ मूलतः दो भागों में उपलब्ध है — इस कोर्स में भाग-१ का अध्ययन किया गया है, जिसमें २५ अध्याय हैं।
भाग-१ में भूमि-परीक्षा, चार प्रकार के शिल्पी-वर्गीकरण, शंकु (सूर्य-छाया) से दिशा-निर्धारण की विधि, वास्तु पुरुष मंडल के पद-सिद्धांत, ग्राम-नगर नियोजन, नींव-निक्षेप संस्कार से लेकर मंदिर-स्थापत्य — स्तंभ, प्रस्तर-रचना, शिखर-प्रकार, एक से बहु-भूमि विमान संरचना, प्राकार (चारदीवारी), और गोपुरम् निर्माण — तक विस्तृत मार्गदर्शन मिलता है। इस कोर्स के मॉड्यूल ७ (मंदिर एवं प्रासाद वास्तु) और मॉड्यूल ८ (नगर एवं ग्राम वास्तु) मुख्यतः इसी ग्रंथ पर आधारित होंगे।
🤝 दोनों ग्रंथों का साझा सन्दर्भ — मत्स्य पुराण की परंपरा
दिलचस्प बात यह है कि दोनों ग्रंथ एक साझा पौराणिक सन्दर्भ से जुड़े हैं। मत्स्य पुराण में शिल्प-शास्त्र के अठारह आचार्यों की एक सूची मिलती है, जिसमें विश्वकर्मा और मय दोनों का नाम शामिल है। यानी यह दोनों परंपराएं प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि एक ही व्यापक शिल्प-शास्त्र परंपरा की दो शाखाएं हैं — जिन्हें हमने अध्याय १.२ में विस्तार से समझा था।
📌 इस कोर्स में इन ग्रंथों का उपयोग कैसे होगा
आगे के हर मॉड्यूल में जहां भी कोई विशेष नियम या तकनीक बताई जाएगी, वहां हम यथासंभव यह स्पष्ट करेंगे कि वह किस ग्रंथ और किस परंपरा से आ रही है — ताकि आप सिर्फ नियम न रटें, बल्कि उसका शास्त्रीय आधार भी समझें। यही पारदर्शिता इस कोर्स को बाकी वास्तु कोर्सों से अलग बनाती है। पूरे कोर्स का मॉड्यूल-वार रोडमैप यहां देखें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. क्या यह ग्रंथ आम पाठक के लिए उपलब्ध हैं?
हां, दोनों ग्रंथ हिन्दी टीका सहित चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन से प्रकाशित और उपलब्ध हैं।
2. क्या मयमतम् का भाग-२ भी इस कोर्स में शामिल होगा?
इस कोर्स की मुख्य नींव भाग-१ पर है, जो मंदिर-स्थापत्य और घरेलू वास्तु के लिए पर्याप्त है। ज़रूरत पड़ने पर आगे के मॉड्यूल में भाग-२ के सन्दर्भ भी जोड़े जा सकते हैं।
3. क्या इन दोनों ग्रंथों के अलावा और भी वास्तु ग्रंथ हैं?
हां, मानसार, बृहत्संहिता (वास्तु अध्याय), समरांगण सूत्रधार जैसे कई अन्य ग्रंथ भी हैं। लेकिन विश्वकर्मप्रकाश और मयमतम् दोनों परंपराओं (नागर-द्रविड़) का सबसे व्यापक, संतुलित प्रतिनिधित्व करते हैं — इसीलिए इन्हें इस कोर्स की नींव बनाया गया।
4. मॉड्यूल १ पूरा होने के बाद आगे क्या है?
अगला मॉड्यूल है — भूमि परीक्षा एवं चयन, जहां हम प्लॉट खरीदने से पहले की शास्त्रीय जांच-प्रक्रिया सीखेंगे।
🎉 मॉड्यूल १ पूर्ण हुआ! बधाई हो — आपने वास्तु शास्त्र की पूरी नींव सीख ली है। अगला मॉड्यूल जल्द प्रकाशित होगा: मॉड्यूल २ — भूमि परीक्षा एवं चयन।
📌 अपने घर का व्यक्तिगत वास्तु-विश्लेषण चाहिए? अजित सर से मिलें | पिछला अध्याय: १.५ — अष्ट दिशाएं एवं ग्रह-देवता | पूरा कोर्स: वास्तु शास्त्र कोर्स इंडेक्स

