
“घर बनाते समय कौन-सी चीज़ किस दिशा में रखें?” — सीधा नियम यह है: उत्तर-पूर्व (ईशान) को हल्का, खुला और पवित्र रखें; दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) को भारी, ऊँचा और बंद रखें; रसोई और बिजली के उपकरण दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) में, और शौचालय, सेप्टिक टैंक जैसी “निकासी” वाली चीज़ें उत्तर-पश्चिम (वायव्य) या पश्चिम की ओर। बाकी सब इसी एक सूत्र से निकलता है।
ज़्यादातर जगहों पर वास्तु का लेख एक-एक कमरे पर रुक जाता है — कहीं केवल रसोई, कहीं केवल मुख्य द्वार। पर घर बनाने वाले के सामने सवाल अलग होता है: पूरा नक्शा एक साथ कैसे बैठे, जब ईशान एक ही है और माँगने वाली चीज़ें चार हैं? इस लेख में गेट से लेकर सेप्टिक टैंक तक, बोरवेल से लेकर बिस्तर के सिरहाने तक हर चीज़ की दिशा एक जगह मिलेगी — और यह भी कि जब नियम आपस में टकराएँ तो पहले क्या चुनें।
मेरे वर्षों के स्वतंत्र अध्ययन में मैंने बार-बार यही देखा है कि लोग नक्शा बनवाने और नींव डलवाने के बाद वास्तु पूछते हैं, जब दीवारें खड़ी हो चुकी होती हैं। वास्तु का असली फ़ायदा तब है जब आप इसे कागज़ पर रहते हुए लागू करें — क्योंकि तब बदलाव में न तोड़फोड़ लगती है, न पैसा। इसलिए यह लेख उसी क्रम में चलता है जिस क्रम में घर बनता है।
वास्तु के अनुसार घर कैसे बनाएं: आठ दिशाएँ और केंद्र एक नज़र में
किसी भी भवन को देखने से पहले आठ दिशाओं और केंद्र का स्वभाव समझ लें। पारंपरिक वास्तु में हर दिशा का एक स्वामी माना गया है, और उसी से तय होता है कि वहाँ कौन-सा काम शुभ बैठता है। विस्तार से इसे हमारे मुफ़्त पाठ्यक्रम के अध्याय “अष्ट दिशाओं का महत्व एवं उनके स्वामी ग्रह-देवता” में पढ़ सकते हैं।
| दिशा | स्वामी देवता | स्वभाव | घर में सबसे उपयुक्त |
|---|---|---|---|
| पूर्व | इंद्र (सूर्य का क्षेत्र) | सुबह की रोशनी, ऊर्जा, शुरुआत | बैठक, पूजा, खुली जगह, बड़ी खिड़कियाँ, मुख्य द्वार |
| आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) | अग्नि | ताप, ऊर्जा, गति | रसोई, बिजली का मीटर, इन्वर्टर, जनरेटर |
| दक्षिण | यम | भारी, स्थिर, गर्म | शयनकक्ष, भंडार, ऊँची दीवारें |
| नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) | निऋति | सबसे भारी और स्थिर | मास्टर बेडरूम, तिजोरी, भारी भंडार, ओवरहेड टंकी |
| पश्चिम | वरुण | ठहराव, संतुलन | भोजन कक्ष, बच्चों/अध्ययन का कमरा, सीढ़ी |
| वायव्य (उत्तर-पश्चिम) | वायु | चलायमान, बदलता रहने वाला | अतिथि कक्ष, गैराज, शौचालय, सेप्टिक टैंक |
| उत्तर | कुबेर | शीतल, धन और अवसर की दिशा | बैठक, खुली जगह, मुख्य द्वार, तिजोरी का मुख |
| ईशान (उत्तर-पूर्व) | ईश (शिव) | सबसे पवित्र, हल्का, जल से जुड़ा | पूजा घर, बोरवेल/भूमिगत सम्प, खुली जगह |
| केंद्र (ब्रह्मस्थान) | ब्रह्मा | खुला और खाली रहने वाला हृदय | आँगन या खाली हॉल; कोई भारी निर्माण नहीं |
