अध्याय १.३ — उँगलियाँ, अँगूठा और नाखून | हस्त-रेखा विज्ञान का विस्तृत विश्लेषण

हस्त-रेखा विज्ञान में उँगलियों का अध्ययन हाथ के सामान्य स्वरूप के बाद का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण चरण है। पाँच वर्षों के ज्योतिष और सामुद्रिक परामर्श में मैंने जब भी किसी का हाथ देखा है, उँगलियों ने सबसे पहले और सबसे स्पष्ट संकेत दिये हैं। एक बार एक युवती आईं जो संगीत में अपना करियर बनाना चाहती थीं। उनके परिवार का दबाव था कि वे इंजीनियरिंग करें। जब मैंने उनकी उँगलियाँ देखीं — लम्बी, पतली, आगे से कुछ नुकीली और मुलायम — तो मैंने कहा कि आपकी उँगलियाँ कलाकार की हैं, इंजीनियर की नहीं। आज वे एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका हैं। उँगलियाँ झूठ नहीं बोलतीं।

इस अध्याय में हम तीन विषयों को एकसाथ समझेंगे — उँगलियों के प्रकार और उनसे व्यक्तित्व का विश्लेषण, अँगूठे का सम्पूर्ण अध्ययन जो भारतीय सामुद्रिक शास्त्र में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, और नाखूनों से स्वास्थ्य एवं स्वभाव का विश्लेषण। इन तीनों को मिलाकर जो चित्र उभरता है वह अत्यन्त सटीक और गहरा होता है।

शास्त्र में उँगलियों की महिमा

“बालत्तणम्मि सुलहं पएसिणी-मझ्झमंतरघणम्मि। मज्झिम-अणामियाणंतरम्मि तरुणत्तणे सुक्खं॥”

कर-लक्षणं, गाथा ४ (समुद्र ऋषि)

समुद्र ऋषि इस गाथा में कहते हैं — यदि प्रदेशिनी (तर्जनी) और मध्यमा की उँगलियों का अन्तर सघन हो (अर्थात् वे एक-दूसरे से मिली हों और मिलने से उनके बीच में कोई अन्तर न रहे) तो बालकपन में सुख होवे। यदि मध्यमा और अनामिका के बीच सघन अन्तर हो तो जवानी में सुख हो। यह अत्यन्त सूक्ष्म अवलोकन है — उँगलियों के बीच का अन्तर जीवन के विभिन्न कालखण्डों के सुख-दुःख का संकेत देता है।

“पावइ पच्छा सुक्खं कणिट्ठिआणामिअंतरघणम्मि। सव्वंगुलीघणम्मि अ होइ सुही धणसमिद्धो अ॥”

कर-लक्षणं, गाथा ५

समुद्र ऋषि की अगली गाथा में कहा गया है — यदि कनिष्ठिका (छोटी उँगली) और अनामिका में सघन अन्तर हो तो बुढ़ापे में सुख होवे। यदि सभी उँगलियाँ सघन हों तो मनुष्य सदा सुखी और धन-सम्पन्न होता है। पण्डित गोपेशकुमार ओझा ने हस्त-रेखा-विज्ञान में इसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि वराहमिहिर के अनुसार लम्बी उँगलियाँ दीर्घजीवियों की, सीधी (अवलित) उँगलियाँ सुभगों की, सूक्ष्म (पतली) उँगलियाँ बुद्धिमानों की और चपटी उँगलियाँ दूसरों की सेवा करने वालों की होती हैं।

उँगलियों के पर्व (पोरे) — शास्त्रोक्त विश्लेषण

“सम्मंसंगुलिपव्वो पुरिसो धणवं सुही सया होइ। जइ सो अमंसपव्वो ता तस्स सिरी ण संभवइ॥”

कर-लक्षणं, गाथा ६

समुद्र ऋषि कहते हैं — जिस पुरुष की उँगलियों के पर्व (पोरे) माँसल हों वह धनवान् और सदा सुखी होता है। यदि वे अमाँस-पर्व (बिना माँस के) हों तो उसके पास श्री (सम्पत्ति) नहीं होती। वराहमिहिर ने बृहज्जातक में इसे और स्पष्ट किया है — जिनकी उँगलियों के पर्व (पोरे) लम्बे हों वे सौभाग्यवान और दीर्घायु होते हैं।

