हस्त-रेखा विज्ञान में जब हम किसी का हाथ देखने बैठते हैं तो सबसे पहले रेखाओं की ओर नहीं जाना चाहिए। सबसे पहले हाथ के सामान्य स्वरूप को देखना चाहिए। यह नियम मैंने पण्डित गोपेशकुमार ओझा की “हस्त-रेखा-विज्ञान” से सीखा और पाँच वर्षों के अनुभव में बार-बार सत्य पाया। हाथ का आकार, उसकी त्वचा की कोमलता, उसका रंग, हथेली की गहराई — ये सब मिलकर एक ऐसी भाषा बोलते हैं जो रेखाओं से भी पहले और कभी-कभी रेखाओं से भी अधिक स्पष्ट होती है।
एक बार एक व्यापारी आए — भारी-भरकम शरीर, हाथ बड़ा और चौड़ा, हथेली मोटी और सख्त, उँगलियाँ छोटी और भारी। मैंने रेखाएँ देखने से पहले ही कहा — आप व्यापार में हैं, जमीन से जुड़े हैं, परिश्रमी हैं और व्यावहारिक हैं। वे चौंक गए — “आपने हाथ की लकीरें तो देखी ही नहीं, यह कैसे जाना?” मैंने कहा — हाथ का स्वरूप ही सब कह देता है। यही हस्त-रेखा विज्ञान की पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण पाठ है।
शास्त्र में हाथ के स्वरूप की महिमा
“वानरसदृशो हस्तो यस्य स भवेद् धनी। व्याघ्रसदृशो यस्य स भवेत् पापकर्मकृत्॥”
बृहत्संहिता, वराहमिहिर, अध्याय ६७, श्लोक ३७
वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में स्पष्ट कहा है — जिनके हाथ वानर (बन्दर) के समान हों वे धनी होते हैं और जिनके व्याघ्र (बाघ) के समान हों वे पापकर्मी होते हैं। यह तुलना प्रतीकात्मक है — वानर का हाथ लचकदार, सक्रिय और कुशल होता है जो धन अर्जन की क्षमता का सूचक है। व्याघ्र का हाथ आक्रामक और विनाशकारी।
“करतलमतिगभीरं यस्य तस्य पितृव्यसम्पत्। गभीरगुलाई धनिनो, दाताश्च उत्तानतलाः॥”
बृहत्संहिता, वराहमिहिर, अध्याय ६७, श्लोक ३९-४०
वराहमिहिर ने हथेली की गहराई के विषय में कहा है — जिनका तलुआ अतिगहरा हो वे पितृव्य-सम्पत्ति (पैतृक सम्पत्ति) से वञ्चित रहते हैं। जिनका तलुआ गहरा और गुलाई लिये हो वे धनी होते हैं। दानी होते हैं जिनका तलुआ ऊपर की ओर उठा हुआ हो। जिनका तलुआ विषम अर्थात् ऊँचा-नीचा हो वे निर्धन होते हैं।
हाथ देखने की सही विधि
पण्डित गोपेशकुमार ओझा ने “हस्त-रेखा-विज्ञान” में हाथ देखने की विधि के विषय में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण निर्देश दिये हैं जो मेरे अनुभव से भी पूर्णतः मेल खाते हैं।
सबसे पहले — किसी एक रेखा को देखकर फलादेश देने की चेष्टा मत करो। ओझा जी ने स्पष्ट कहा है — “जो लोग इस पुस्तक को कहीं से भी खोलकर किसी एक रेखा का फलादेश मिलाने की चेष्टा करेंगे उनका फलादेश बहुत से स्थानों में गलत हो जाएगा।” ज्योतिष-शास्त्र की भाँति हस्त-रेखा-विज्ञान में भी गुण-दोष की तुलना करना, किस गुण की ओर सब लक्षण झुकते हैं या दोषों की अधिकता है तो किस दोष का मार्जन (दूर होना) होता है — यह परमावश्यक है।