भूखंड से शुरुआत: आकृति, ढलान, चारदीवारी और बाहरी गेट
दिशाओं की बात कमरे से पहले ज़मीन से शुरू होती है। भूखंड वर्गाकार या आयताकार हो तो सबसे अच्छा माना जाता है, और कटे-फटे कोनों वाली ज़मीन में पहले यह देखें कि ईशान का कोना कटा न हो। ज़मीन की आकृति और शुभ-अशुभ लक्षणों पर हमारे पाठ्यक्रम में अलग से विस्तार है — भूमि की आकृति और उसका फल पढ़ें।
- ढलान: पारंपरिक सलाह यह है कि ज़मीन उत्तर और पूर्व की ओर थोड़ी नीची और दक्षिण-पश्चिम की ओर ऊँची रहे। इससे बरसात का पानी ईशान की ओर बहकर निकलता है और भारी हिस्सा नैऋत्य में स्थिर रहता है। यह व्यावहारिक रूप से भी ठीक बैठता है, क्योंकि पानी का निकास तय रहता है।
- खुली जगह: घर के उत्तर और पूर्व में आँगन या ख़ाली जगह ज़्यादा छोड़ें; दक्षिण और पश्चिम में कम। सुबह की धूप और हवा पूर्व-उत्तर से आती है, इसलिए वहाँ दीवार से सटाकर निर्माण करने से बचें।
- चारदीवारी: दक्षिण और पश्चिम की दीवार ऊँची और मोटी रखें, उत्तर और पूर्व की दीवार अपेक्षाकृत नीची। इससे भारी हिस्सा सुरक्षित रहता है और हल्के हिस्से से रोशनी-हवा अंदर आती है।
- बाहरी गेट: गेट और घर का मुख्य द्वार अलग चीज़ें हैं। गेट के लिए भी ईशान, उत्तर या पूर्व दिशा की ओर का भाग शुभ माना जाता है, पर सही स्थान 32 पदों की गणना से तय होता है। दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) के कोने में गेट बनाने से बचें।
समाधान: अगर आपका भूखंड पहले से ग़लत ढलान पर है, तो पूरी ज़मीन खुदवाने की ज़रूरत नहीं। निर्माण से पहले मिट्टी भरकर नैऋत्य को थोड़ा ऊँचा और ईशान को थोड़ा नीचा करवाएँ, और चारदीवारी के काम में ऊँचाई का यही अंतर रखें। भूमि के भीतर दबी अशुभ वस्तुओं की जाँच का तरीका शल्य ज्ञान वाले अध्याय में दिया है।
मुख्य द्वार: कहाँ बनाएं और किन बातों का ध्यान रखें
मुख्य द्वार को घर का “मुँह” कहा जाता है। इसके लिए ईशान, उत्तर और पूर्व सबसे शुभ माने जाते हैं, पर वास्तविक स्थान 32 पदों में से तय होता है — यह हमने मुख्य द्वार वास्तु वाले लेख में पूरी गणना के साथ समझाया है। यहाँ घर बनाते समय काम आने वाले व्यावहारिक नियम देखिए:
- द्वार घर के बाकी सभी दरवाज़ों से बड़ा और मज़बूत हो, और दो पल्लों वाला हो तो अच्छा।
- दरवाज़ा अंदर की ओर खुले; अंदर आने वाले को घड़ी की दिशा में खुलता हुआ पल्ला मिले तो इसे शुभ माना जाता है।
- द्वार के सामने बिजली का खंभा, बड़ा पेड़, कुआँ या तिराहा-चौराहे की सीधी सड़क न पड़े। इसे “द्वार वेध” कहा गया है, जिसकी पहचान और बचाव द्वार वेध वाले अध्याय में है।
- देहरी (दहलीज़) ज़रूर बनवाएँ, और द्वार के आसपास रोशनी, साफ़-सफ़ाई और नाम-पट्ट का ध्यान रखें।

पूरे घर की दिशा एक सारणी में: कहाँ क्या बनाएं, कहाँ नहीं
नीचे की सारणी में वे सभी चीज़ें हैं जो घर बनाते समय तय करनी पड़ती हैं। सबसे उत्तम दिशा पहले, उसके बाद दूसरा विकल्प, और आख़िरी खाने में वह जगह जहाँ से बचना चाहिए। हर चीज़ का विस्तार आगे के खंडों में है।
