तृतीय भाव — पराक्रम, साहस, भाई-बहन, यात्रा और संचार का भाव। पाँच वर्षों के परामर्श में मैंने देखा है कि जिन जातकों का तृतीय भाव बलवान होता है वे जीवन में अपने बल पर आगे बढ़ते हैं — किसी के आसरे की प्रतीक्षा नहीं करते। एक जातक आए थे जो एक छोटे से गाँव से निकलकर बड़े शहर में अपना व्यवसाय स्थापित किया था। उनका तृतीयेश मंगल के साथ उच्च राशि में था — पराक्रम और साहस ही उनकी पूँजी था।
शास्त्र में तृतीय भाव
“साहसं भ्रातृवर्गश्च सेवकाः श्रवणं तथा। यात्रा शौर्यं पित्रुमृत्युः तृतीयाद् विनिर्दिशेत्॥”
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय ११
महर्षि पाराशर कहते हैं — साहस, भाई-बहनों का समूह, सेवक, श्रवण शक्ति, यात्रा, शौर्य और पिता की मृत्यु — ये सब तृतीय भाव से जाने जाते हैं।
“शुभग्रहयुते दृष्टे तृतीये साहसी भवेत्। भ्रातृमान् सुखी नित्यं पराक्रमी च जायते॥”
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय १४
अर्थात् — यदि तृतीय भाव शुभ ग्रह से युत या दृष्ट हो तो जातक साहसी, भाई-बहनों से सुखी और पराक्रमी होता है।
तृतीय भाव के कारकत्व
पराक्रम और साहस: तृतीय भाव का सर्वप्रमुख कारकत्व पराक्रम है। यह वह भाव है जो बताता है कि जातक जीवन की चुनौतियों का सामना कैसे करता है। तृतीय भाव बलवान हो और मंगल की स्थिति अनुकूल हो तो जातक कठिन से कठिन परिस्थिति में भी नहीं घबराता।
छोटे भाई-बहन: तृतीय भाव से जन्म के बाद के (छोटे) भाई-बहनों का विचार होता है। तृतीय भाव का नैसर्गिक कारक मंगल है। एकादश भाव से बड़े भाई-बहनों का विचार होता है।
संचार और लेखन: तृतीय भाव संचार, लेखन, पत्रकारिता और मीडिया का कारक है। बुध का तृतीय से सम्बन्ध लेखन और संचार में विशेष प्रतिभा देता है।
छोटी यात्राएँ: तृतीय भाव छोटी और स्थानीय यात्राओं का कारक है। दीर्घ विदेश यात्राएँ नवम और द्वादश भाव से देखी जाती हैं।
दाहिना कान और भुजाएँ: शारीरिक दृष्टि से तृतीय भाव दाहिने कान, भुजाओं और कंधों का कारक है।
तृतीय भाव में विभिन्न ग्रहों के फल
तृतीय में सूर्य: बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार — “सूर्ये तृतीये पूर्वजनाशः” — तृतीय में सूर्य हो तो बड़े भाई-बहनों को हानि की सम्भावना। जातक स्वयं साहसी और नेतृत्वकारी। सरकारी कार्यों में यात्राएँ अधिक।
तृतीय में चन्द्र: भावनात्मक लेखन और संचार। बहनों से विशेष लगाव। मन में यात्रा की इच्छा। परन्तु साहस में भावनाएँ कभी-कभी बाधक बनती हैं।
तृतीय में मंगल: यह तृतीय भाव के लिए उत्तम स्थान है क्योंकि मंगल तृतीय का नैसर्गिक कारक है। असाधारण साहस, पराक्रम और खेल-प्रतिस्पर्धा में सफलता। भुजाओं में शक्ति असाधारण।
तृतीय में बुध: लेखन, संचार, पत्रकारिता में असाधारण प्रतिभा। वाणी प्रभावशाली। बहुभाषी होने की क्षमता। भाई-बहनों से बौद्धिक सम्बन्ध।
तृतीय में गुरु: साहस में दर्शन और ज्ञान का समन्वय। धार्मिक यात्राएँ। परन्तु गुरु तृतीय में कुछ कम शुभ माने जाते हैं — पराक्रम में विनम्रता आड़े आती है।
तृतीय में शुक्र: कलात्मक संचार और लेखन। संगीत में यात्राएँ। भाई-बहनों से प्रेमपूर्ण सम्बन्ध।
तृतीय में शनि: यह उत्तम स्थान है। दीर्घकालिक और अनुशासित पराक्रम। लेखन में गम्भीरता। धीरज और धैर्य से सब विजय।
तृतीय में राहु: असाधारण महत्त्वाकांक्षा और तकनीकी संचार में सफलता। यात्राएँ अनेक। भाई-बहनों से जटिल सम्बन्ध।
तृतीय में केतु: आध्यात्मिक पराक्रम। पूर्वजन्म के साहस का प्रकटीकरण।
भाई-बहनों की संख्या — शास्त्रोक्त नियम
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र में महर्षि पाराशर ने कहा है — तृतीयेश और मंगल दोनों यदि षष्ठ, अष्टम या द्वादश में हों तो भाई-बहन कम या सम्बन्ध में कठिनाई। दोनों केन्द्र या त्रिकोण में बलवान हों तो अनेक और सुखी भाई-बहन। मंगल जिस राशि में हो — नर राशि हो तो भाई, स्त्री राशि हो तो बहन — यह भी देखा जाता है।
तृतीय भाव और आधुनिक करियर
आधुनिक युग में तृतीय भाव का करियर से विशेष सम्बन्ध है। मीडिया, पत्रकारिता, लेखन, प्रकाशन, IT, संचार उद्योग, यात्रा उद्योग — ये सभी तृतीय भाव से जुड़े करियर हैं। यदि तृतीयेश दशम भाव में हो या दोनों में परस्पर दृष्टि हो तो इन क्षेत्रों में सफलता निश्चित। अपनी कुण्डली में तृतीय भाव का विश्लेषण जानने के लिए WhatsApp पर परामर्श बुक करें।
अगले अध्याय की ओर
अगले अध्याय में हम चतुर्थ भाव का अध्ययन करेंगे — माता, गृह, मन और सुख का भाव।