हाथ देखते समय निम्नलिखित सात बातों पर सदा ध्यान रखना चाहिए। पहली — दाहिने हाथ में रेखा कैसी है, बायें हाथ में कैसी। दूसरी — हाथ का आकार कैसा है, उँगलियाँ मोटी हैं या पतली, उँगलियों में गाँठें निकली हैं या नहीं, उँगलियों के अग्रभाग कैसे हैं — चौकोर, नुकीले या आगे की ओर फैले हुए तथा नाखून कैसे हैं। तीसरी — हाथ चुस्त है या ढीला, माँसल है या सूखा, हथेली का रंग कैसा है, लम्बी है या चौड़ी, हथेली का माँस सख्त है या मुलायम। चौथी — हाथों के ग्रह-क्षेत्र उन्नत हैं या अवनत, ग्रह-क्षेत्र अपने-अपने उचित स्थान पर हैं या कुछ सरके हुए हैं। पाँचवीं — हाथ में या उँगलियों पर कोई विशेष चिह्न हैं? यदि हैं तो किस स्थान पर तथा कितने चिह्न हैं। छठी — हाथ में जिस रेखा का विचार कर रहे हैं उस रेखा से मिलते-जुलते हाथ में अन्य लक्षण हैं या उनसे विरुद्ध। सातवीं — शरीर तथा मुखाकृति से क्या परिणाम निकलता है।
यह सात-बिन्दु विधि मैं अपने प्रत्येक परामर्श सत्र में उपयोग करता हूँ। जब इन सातों बातों का एकसाथ आकलन होता है तो फलादेश की सटीकता बहुत बढ़ जाती है।
हाथ के सात प्रकार — पण्डित ओझा के अनुसार
पण्डित गोपेशकुमार ओझा ने “हस्त-रेखा-विज्ञान” में हाथों को सात वर्गों में विभाजित किया है। यह वर्गीकरण पाश्चात्य palmistry से लिया गया है परन्तु भारतीय सन्दर्भ में व्याख्यायित किया गया है। आइए इन सातों प्रकारों को विस्तार से समझते हैं।
प्रथम — सबसे निम्न श्रेणी का हाथ (पाशविक हाथ): यह हाथ बेढंगा, अपरिष्कृत और गँवारू होता है। हाथ की जिल्द मोटी और खुरदरी होती है। हथेली बहुत मोटी और भारी होती है। उँगलियाँ छोटी होती हैं और नाखून भी छोटे होते हैं। ऐसे लोग जानवर की तरह खाते-पीते हैं, परिश्रम करते हैं, सोते हैं, लड़ते हैं, विषय-वासना में प्रवृत्त होते हैं। उनमें कोई नफासत या सौन्दर्यप्रियता नहीं होती। क्रोध के आवेश में ये लोग हत्या तक कर बैठते हैं। अँगूठा बहुत छोटा और मोटा होता है। ऐसे व्यक्तियों में आत्मबल या साहस नहीं होता। पाँच वर्षों के अनुभव में मैंने ऐसे हाथ बहुत कम देखे हैं — आधुनिक शिक्षा के क्रमिक विस्तार के कारण बिल्कुल पाशवृत्ति का उपर्युक्त लक्षणयुक्त हाथ अब कम देखने को मिलता है।
द्वितीय — वर्गाकार हाथ (उपयोगी हाथ): उपयोगिता की दृष्टि से इस प्रकार का हाथ सर्वप्रथम कोटि का होता है। ऐसे व्यक्तियों में रजोगुण प्रधान होता है। वर्गाकार हाथ की विशेषता यह होती है कि कलाई से मध्यमा (बीच की उँगली) तक हाथ की लम्बाई होती है, हथेली जितनी लम्बी हो प्रायः उतनी ही चौड़ी और उँगलियों के अग्रभाग भी समचतुष्कोणाकृति या वर्गाकृति हों। ऐसे हाथों में नाखून भी प्रायः छोटे और वर्गाकार होते हैं। ऐसे हाथ वाले व्यक्ति कार्यकुशल होते हैं। ये लोग तरतीब वाले, समय के पाबन्द, ठीक-ठीक उचित रीति से कार्य करने वाले होते हैं। ये लोग कानून तोड़ना पसन्द नहीं करते और अधिकारी-वर्ग का सम्मान करते हैं। इनमें प्रत्येक वात का आगा-पीछा सोचकर कार्य करने की प्रवृत्ति होती है। कृषि, व्यापार आदि कार्यों में सफल होते हैं।