| चीज़ | सबसे उत्तम दिशा | दूसरा विकल्प | कहाँ नहीं |
|---|---|---|---|
| बाहरी गेट | ईशान / उत्तर / पूर्व (32 पद से) | — | नैऋत्य कोना |
| मुख्य द्वार | ईशान / उत्तर / पूर्व (32 पद से) | — | दक्षिण-पश्चिम के कोने में, द्वार वेध वाली जगह पर |
| बैठक (ड्रॉइंग रूम) | उत्तर / पूर्व / ईशान | वायव्य | नैऋत्य |
| रसोई | आग्नेय | वायव्य | ईशान, नैऋत्य, केंद्र |
| भोजन कक्ष | पश्चिम | पूर्व / उत्तर | शौचालय से सटा हुआ |
| मास्टर बेडरूम | नैऋत्य | दक्षिण / पश्चिम | ईशान, केंद्र |
| बच्चों का कमरा / अध्ययन कक्ष | पश्चिम / उत्तर | पूर्व / वायव्य | आग्नेय |
| अतिथि कक्ष | वायव्य | उत्तर | नैऋत्य |
| पूजा घर | ईशान | पूर्व / उत्तर | शौचालय या सीढ़ी के नीचे, शयनकक्ष के ऊपर-नीचे |
| स्टोर रूम (राशन, भारी सामान) | नैऋत्य | पश्चिम / दक्षिण | ईशान |
| शौचालय | वायव्य / पश्चिम | — | ईशान, केंद्र, पूजा घर के पास, मुख्य द्वार के सामने |
| स्नानघर (अलग हो तो) | पूर्व / पश्चिम | वायव्य | ईशान, केंद्र |
| सीढ़ी | दक्षिण / पश्चिम / नैऋत्य | — | ईशान, केंद्र |
| अलमारी / तिजोरी | नैऋत्य की दीवार, पल्ले उत्तर या पूर्व की ओर खुलें | दक्षिण / पश्चिम की दीवार | ईशान, दक्षिण की ओर खुलते पल्ले |
| बोरवेल / कुआँ / भूमिगत सम्प | ईशान | उत्तर / पूर्व | दक्षिण, नैऋत्य, आग्नेय |
| ओवरहेड टंकी (छत पर) | नैऋत्य / पश्चिम | दक्षिण | ईशान |
| सेप्टिक टैंक | वायव्य / पश्चिम और वायव्य के बीच | पश्चिम | ईशान, नैऋत्य, केंद्र, मुख्य द्वार के पास |
| पार्किंग / गैराज | वायव्य | आग्नेय | ईशान |
| बिजली का मीटर, इन्वर्टर, जनरेटर | आग्नेय | दक्षिण | ईशान |
| बालकनी / खुली छत | उत्तर / पूर्व | — | बड़ी खुली बालकनी नैऋत्य में |
| बड़े पेड़ | दक्षिण / पश्चिम | — | ईशान और मुख्य द्वार के सामने |
| तुलसी और छोटे पौधे | उत्तर / पूर्व / ईशान | — | शौचालय की दीवार के पास |
रसोई: सही दिशा, चूल्हे की जगह और ग़लती हो जाए तो उपाय
रसोई के लिए पहली पसंद आग्नेय कोण है और दूसरी वायव्य। चूल्हा इस तरह रखें कि खाना बनाने वाले का मुख पूर्व की ओर रहे। पानी की जगह (सिंक) और आग की जगह (चूल्हा) के बीच थोड़ी दूरी रखें। पूरा विश्लेषण, फ्रिज और अनाज-भंडार की दिशा समेत, हमारे रसोई वास्तु वाले लेख में है, इसलिए यहाँ उसे दोहराने के बजाय आगे के उन विषयों पर चलते हैं जिन पर अक्सर कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिलता।
जल-व्यवस्था का सही क्रम: बोरवेल, भूमिगत सम्प और ओवरहेड टंकी
घर में पानी की तीन जगहें होती हैं, और तीनों के नियम अलग हैं — यही सबसे ज़्यादा उलझन पैदा करता है। ज़मीन के नीचे का पानी (बोरवेल, कुआँ, भूमिगत सम्प) ईशान में रखा जाता है, क्योंकि ईशान जल का क्षेत्र है और वहाँ पानी का स्रोत हल्कापन और शुद्धता बनाए रखता है। छत पर की टंकी उलटे नैऋत्य या पश्चिम में रखी जाती है, क्योंकि छत का भारी बोझ घर के भारी हिस्से पर टिके तो संरचना संतुलित रहती है। हमारे पाठ्यक्रम का अध्याय सीढ़ी, आंगन एवं जल स्रोत का उचित स्थान इसकी जड़ तक जाता है।