पण्डित ओझा ने बताया है कि उँगलियों में गाँठें निकला होना “विचारक” होने की प्रवृत्ति प्रकट करता है। उँगलियों के अग्रभाग चतुष्कोणाकृति या वर्गाकृति के होने से धैर्य और अध्यवसाय तथा कुछ नुकीले होने से आत्म-त्याग की भावना रहती है। इस प्रकार केवल उँगलियों के पर्व देखकर ही बहुत कुछ जाना जा सकता है।

चारों उँगलियों का परिचय और उनके ग्रह-स्वामी

भारतीय सामुद्रिक शास्त्र और हस्त-रेखा-विज्ञान दोनों में चारों उँगलियों को ग्रहों से सम्बद्ध किया गया है। यह सम्बन्ध वैदिक ज्योतिष और हस्त-रेखा विज्ञान के बीच का एक अत्यन्त सुन्दर सेतु है।

तर्जनी (Index Finger) — गुरु-क्षेत्र: तर्जनी गुरु (बृहस्पति) की उँगली है। यह उँगली नेतृत्व, महत्त्वाकांक्षा, धर्म और ज्ञान का प्रतीक है। जिनकी तर्जनी लम्बी और सुन्दर होती है वे स्वाभाविक नेता होते हैं। गुरु-क्षेत्र (तर्जनी के नीचे का उभार) का विस्तार इस उँगली के प्रभाव को बढ़ाता है। पाँच वर्षों के अनुभव में मैंने देखा है कि जिन जातकों की तर्जनी मध्यमा से लम्बी होती है वे असाधारण नेतृत्वकारी स्वभाव के होते हैं।

मध्यमा (Middle Finger) — शनि-क्षेत्र: मध्यमा शनि की उँगली है। यह उँगली कर्म, अनुशासन, गम्भीरता और दायित्व का प्रतीक है। जिनकी मध्यमा अत्यन्त लम्बी और सीधी होती है वे गम्भीर, कर्मनिष्ठ और कभी-कभी एकाकी स्वभाव के होते हैं। शनि-क्षेत्र (मध्यमा के नीचे) का उभार व्यक्ति की कर्मशीलता और अनुशासन को बताता है।

अनामिका (Ring Finger) — सूर्य-क्षेत्र: अनामिका सूर्य की उँगली है। यह उँगली कला, सौन्दर्य, यश और सफलता का प्रतीक है। जिनकी अनामिका लम्बी और सुन्दर होती है वे कला और सौन्दर्य में रुचि रखते हैं। अनामिका में विवाह की अँगूठी पहनी जाती है — यह संयोग नहीं है। सूर्य-क्षेत्र (अनामिका के नीचे) का उभार यश और सफलता का संकेत देता है।

कनिष्ठिका (Little Finger) — बुध-क्षेत्र: कनिष्ठिका बुध की उँगली है। यह उँगली संचार, व्यापार, बुद्धि और वाकशक्ति का प्रतीक है। जिनकी कनिष्ठिका लम्बी होती है वे उत्कृष्ट वक्ता और व्यापारी होते हैं। कनिष्ठिका यदि अनामिका के ऊपरी पर्व तक पहुँचे तो व्यापार में विशेष सफलता का संकेत है। पाँच वर्षों के अनुभव में मैंने देखा है कि सफल व्यापारियों में प्रायः लम्बी कनिष्ठिका होती है।

उँगलियों की लम्बाई से व्यक्तित्व विश्लेषण

उँगलियों की लम्बाई के विषय में पण्डित ओझा ने एक महत्त्वपूर्ण नियम बताया है। उँगलियों की लम्बाई हथेली की लम्बाई के सापेक्ष देखी जाती है। यदि उँगलियाँ हथेली की तुलना में अधिक लम्बी हों तो विशेष बौद्धिक विकास। यदि उँगलियाँ छोटी हों तो व्यावहारिक और भावनात्मक प्रवृत्ति अधिक।

लम्बी उँगलियाँ: जिनकी उँगलियाँ हथेली की अपेक्षा लम्बी होती हैं वे विस्तार में जाने वाले, विवरण-प्रिय और विश्लेषणात्मक होते हैं। ये लोग किसी भी कार्य को ध्यानपूर्वक और व्यवस्थित ढंग से करते हैं। वे कला, विज्ञान, दर्शन और साहित्य जैसे सूक्ष्म विषयों में रुचि रखते हैं।