तृतीय — आगे से फैला हुआ हाथ (क्रियाशील हाथ): ऐसे व्यक्तियों में क्रियाशीलता अधिक होती है। वे परिश्रमी व कार्य करने वाले होते हैं, साथ ही उनका स्नायु-मण्डल भी बहुत “चल” (अस्थिर-क्रियान्वित) होता है। इनमें रजोगुण प्रधान होता है। इनके हाथ की हथेली जहाँ से उँगलियाँ प्रारम्भ होती हैं वह भाग कुछ चौड़ा होता है और उँगलियों के अग्रभाग आगे की ओर फैले हुए होते हैं। पाँच वर्षों के अनुभव में मैंने ऐसे हाथ वाले जातकों में एक विशेष बात देखी है — ये लोग बहुत जल्दी निर्णय लेते हैं, रुक कर सोचते नहीं, और इसी कारण कभी-कभी जल्दबाजी में गलतियाँ भी करते हैं।
चतुर्थ — दार्शनिक हाथ (विचारक हाथ): इन हाथों की उँगलियों में गाँठें निकली रहती हैं। ये लोग उच्च कोटि के विचारक होते हैं। इनमें सत्वगुण-प्रधान रजोगुण का मिश्रण होता है। उँगलियों में गाँठें निकला होना “विचारक” होने की प्रवृत्ति प्रकट करता है। प्रत्येक बात का विश्लेषण करना इनका स्वभाव होता है। उँगलियों के अग्रभाग चतुष्कोणाकृति या वर्गाकृति के होने से धैर्य और अध्यवसाय तथा कुछ नुकीले होने से आत्म-त्याग की भावना रहती है।
पंचम — आगे से कुछ नुकीला हाथ (कलाकार हाथ): ऐसा हाथ प्रायः मँझोले (न बहुत बड़ा न छोटा) आकार का होता है। हथेली आगे की ओर से कुछ कम चौड़ी होती है। उँगलियाँ जहाँ हथेली से प्रारम्भ होती हैं पुष्ट होती हैं किन्तु नाखूनों तक पहुँचते-पहुँचते कुछ नुकीली हो जाती हैं। ऐसे व्यक्तियों में इच्छाशक्ति और मन की सूझ की प्रधानता होती है। कलात्मक भावना, चित्त का आवेश, इच्छा की प्रधानता होती है। ये लोग आरामपसन्द, विलासी और आलसी होते हैं। ये लोग चतुर होते हैं और तुरन्त ही मन में उमंग आते ही काम कर डालते हैं और वे काम लाभप्रद भी हो सकते हैं। परन्तु ऐसे लोगों में धैर्य और अध्यवसाय की कमी होती है।
षष्ठ — शान्तिनिष्ठ हाथ (आध्यात्मिक हाथ): शान्त प्रकृति के लोगों का हाथ लम्बा, पतला और कोमल होता है। यह देखने में अत्यन्त सुकुमार और सुन्दर होता है। हाथों की उँगलियाँ भी लम्बी, पतली, आगे से नुकीली व सुन्दर होती हैं। नाखून भी लम्बे, बादाम की आकार के मनोहर होते हैं। इन हाथों की अत्यन्त सुन्दरता और सुकुमारता से ही पता चलता है कि ये लोग परिश्रम करने में बिलकुल अक्षम होते हैं। ये लोग सौन्दर्यप्रिय, सुशील, नम्र और शान्त होते हैं। धार्मिक भावना की प्रधानता होती है। परन्तु परिश्रमशीलता, सांसारिक चतुरता या व्यावहारिकता न होने के कारण ये कोई काम सम्पादन नहीं कर सकते।
सप्तम — मिश्रित हाथ: जिसमें उपर्युक्त छः प्रकार के हाथों के लक्षणों में से कई मिश्रित रहते हैं। ईश्वर की सृष्टि में हाथ इन छः प्रकार के साँचों में ढाल कर नहीं बनाये जाते कि फौरन यह कह दिया जावे कि वह अमुक साँचे में ढला हुआ है। बहुत-से हाथ ऐसे होते हैं जिनमें कुछ लक्षण किसी के और कुछ किसी के दिखाई देते हैं। ऐसे हाथ वाले व्यक्ति अनेक गुणों से युक्त होते हैं, परन्तु बहुगुण होने के कारण कुछ-कुछ बुद्धि और समय भिन्न-भिन्न बातों में लगने से किसी एक बात की खूबी उनमें नहीं आ पाती। यदि ऐसे हाथ में शीर्ष-रेखा बलवान् हो तो ऐसा व्यक्ति किसी ऐसे कार्य में अपनी बुद्धि लगाएगा जिसमें उसकी योगता विशेष हो और उस कार्य में उसके अन्य गुण सहायक होंगे।