सीधा नियम याद रखें: हल्की चीज़ें ईशान में, भारी चीज़ें नैऋत्य में। इसी वजह से भूमिगत पानी और ऊपर की टंकी के नियम उल्टे दिखते हैं, पर आधार एक ही है।
- बोरवेल: ईशान कोण से थोड़ा भीतर, दीवार से कुछ दूरी पर खुदवाएँ। जल-स्तर और ज़मीन की जाँच के लिए पहले स्थानीय भू-जल विशेषज्ञ की सलाह लें, क्योंकि पानी वास्तु से नहीं, भूगर्भ से मिलता है।
- भूमिगत सम्प: ईशान या उत्तर की ओर। इसका ढक्कन मज़बूत हो और ऊपर कोई भारी निर्माण या ख़ाली ढाँचा न बने।
- ओवरहेड टंकी: नैऋत्य या पश्चिम की ओर की छत पर, दीवार के ऊपर मज़बूत आधार के साथ। ईशान की छत पर भारी टंकी न रखें।
- पानी का निकास: घर का इस्तेमाल किया हुआ पानी उत्तर या पूर्व की ओर से बाहर निकले, और ढलान उसी तरफ़ रहे।
समाधान: अगर बोरवेल पहले से किसी और दिशा में हो चुका है, तो उसे बंद करवाने की ज़रूरत नहीं। ईशान में एक छोटा जल-पात्र या तुलसी का गमला रखें, पानी का रिसाव ठीक करवाएँ, और ओवरहेड टंकी को नैऋत्य की ओर खिसकाने का काम आगे की मरम्मत के साथ करवा लें।
सेप्टिक टैंक और नाली-निकास: वास्तु और सुरक्षा साथ-साथ
सेप्टिक टैंक आधुनिक ज़रूरत है, इसलिए शास्त्रीय ग्रंथों — मयमत और विश्वकर्मा प्रकाश — में इसका सीधा नाम नहीं मिलता। आधुनिक वास्तु-परंपरा में इसे “मलिन जल का स्थान” मानकर उसी सिद्धांत से दिशा दी जाती है जो शौचालय और निकासी पर लागू होती है: वायव्य, या पश्चिम और वायव्य के बीच। ईशान, नैऋत्य, केंद्र और मुख्य द्वार के पास इसे न बनवाएँ।
यहाँ वास्तु से ऊपर एक सुरक्षा की बात है। सेप्टिक टैंक और पीने के पानी के स्रोत (बोरवेल, कुआँ) के बीच पर्याप्त दूरी रखनी ही चाहिए, वरना मल का रिसाव पानी में पहुँच सकता है। कुछ सामान्य मार्गदर्शिकाओं में यह दूरी लगभग 15 से 18 मीटर बताई जाती है, पर यह आँकड़ा मुझे किसी एक आधिकारिक स्रोत से पक्का नहीं मिल पाया है। इसलिए अपने नगर निकाय के नियम और इंजीनियर की सलाह को अंतिम मानें। जहाँ वास्तु और स्वास्थ्य-सुरक्षा टकराएँ, वहाँ सुरक्षा पहले आती है।
- सेप्टिक टैंक का ढक्कन घर के भीतर या दरवाज़े के ठीक सामने न हो।
- टैंक में हवा निकलने की पाइप (वेंट पाइप) ऊँचाई तक ले जाएँ, ताकि गंध न फैले।
- नियमित सफ़ाई करवाते रहें — वास्तु का कोई उपाय ख़राब रखरखाव की भरपाई नहीं कर सकता।
शौचालय और स्नानघर: जगह, पैन की दिशा और दरवाज़ा
शौचालय के लिए सबसे उपयुक्त जगह वायव्य या पश्चिम की ओर मानी गई है। ईशान, केंद्र (ब्रह्मस्थान), पूजा घर के पास और मुख्य द्वार के ठीक सामने इसे न बनाएँ। जल-निकासी सुगम रहे, इसके लिए इसे बाहरी दीवार से लगाकर बनवाना व्यावहारिक भी है — हवा और रोशनी आती है और नमी भीतर नहीं रुकती। यही बात हमारे पाठ्यक्रम में कमरों की सही दिशा वाले अध्याय में भी कही गई है।
शौचालय की सीट (पैन) किस ओर मुख करे?