छोटी उँगलियाँ: छोटी उँगलियों वाले व्यक्ति आवेग में कार्य करते हैं — विवरण की परवाह किये बिना। ये लोग शीघ्र निर्णय लेते हैं और जीवन में व्यावहारिक दृष्टिकोण रखते हैं। परन्तु कभी-कभी जल्दबाजी में गलतियाँ भी करते हैं।

उँगलियों की आपसी तुलना: जब तर्जनी मध्यमा के पहले पर्व तक पहुँचे तो सामान्य महत्त्वाकांक्षा। यदि तर्जनी और मध्यमा बराबर हों तो असाधारण नेतृत्व-लालसा — ऐसे व्यक्ति कभी किसी के अधीन काम करना पसन्द नहीं करते। यदि अनामिका तर्जनी से लम्बी हो तो जुए और जोखिम लेने की प्रवृत्ति।

उँगलियों के अग्रभाग — नुकीली, वर्गाकार और फैली हुई

उँगलियों के अग्रभाग (tips) का आकार व्यक्ति की मानसिक प्रवृत्ति का सबसे स्पष्ट संकेत देता है।

नुकीली उँगलियाँ: जिनकी उँगलियाँ आगे से नुकीली होती हैं वे कलाप्रिय, संवेदनशील, आदर्शवादी और इच्छाशक्ति से प्रेरित होते हैं। ये लोग तात्कालिक प्रेरणा से कार्य करते हैं। इनमें आध्यात्मिक और कलात्मक प्रवृत्ति होती है परन्तु व्यावहारिकता की कमी।

वर्गाकार उँगलियाँ: जिनकी उँगलियाँ आगे से वर्गाकार (चौकोर) होती हैं वे व्यावहारिक, अनुशासित, कानून का पालन करने वाले और व्यवस्थित होते हैं। ये लोग भावना से नहीं, तर्क से कार्य करते हैं।

आगे से फैली उँगलियाँ (Spatulate Tips): जिनकी उँगलियाँ आगे से कुछ फैली हुई होती हैं वे अत्यन्त क्रियाशील, परिश्रमी और व्यावहारिक होते हैं। इनमें रजोगुण प्रधान होता है। ये लोग काम में डूब जाते हैं और बहुत ऊर्जावान होते हैं।

गाँठदार उँगलियाँ (Knotted Fingers): जिनकी उँगलियों में गाँठें निकली होती हैं वे विचारशील, तार्किक और विश्लेषणात्मक होते हैं। ये लोग किसी भी बात को बिना सोचे-परखे नहीं मानते। दार्शनिक और वैज्ञानिक स्वभाव।

अँगूठा — भारतीय सामुद्रिक शास्त्र का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग

भारतीय सामुद्रिक शास्त्र में अँगूठे को सबसे अधिक महत्त्व दिया गया है। पण्डित गोपेशकुमार ओझा ने हस्त-रेखा-विज्ञान में लिखा है — “अँगूठे से आत्मबल और साहस भी प्रकट होता है।” यह कितना गहरा सत्य है। अँगूठे की शक्ति और बनावट व्यक्ति की इच्छाशक्ति, तर्क-शक्ति और जीवनीशक्ति का सबसे प्रत्यक्ष संकेत है।

बच्चे अपराध और भय की अवस्था में प्रायः अँगूठों को मुट्ठी में छिपा लेते हैं — उनमें आत्मबल और आत्मविश्वास की कमी होती है। जो बच्चे अँगूठे को सीधा और ऊँचा रखते हैं उनमें आत्मविश्वास और साहस की मात्रा अधिक होती है। यदि कोई अधिक बीमार हो और अँगूठा ढीला होकर हथेली पर गिर पड़े तो समझना चाहिए कि अन्तिम समय आ पहुँचा। यदि अँगूठे में कुछ जान हो तो कुछ बचने की आशा रहती है।

अँगूठे के यव (जौ) — कर-लक्षणं का विशेष योगदान

कर-लक्षणं में समुद्र ऋषि ने अँगूठे के यव (जौ — एक विशेष चिह्न जो अँगूठे पर होता है) के विषय में अत्यन्त विस्तृत और महत्त्वपूर्ण विवरण दिया है। यह भारतीय सामुद्रिक शास्त्र की एक विशिष्ट देन है।

“अंगुइयस्स मूले या तिपरिक्खित्ता समे जवे जस्स। सो होइ धणाइण्णो खत्तिय पुण पत्थिवो होइ॥”

कर-लक्षणं, गाथा २६

समुद्र ऋषि कहते हैं — अँगूठे के मूल में जिसके तीन समान यव (जौ के आकार के चिह्न) हों वह धनी होता है और यदि वह क्षत्रिय हो तो राजा बनता है। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संकेत है।