हाथ का आकार — लम्बा, चौड़ा और उँगलियों का अनुपात
हाथ के आकार के विषय में एक महत्त्वपूर्ण सत्य यह है कि लम्बे आदमियों के हाथ लम्बे हों और छोटे आदमियों के छोटे — यह नियम नहीं है। यदि आप एक ही लम्बाई के ८-१० व्यक्तियों के हाथ नापें तो पता चलेगा कि किन्हीं के हाथ अपेक्षाकृत लम्बे हैं किन्हीं के छोटे। इसी प्रकार एक ही लम्बाई के हाथों में भी आप भिन्नता पायेंगे — कुछ की हथेली लम्बी, उँगलियाँ छोटी होंगी और दूसरों की हथेली छोटी, उँगलियाँ लम्बी।
कलाई से मध्यमा (बीच की उँगली) तक हाथ की लम्बाई होती है। इसी में हथेली की लम्बाई और उँगलियों की लम्बाई शामिल है। पण्डित ओझा ने बताया है — यदि हथेली की तुलना में उँगलियाँ लम्बी हों तो विशेष बौद्धिक विकास का संकेत है। यदि उँगलियाँ छोटी हों तो हथेली के सापेक्ष पाशवृत्ति विशेष होगी।
पाँच वर्षों के अनुभव में मैंने एक रोचक बात देखी है — जिन जातकों की उँगलियाँ हथेली की तुलना में बहुत लम्बी होती हैं वे अक्सर अतिसंवेदनशील होते हैं। और जिनकी हथेली उँगलियों की तुलना में बड़ी होती है वे व्यावहारिक और कर्मठ होते हैं।
हाथ की त्वचा — कोमलता, सख्ती और रंग
हाथ की त्वचा के विषय में वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में कहा है —
“चिकणाश्च गभीराश्च रेखा धनिनां भवन्ति। विपरीताश्च दरिद्राणाम्।”
बृहत्संहिता, वराहमिहिर, अध्याय ६७, श्लोक ४३
अर्थात् — चिकनी और गहरी रेखाएँ धनी पुरुषों की होती हैं तथा इससे विपरीत (रूखी और उथली) निर्धनों की होती हैं। यह केवल रेखाओं के विषय में नहीं, त्वचा के विषय में भी यही नियम लागू होता है।
हाथ की त्वचा के आधार पर जातक का स्वभाव और जीवन-शैली बहुत कुछ जानी जा सकती है। कोमल और मुलायम त्वचा वाले व्यक्ति प्रायः संवेदनशील, कलाप्रिय और सुख-सुविधाओं के प्रेमी होते हैं। सख्त और खुरदरी त्वचा वाले परिश्रमी, व्यावहारिक और कठिन परिस्थितियों के आदी होते हैं। जो हाथ चर्बी या माँस से परिपूर्ण होते हैं वे भोग-विलास के प्रेमी होते हैं। जो हाथ बिल्कुल सूखे और हड्डियाँ उभरी हुई हों वे परिश्रमी परन्तु स्वास्थ्य की दृष्टि से सावधानी आवश्यक है।
पण्डित ओझा ने बताया है कि जो हाथ फैले-फूटे हों, जिनके गुल्म खूब गठे हुए हों, उँगलियाँ विरली और विषमपर्व हों, जो बहुत माँसवाले न हों और जिनका तलुआ कड़ा हो, वे हाथ दूसरों के कार्य करनेवाले (परोपकारी या नौकरी करनेवाले) होते हैं।
हाथ का रंग और उससे फल
हाथ के रंग के विषय में वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में विस्तृत विवरण दिया है —
“लालः करतलो यस्य स भवति धनेश्वरः। पीतः परस्त्रीरतः स्यात्। रूक्षो निर्धनः।”
बृहत्संहिता, वराहमिहिर, अध्याय ६७, श्लोक ३९-४०
वराहमिहिर के अनुसार — जिनका करतल (हथेली) लाल हो वे धनीश्वर (धनी) होते हैं। जिनका पीला हो वे व्यभिचारी होते हैं। तथा जिनका रूखा हो वे निर्धन होते हैं।