आधुनिक वास्तु-परंपरा की सलाह यह है कि बैठने वाले का मुख उत्तर या दक्षिण की ओर रहे, यानी सीट पूर्व-पश्चिम की धुरी पर आड़ी न बैठे। इसके पीछे का तर्क पृथ्वी की उत्तर-दक्षिण चुंबकीय धुरी से जोड़ा जाता है। मैं यहाँ ईमानदारी से बता दूँ कि यह नियम शास्त्रीय ग्रंथों में स्पष्ट रूप से नहीं मिलता, यह बाद की परंपरा और अनुभव से आया सुझाव है। इसलिए इसे सुविधा के साथ अपनाइए — नक्शे में अगर यह बिना किसी अड़चन के बैठ जाए तो अच्छा, वरना इसके लिए पूरा बाथरूम न बदलें।
- शौचालय का दरवाज़ा इस्तेमाल के अलावा बंद रखें, और उसमें हवा निकासी (एग्ज़ॉस्ट पंखा या खिड़की) ज़रूर हो।
- शौचालय और स्नानघर अलग-अलग कोनों में हों तो बेहतर; एक ही कमरे में हों तो भी सीट और नहाने की जगह के बीच थोड़ा अलगाव रखें।
- शौचालय की दीवार शयनकक्ष में बिस्तर की पीठ से या रसोई के चूल्हे की पीठ से सटी न हो।
- शौचालय के ठीक ऊपर या नीचे पूजा घर न बने।
समाधान: अगर शौचालय पहले से ईशान में बन चुका है, तो तुरंत तोड़ने की सलाह मैं नहीं देता। सबसे पहले उसे साफ़, सूखा और हवादार रखें, रिसाव पूरी तरह ठीक करवाएँ, हल्के रंग लगवाएँ और दरवाज़ा बंद रखें। आगे जब भी मरम्मत या नवीनीकरण हो, तब उसे बदलने की योजना बनाएँ। दोष और उसके व्यावहारिक समाधान पर बिना तोड़फोड़ के समाधान वाला अध्याय पढ़ें।
शयनकक्ष: बिस्तर, सिर की दिशा, खिड़की-दरवाज़े और आम गलतियाँ
शयनकक्ष वह जगह है जहाँ आप दिन का एक तिहाई समय बिताते हैं, इसलिए यहाँ वास्तु की छोटी-छोटी बातें भी असर रखती हैं। मास्टर बेडरूम के लिए पहली पसंद नैऋत्य है, क्योंकि वहाँ स्थिरता और भारीपन है जो गहरी नींद के साथ मेल खाता है। पूरा विस्तार बेडरूम वास्तु के लेख में है; यहाँ घर बनाते समय तय होने वाली बातें देखिए।
- सिर की दिशा: सोते समय सिर दक्षिण या पूर्व की ओर रखना शुभ माना जाता है। उत्तर की ओर सिर रखने से बचें; यह चुंबकीय क्षेत्र की मान्यता पर आधारित है।
- दरवाज़ा: कमरे का दरवाज़ा उत्तर या पूर्व की दीवार में हो तो अच्छा। बिस्तर दरवाज़े की सीध में न हो, ताकि दरवाज़ा खुलते ही सोता हुआ व्यक्ति सीधे सामने न दिखे।
- खिड़कियाँ: बड़ी और ज़्यादा खिड़कियाँ उत्तर और पूर्व की दीवार में रखें, ताकि सुबह की रोशनी और ताज़ी हवा आए। दक्षिण और पश्चिम की ओर खिड़कियाँ छोटी और कम रखें, क्योंकि उधर से दोपहर बाद की तेज़ गर्मी आती है। एक आम सलाह यह भी है कि खिड़कियाँ दरवाज़ों से कम न हों, ताकि आर-पार हवा चलती रहे।
- बिस्तर: बीम के नीचे बिस्तर न रखें; यह दबाव का अनुभव कराता है और इंजीनियरिंग की दृष्टि से भी बीम के ठीक नीचे सोना सुखद नहीं।