“दुप्परिक्खित्ताइ पुणो णरवइसमपुज्जिओ णरो होइ। एगपरिक्खित्ताए जवमालाए धणेसरो होइ॥”

कर-लक्षणं, गाथा २७

यदि दो यव हों तो पुरुष सैकड़ों नरेशों से पूजा जाता है, और यदि एक ही यवमाला की धारा हो तो वह पुरुष धनेश्वर (महाधनी) होता है। पण्डित ओझा ने भी इसकी पुष्टि की है। अँगूठे के बीच के यवों से मनुष्य धनी और अँगूठे के मूल के यवों से पुत्रवान होता है।

पाँच वर्षों के अनुभव में मैंने यह देखा है कि जिन जातकों के अँगूठे पर स्पष्ट यव-चिह्न होते हैं, उनमें एक विशेष प्रकार का सौभाग्य और परिश्रम-क्षमता होती है। यह चिह्न देखने के लिए अँगूठे को थोड़ा मोड़कर देखना होता है — जहाँ दोनों पर्व मिलते हैं वहाँ यव-माला दिखती है।

अँगूठे के प्रकार और उनसे व्यक्तित्व विश्लेषण

पण्डित ओझा ने और भारतीय तथा पाश्चात्य दोनों मतों के अनुसार अँगूठे के कई प्रकार बताए हैं।

लम्बा और सीधा अँगूठा: ऐसे अँगूठे वाले व्यक्ति तर्कशील, दृढ़ और नेतृत्वकारी होते हैं। वे अपनी बात पर अटल रहते हैं। इच्छाशक्ति असाधारण। जीवन में बड़े निर्णय लेने की क्षमता।

छोटा अँगूठा: छोटे अँगूठे वाले व्यक्ति भावनाओं से अधिक और तर्क से कम प्रेरित होते हैं। इच्छाशक्ति कम। दूसरों पर निर्भरता अधिक। यदि अँगूठा अत्यन्त छोटा हो तो आत्मविश्वास और दृढ़ता की कमी।

कठोर (stiff) अँगूठा: जो अँगूठा पीछे की ओर नहीं मुड़ता — ऐसे व्यक्ति अत्यन्त दृढ़, अनुशासित और कभी-कभी हठी होते हैं। ये अपनी बात से नहीं हटते। धन और संसाधनों को सँभालकर रखने में कुशल।

लचकदार (flexible) अँगूठा: जो अँगूठा आसानी से पीछे की ओर मुड़ जाये — ऐसे व्यक्ति उदार, अनुकूलनशील और दूसरों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण होते हैं। ये लोग परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेते हैं। परन्तु इनमें दृढ़ता की कमी हो सकती है और ये धन खर्च करने में उदार होते हैं।

अँगूठे का पहला पर्व (ऊपरी भाग — इच्छाशक्ति का पर्व): यदि पहला पर्व (नाखून वाला भाग) बड़ा और मजबूत हो तो इच्छाशक्ति प्रबल। यदि यह पर्व पतला और कमजोर हो तो इच्छाशक्ति दुर्बल।

अँगूठे का दूसरा पर्व (तर्क का पर्व): दूसरा पर्व (बीच का भाग) यदि पहले पर्व से बड़ा हो तो व्यक्ति में तर्कशक्ति इच्छाशक्ति से अधिक — वे किसी भी कार्य को करने से पहले बहुत सोचते हैं। यदि दोनों पर्व बराबर हों तो सन्तुलित व्यक्तित्व — एक आदर्श स्थिति।

अँगूठे के केदार और काकपद — कर-लक्षणं के विशेष संकेत

“अंगुइयस्स मज्झे केदारं जइ हविज्ज पुरिसस्स। सो होइ सोखभागी पावइ पुण खत्तिओ रज्जं॥”

कर-लक्षणं, गाथा ३२

समुद्र ऋषि कहते हैं — अँगूठे के मध्य में यदि केदार (खेत के आकार का चिह्न) हो तो वह पुरुष सुखभागी होता है और यदि वह क्षत्रिय हो तो राज्य पावे। केदार एक विशेष चिह्न है जो अँगूठे के मध्य भाग में कभी-कभी देखने को मिलता है।

“अंगुइयस्स मूले कागपयं होइ जस्स पुरिसस्स। सो पच्छिमम्मि काले सूलेण विवज्जए पुरिसो॥”