पण्डित ओझा ने हाथ के रंग के विभिन्न प्रकारों का विस्तृत विश्लेषण किया है। लाल या गुलाबी हथेली — स्वास्थ्य, ऊर्जा और सकारात्मकता का संकेत। अत्यन्त लाल हथेली — उग्र स्वभाव और क्रोधी प्रवृत्ति। पीली हथेली — यकृत की समस्या या पित्त-प्रकृति। नीलाभ या बैंगनी रंग — रक्त परिसंचरण की समस्या। अत्यन्त पीली और सफेद हथेली — रक्त की कमी। कर-लक्षणं में समुद्र ऋषि ने भी रेखाओं के रंग के विषय में कहा है —
“महुपिंगलाहिं सुहिआ अविणड्डवया हवंति रत्ताहिं। सुहमाहिं मेहावी सुभगा य समत्तमूलाहिं॥”
कर-लक्षणं, गाथा ८
समुद्र ऋषि कहते हैं — यदि रेखाओं का रंग मधु (शहद) के समान पिंगल (लालकथ्था रंग) का हो तो पुरुष सुखी होते हैं। यदि रक्त के समान लाल हो तो उनका कभी व्रत भंग नहीं होता। यदि सूक्ष्म हो तो वे बुद्धिमान होते हैं। तथा यदि उनका मूल सम हो तो वे सुभग अर्थात् सुरूपवान और भाग्यवान होते हैं।
हथेली की गहराई — सम्पत्ति और दारिद्र्य का संकेत
हथेली की गहराई के विषय में वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में जो कहा है वह अत्यन्त व्यावहारिक और मैंने इसे अनेक हाथों में सत्य पाया है। जिनका तलुआ गहरा हो (अर्थात् हथेली के मध्य में एक स्वाभाविक गड्ढा हो) और वह गुलाई लिये हो वे धनी होते हैं। जिनका तलुआ ऊपर को उठा हुआ हो वे दानी होते हैं। जिनका तलुआ विषम अर्थात् ऊँचा-नीचा हो वे निर्धन होते हैं।
पाँच वर्षों के अनुभव में मैंने देखा है कि गहरी और गुलाई वाली हथेली वाले जातक धन संचय में कुशल होते हैं — वे जो भी आय होती है उसका एक भाग अवश्य बचाते हैं। इसके विपरीत जिनकी हथेली उठी हुई या सपाट होती है वे दानी तो होते हैं परन्तु धन-संचय में कमजोर।
हाथ की कठोरता और कोमलता
हाथ चुस्त है या ढीला — यह भी एक महत्त्वपूर्ण संकेत है। जो हाथ हाथ मिलाते समय दृढ़ और चुस्त महसूस हो वह व्यक्ति दृढ़ संकल्प, परिश्रमी और जीवन में सक्रिय है। जो हाथ ढीला और बेजान महसूस हो वह व्यक्ति आलसी, निर्बल इच्छाशक्ति वाला और परावलम्बी हो सकता है।
हाथ के मांस के विषय में पण्डित ओझा ने बताया है — जो हाथ फैले-फूटे हों, जिनके गुल्म खूब गठे हुए हों — वे दूसरों के कार्य करने वाले (सेवाभावी) होते हैं। माँसल और भारी हाथ भोग-प्रवृत्ति के सूचक हैं। पतले और सूखे हाथ परिश्रम और तपस्या के।
हाथ देखने का उचित समय और वातावरण
पण्डित ओझा ने एक अत्यन्त व्यावहारिक बात बताई है जो मेरे अनुभव से भी पूर्णतः मेल खाती है — हाथ देखने के लिए उचित समय और वातावरण होना आवश्यक है। जब हाथ देखते-देखते पर्याप्त अभ्यास हो जाय तब शुद्ध तथा शान्त चित्त से ऐसे स्थान में हाथ देखना चाहिए जहाँ अनेक लोगों की भीड़ न हो, कोलाहल न हो।
शास्त्रों में यह भी लिखा है कि सभा में, विद्वानों के बीच या मूर्खों की मण्डली में हाथ न देखें — इसका कारण यह है कि मूर्खों के बीच में उपहास का भय होता है। जो जातक हस्त-परीक्षक से विवाद या बहस करे, बिना आवश्यकता के बीच-बीच में बात कर विघ्न डालता जावे, अभिमानी हो — उसका हाथ न देखें।