- दर्पण और टीवी: बिस्तर के ठीक सामने दर्पण न हो, और टीवी हो तो उस पर रात में कपड़ा डाल दें। यह नींद में खलल रोकने की सीधी व्यावहारिक सलाह है।
- अलमारी: नैऋत्य की दीवार पर रखें और पल्ले उत्तर या पूर्व की ओर खुलें, जैसा हमने अलमारी और तिजोरी वास्तु में बताया है।
- रंग: हल्के और शांत रंग — क्रीम, हल्का पीला, हल्का हरा। गहरा लाल या काला शयनकक्ष में आँखों और मन पर भारी पड़ता है।
- शौचालय संलग्न हो: दरवाज़ा बंद रखें और बिस्तर का सिरहाना उस दीवार से न लगे।
बच्चों के कमरे के लिए पश्चिम या उत्तर की ओर का हिस्सा ठीक रहता है, और अध्ययन की मेज़ पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके रखें। अतिथि कक्ष वायव्य में बनाइए — क्योंकि यह दिशा चलायमान है और मेहमान आते-जाते रहते हैं।

पूजा घर, स्टोर रूम, सीढ़ी, पार्किंग और बिजली के उपकरण
- पूजा घर: ईशान सबसे श्रेष्ठ है; पूजा करने वाले का मुख पूर्व या उत्तर की ओर रहे। भूतल पर बनाइए, शौचालय या सीढ़ी के नीचे नहीं।
- स्टोर रूम: राशन, अनाज और भारी सामान के लिए नैऋत्य उपयुक्त है, पश्चिम या दक्षिण दूसरा विकल्प। ईशान में कबाड़ या भारी सामान का भंडार न बनाएँ। जो सामान जल्दी खर्च हो या बेचा जाना हो, उसके लिए वायव्य ठीक रहता है।
- सीढ़ी: दक्षिण, पश्चिम या नैऋत्य में। ऊपर चढ़ते हुए सीढ़ी घड़ी की दिशा में मुड़ती हो तो परंपरा के अनुसार अच्छा। ईशान और केंद्र में सीढ़ी नहीं। सीढ़ी के नीचे का स्थान बाथरूम या पूजा घर के लिए इस्तेमाल न करें, और इसका विस्तार सीढ़ी, आँगन एवं जल स्रोत वाले अध्याय में है।
- पार्किंग / गैराज: वायव्य में, दूसरा विकल्प आग्नेय। ईशान को खुला रखें।
- बिजली का मीटर, इन्वर्टर, जनरेटर, एयर कंडीशनर का बाहरी हिस्सा: आग्नेय में, क्योंकि यह अग्नि और ताप की दिशा है। ईशान में न लगाएँ।
- पेड़-पौधे: बड़े पेड़ दक्षिण या पश्चिम में, तुलसी और छोटे पौधे उत्तर, पूर्व या ईशान में। मुख्य द्वार के सामने बड़ा पेड़ न हो और नींव के पास ऐसे पेड़ न लगाएँ जिनकी जड़ें फैलकर दीवार को नुकसान पहुँचाएँ। पूरी सूची घर के आसपास वृक्ष एवं जलाशय में है।
- तहखाना: यदि बनाना ही पड़े तो उत्तर या पूर्व की ओर, खुला और हवादार रखें, और दक्षिण-पश्चिम में तहखाना न बनाएँ।
सबसे अनछुआ पहलू: जब हर चीज़ ईशान माँगे — प्राथमिकता और निर्माण का क्रम
ज़्यादातर लेख आपको बताते हैं कि ईशान में पूजा घर हो, पानी हो, खुली जगह हो और बैठक भी हो। पर छोटे भूखंड में ये सब एक साथ नहीं बैठ सकते। मेरा अनुभव है कि यहीं लोग उलझते हैं और या तो सब कुछ ठूँस देते हैं, या वास्तु को ही छोड़ देते हैं। इसलिए एक प्राथमिकता-क्रम तय कर लीजिए।