कर-लक्षणं, गाथा ३४

जिस पुरुष के अँगूठे के मूल में काकपद (कौए के पैर जैसा चिह्न) हो वह बुढ़ापे में शूली पाकर मरे — अर्थात् दुःखद मृत्यु। यह एक चेतावनी का चिह्न है जिसे देखकर सावधान रहना चाहिए।

कनिष्ठिका के नीचे की रेखाएँ — विवाह और सन्तान का संकेत

“काणंगुलीइ हिड्डे रेहाओ जस्स जत्तिआ हुंति। तत्तियमित्ता महिला महिलाण वि तत्तिआ पुरिसा॥”

कर-लक्षणं, गाथा ३६

समुद्र ऋषि ने एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात बताई है — कनिष्ठिका (छोटी उँगली) के नीचे जिसके जितनी रेखाएँ हों उस पुरुष की उतनी ही स्त्रियाँ होती हैं और स्त्रियों के उतने ही पति होते हैं। यह विवाह और सम्बन्धों का एक विशेष संकेत है। पाँच वर्षों के अनुभव में मैंने इसे अनेक बार सत्य पाया है — जिन जातकों की कनिष्ठिका के नीचे तीन-चार स्पष्ट रेखाएँ होती हैं उनके जीवन में कई महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध होते हैं।

नाखूनों का विस्तृत विश्लेषण

नाखूनों के विषय में पण्डित ओझा ने हस्त-रेखा-विज्ञान में विस्तार से लिखा है। नाखूनों से भाग्य-सम्बन्धी तथा स्वास्थ्य-सम्बन्धी बहुत सी बातों का पता लगता है।

गरुड़ पुराण में लिखा है कि जिनके हाथों के नाखून तुष की तरह होते हैं (अर्थात् पिलाई या पीलापन लिए हुए और जल्दी टूटने वाले) वे व्यक्ति नपुंसक होते हैं। जिनके नाखून टेढ़े और रेखायुक्त होते हैं वे दरिद्र होते हैं। जिनके नाखूनों पर धब्बे हों और देखने में अच्छे न हों वे दूसरों की सेवा करके अपना उदर-पोषण करते हैं।

गर्ग-संहिता में लिखा है कि जिनके नाखून एक वर्ण के न हों (कहीं लालाई अधिक, कहीं सफेदी अधिक, कहीं नीलापन या पीलापन), छाजले की तरह उँगलियों के अग्रभाग की ओर फैले हुए हों या सीप की आकार के हों या फटे हुए-से दिखाई दें या बहुत छोटे हों, वे दरिद्र होते हैं। इसके विपरीत जिनके नाखून निर्मल एवं लालाई लिए हुए हों वे भाग्यशाली होते हैं।

“मज्जुण्णया य सोणा अप्फुडिआ जस्स हुंति करणहरा। सो राया धणवंतो विज्जाहिवई पसिद्धो अ॥”

कर-लक्षणं, गाथा ४५

समुद्र ऋषि कहते हैं — जिसके हाथ के नख बीच में उठे हुए, लाल और अस्फुटित (बिना टूटे हुए) हों वह राजा, धनवान, विद्याधिपति और प्रसिद्ध होता है। वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में नखों के स्वरूप का फल इस प्रकार बताया है — जिनके नख तुष के समान (बहुत रेखायुक्त और रूखे) हों वे नपुंसक होते हैं। जिनके चपटे और फटे हों वे धनहीन। जिनके बुरे विवर्ण (आभारहित) हों वे परमुखापेक्षी। जिनके ताम्रवर्ण (तांबे के रंग के) हों वे सेनापति होते हैं।

नाखूनों से स्वास्थ्य का विश्लेषण — आधुनिक और शास्त्रीय दृष्टि

पण्डित ओझा ने नाखूनों से स्वास्थ्य का विश्लेषण करने की एक उत्तम विधि बताई है। सामुद्रिक-तिलक के अनुसार कच्छुए की पीठ की तरह कुछ ऊँचाई लिए हुए, मूँगे की तरह लाल, चिकने और चमकदार नाखून होना अच्छा है। उँगलियों का प्रथम पर्व जितना लम्बा हो उसकी आधी लम्बाई नाखूनों की होनी चाहिए।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भी नाखूनों से अनेक रोगों का निदान करना सम्भव बताया है। नीले नाखून — हृदय या फेफड़े की समस्या। पीले नाखून — यकृत की बीमारी या कवक संक्रमण। सफेद नाखून — रक्त की कमी या यकृत रोग। बहुत पतले और भंगुर नाखून — पोषण की कमी। नाखूनों पर सफेद धब्बे — जिंक की कमी। चम्मच जैसे अवतल नाखून — लौह की कमी। ये सब संकेत आधुनिक चिकित्सा से भी प्रमाणित हैं।