- ईशान में पहले यह चुनें: (1) खुली जगह या पानी का स्रोत, (2) पूजा घर, (3) बैठक। इनमें से जो जगह न बचे, उसे उत्तर या पूर्व में ले जाइए।
- ईशान में कभी न रखें: शौचालय, रसोई, सीढ़ी, सेप्टिक टैंक और भारी स्टोर। ये पाँच बातें किसी भी समझौते से ऊपर हैं।
- नैऋत्य में पहले यह चुनें: (1) मास्टर बेडरूम, (2) भारी भंडार और तिजोरी, (3) ओवरहेड टंकी का आधार। इसे कभी खुला, ख़ाली या कटा हुआ न छोड़ें।
निर्माण के क्रम की भी एक आम परंपरा है: खुदाई ईशान की ओर से शुरू करें, और दीवारों का निर्माण नैऋत्य की ओर से। सामग्री का ढेर भी नैऋत्य या दक्षिण में रखें, ईशान को खाली रखें। नींव की खुदाई और शिलान्यास का मुहूर्त हमारे गृहारंभ मुहूर्त वाले अध्याय में समझाया है, और गृह प्रवेश के लिए गृह प्रवेश मुहूर्त देखें।
जब वास्तु और इंजीनियरिंग टकराएँ
कभी-कभी वास्तु कहता है कि बोरवेल ईशान में हो, पर वहाँ मिट्टी कमज़ोर है या पड़ोसी का सेप्टिक टैंक क़रीब है। या सीढ़ी नैऋत्य में चाहिए, पर संरचना उसे सँभाल नहीं सकती। ऐसे हर टकराव में मेरी सलाह एक ही है: पहले सुरक्षा और क़ानून, फिर वास्तु। मज़बूत नींव, सही जल-निकासी, स्वच्छ पेयजल और नगर निकाय की मंज़ूरी वास्तु की शर्त नहीं, घर की शर्त हैं। वास्तु का सबसे अच्छा नतीजा तब मिलता है जब इंजीनियर और वास्तु-सलाहकार नक्शे पर साथ बैठें।
पहले से बने घर में क्या करें: बदलाव का सही क्रम
अगर घर बन चुका है और कुछ चीज़ें इन नियमों से मेल नहीं खातीं, तो घबराने की ज़रूरत नहीं। हर दोष का उपाय तोड़फोड़ नहीं होता।
- पहला काम: उन दोषों को पहले ठीक करें जो सीधे सफ़ाई, सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े हैं — रिसाव, नमी, बंद नाली, ख़राब हवा निकासी।
- दूसरा काम: ईशान को साफ़ और हल्का रखें, कबाड़ हटाएँ, और नैऋत्य को भारी और व्यवस्थित बनाएँ।
- तीसरा काम: छोटे बदलाव, जैसे अलमारी का स्थान, बिस्तर की दिशा, पूजा का स्थान, दर्पण की स्थिति।
- आख़िरी काम: बड़े निर्माण-बदलाव तभी करें जब कोई मरम्मत या नवीनीकरण चल रहा हो।
फ़्लैट में रहने वालों के लिए अलग से सीमाएँ होती हैं, जिनके लिए आधुनिक फ़्लैट में वास्तु के व्यावहारिक उपाय और बहुमंज़िला घरों के लिए आर.सी.सी. निर्माण और 2-3 मंज़िला मकान का वास्तु पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
घर बनाते समय सबसे पहले कौन-सी चीज़ की दिशा तय करनी चाहिए?
सबसे पहले भूखंड की ढलान और मुख्य द्वार का पद तय करें, फिर पानी के स्रोत (बोरवेल या सम्प) की जगह। इन तीनों का असर पूरे नक्शे पर पड़ता है, इसलिए इन्हें नक्शे पर पहले बैठा लें।
शौचालय की सीट किस दिशा में मुख करे?
आधुनिक वास्तु की सलाह है कि बैठने वाले का मुख उत्तर या दक्षिण की ओर रहे। यह शास्त्रीय ग्रंथों का स्पष्ट नियम नहीं, बाद की परंपरा का सुझाव है, इसलिए इसे सुविधा के साथ अपनाएँ।
सेप्टिक टैंक किस दिशा में बनवाएँ?
आम परंपरा में वायव्य या पश्चिम और वायव्य के बीच। ईशान, नैऋत्य और केंद्र में न बनवाएँ। साथ ही बोरवेल या कुएँ से पर्याप्त दूरी रखें और स्थानीय नियम का पालन करें।
ओवरहेड टंकी और भूमिगत सम्प की दिशा अलग क्यों है?
सम्प ज़मीन के नीचे है और ईशान को जल का क्षेत्र माना गया है, इसलिए वहाँ रखा जाता है। छत की टंकी भारी है, इसलिए भारी दिशा नैऋत्य या पश्चिम में रखी जाती है। दोनों का सिद्धांत एक है: हल्की चीज़ें ईशान, भारी चीज़ें नैऋत्य।
बेडरूम में खिड़की और दरवाज़ा किस दिशा में हों?
दरवाज़ा उत्तर या पूर्व की दीवार में, और बड़ी खिड़कियाँ उत्तर और पूर्व की ओर रखना शुभ माना जाता है। दक्षिण और पश्चिम में खिड़कियाँ छोटी और कम रखें।
अगर ईशान में शौचालय बन चुका हो तो क्या घर तोड़ना पड़ेगा?
नहीं। पहले उसे साफ़, सूखा, हवादार और रिसाव-मुक्त रखें। बड़ा बदलाव तभी सोचें जब नवीनीकरण का काम हो रहा हो। बिना तोड़फोड़ के उपाय यहाँ देखें।
सारांश
- ईशान हल्का, खुला और पवित्र रखें; नैऋत्य भारी, ऊँचा और स्थिर रखें।
- मुख्य द्वार और गेट ईशान, उत्तर या पूर्व में, पर सही स्थान 32 पदों की गणना से तय करें।
- रसोई और बिजली के उपकरण आग्नेय में; शौचालय और सेप्टिक टैंक वायव्य या पश्चिम की ओर।
- बोरवेल और भूमिगत सम्प ईशान में, ओवरहेड टंकी नैऋत्य या पश्चिम में।
- मास्टर बेडरूम नैऋत्य में, सिर दक्षिण या पूर्व की ओर, बड़ी खिड़कियाँ उत्तर-पूर्व में।
- वास्तु और इंजीनियरिंग टकराएँ तो पहले सुरक्षा, क़ानून और स्वच्छ पेयजल को चुनें।
मैं हमेशा यही कहता हूँ कि वास्तु आपको डराने के लिए नहीं, घर को सुव्यवस्थित, रोशन और संतुलित बनाने के लिए है। नक्शे पर ही सही फ़ैसले ले लीजिए, और जो बन चुका है उसे धीरे-धीरे सुधारिए।

Ajit Kumar Nath — AstroVgyaan ke sansthapak aur research lead. Inka vishwas hai ki gyan ka asli uddeshya seva hai — isliye inka kaam kabhi bhi vyaktigat consultation ya paid sessions tak simit nahi raha. Vedic Jyotish (Parashari Hora Shastra, Jaimini Sutram, Bhrigu Nandi Nadi), Lal Kitab, Vastu Shastra aur Ank Jyotish (Numerology) par varshon ka swatantra adhyayan aur shodh karke, unhe saral, imandaar aur research-aadharit lekhon ke roop mein sabke liye free upalabdh karana — yahi inka jeevan-uddeshya hai. Research aur collaboration ke liye: astrovgyaan@gmail.com