पाँच वर्षों के अनुभव में मैंने एक बात विशेष रूप से देखी है — जिन जातकों के नाखून अत्यन्त पतले और भंगुर होते हैं उनमें मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार की कमजोरी अक्सर पाई जाती है। और जिनके नाखून लाल, चमकदार और मजबूत होते हैं वे प्रायः स्वस्थ, ऊर्जावान और भाग्यशाली होते हैं।

स्त्रियों की उँगलियाँ — विशेष विचार

भविष्य-पुराण में स्त्रियों की उँगलियों के विषय में लिखा है कि जिसकी उँगलियाँ गोलाई लिए हुए, बराबर पर्व (पोरे) वाली, आगे से पतली, कोमल त्वचा वाली तथा गाँठ-रहित हों वह स्त्री सुख भोगती है। यहाँ पाँच गुण बताये गए हैं — गोलाई, समान पर्व, आगे से पतली, कोमल और गाँठ-रहित।

स्त्रियों के हाथ में भी कनिष्ठिका के नीचे की रेखाएँ पति की संख्या का संकेत देती हैं — कर-लक्षणं की गाथा ३७ में यह स्पष्ट है। इन रेखाओं की लम्बाई और स्पष्टता से विवाह-सम्बन्ध का बल और स्थायित्व भी जाना जाता है।

व्यावहारिक अभ्यास — उँगलियाँ कैसे देखें

इस अध्याय के अन्त में एक व्यावहारिक विधि बताता हूँ जो पाँच वर्षों के अनुभव में विकसित की है। जब किसी का हाथ देखें तो उँगलियों के विषय में निम्न क्रम में सोचें।

पहला — चारों उँगलियों की सापेक्ष लम्बाई देखें। कौन सी उँगली सबसे लम्बी है? यदि तर्जनी सबसे लम्बी हो तो नेतृत्व-प्रवृत्ति, यदि अनामिका सबसे लम्बी हो तो कला-प्रवृत्ति, यदि कनिष्ठिका असाधारण लम्बी हो तो व्यापार और संचार में प्रतिभा।

दूसरा — उँगलियों के अग्रभाग का आकार देखें — नुकीले, वर्गाकार या फैले हुए।

तीसरा — उँगलियों के पर्वों की जाँच करें — माँसल हैं या सूखे, गाँठें हैं या नहीं।

चौथा — अँगूठे का विशेष अध्ययन करें — लम्बाई, लचक, यव-चिह्न और दोनों पर्वों का अनुपात।

पाँचवाँ — नाखूनों का रंग, आकार और स्वास्थ्य की दृष्टि से विश्लेषण करें।

इन पाँच बिन्दुओं को मिलाकर जो चित्र उभरे उसे हाथ के सामान्य स्वरूप से मिलाएँ। तब जो निष्कर्ष आए वह अत्यन्त सटीक होगा। अपनी हस्त-रेखा और उँगलियों का सम्पूर्ण विश्लेषण करवाने के लिए WhatsApp पर परामर्श बुक करें। प्रामाणिक रत्न उपाय के लिए EffectiveGems.com से सम्पर्क करें।

अगले अध्याय की ओर

इस अध्याय में हमने उँगलियों के प्रकार, उनके पर्वों का फल, अँगूठे की विस्तृत विवेचना, यव-चिह्न और नाखूनों का विश्लेषण — सभी को कर-लक्षणं के शास्त्रोक्त श्लोकों, वराहमिहिर की बृहत्संहिता और पण्डित ओझा के हस्त-रेखा-विज्ञान के प्रकाश में समझा। अगले अध्याय में हम हाथ के ग्रह-क्षेत्रों (पर्वत या Mounts) का विस्तृत अध्ययन करेंगे — नौ ग्रह-क्षेत्र कौन से हैं, वे कहाँ होते हैं, उनकी उन्नति और अवनति से क्या जाना जाता है। यह अध्याय हस्त-रेखा विज्ञान का वह आधार है जिसके बिना रेखाओं का सही विश्लेषण सम्भव नहीं।

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