हस्तपरीक्षा कराने वाले को उचित है कि शान्त चित्त हो, फल-फूल या द्रव्य भेंट कर हस्त-परीक्षक को नमस्कार कर विनीत भाव से शुभाशुभ पूछें। यह नियम आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
स्त्री और पुरुष के हाथ में अन्तर
कर-लक्षणं में समुद्र ऋषि ने स्त्री और पुरुष के हाथ देखने की विधि के विषय में जो कहा है वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। पुरुषों के लक्षण दाहिने हाथ की तथा स्त्रियों के बायें हाथ की रेखाओं से जाने जाते हैं। परन्तु दोनों हाथों की तुलना करना आवश्यक है।
पुरुषों के हाथ की तुलना में स्त्रियों के हाथ प्रायः कोमल, पतली उँगलियों वाले और सुकुमार होते हैं। भविष्य पुराण में लिखा है कि जिसकी उँगलियाँ गोलाई लिए हुए, बराबर पर्व (पोरे) वाली, आगे से पतली, कोमल त्वचा वाली तथा गाँठ-रहित हों वह स्त्री सुख भोगती है।
पाँच वर्षों के अनुभव से — हाथ देखने की व्यावहारिक सीख
पाँच वर्षों में हजारों हाथ देखने के बाद कुछ व्यावहारिक निष्कर्ष निकाले हैं जो शास्त्रों से भी पुष्ट होते हैं और अनुभव से भी।
पहला — हाथ का प्रथम दृश्य बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। जब कोई अपना हाथ फैलाकर देता है तो उस क्षण हाथ का जो सामान्य स्वरूप दिखता है वह बहुत कुछ बता देता है। रेखाएँ देखने से पहले इस सामान्य स्वरूप को एक मिनट ध्यान से देखें।
दूसरा — हाथ की तुलना चेहरे से करें। जिसका चेहरा जैसा होता है उसके हाथ में भी उसी प्रकार की विशेषताएँ होती हैं। उग्र चेहरे वाले का हाथ भी प्रायः उग्र लक्षणों वाला होता है। सौम्य चेहरे वाले का हाथ कोमल।
तीसरा — हाथ मिलाते समय जो अनुभव होता है वह भी एक महत्त्वपूर्ण संकेत है। दृढ़ और ऊर्जावान हाथ मिलाने वाला व्यक्ति प्रायः दृढ़ संकल्प वाला होता है। ढीले और बेजान तरीके से हाथ मिलाने वाला व्यक्ति प्रायः कमजोर इच्छाशक्ति वाला।
चौथा — जब हाथ स्वाभाविक रूप से खुला हो (जबरदस्ती फैलाया हुआ नहीं) तब रेखाएँ सबसे स्पष्ट दिखती हैं। और सबसे सही विश्लेषण तब होता है जब जातक का मन शान्त और खुला हो।
पाँचवाँ — हाथ के स्वरूप से व्यवसाय का अनुमान लगाना सीखें। जिनके हाथ में श्रम के चिह्न हों, हथेली सख्त और उँगलियाँ मोटी — वे शारीरिक परिश्रम का कार्य करते हैं। जिनके हाथ मुलायम, उँगलियाँ पतली और नाखून सुन्दर — वे मानसिक या कलात्मक कार्य करते हैं।
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अगले अध्याय की ओर
इस अध्याय में हमने हाथ के सामान्य स्वरूप को विस्तार से समझा — हाथ के सात प्रकार, हथेली की गहराई और रंग, त्वचा की कोमलता और सख्ती, तथा हाथ देखने की सही विधि। ये सब बातें वराहमिहिर की बृहत्संहिता, समुद्र ऋषि के कर-लक्षणं और पण्डित गोपेशकुमार ओझा के हस्त-रेखा-विज्ञान तीनों से समन्वित हैं। अगले अध्याय में हम हाथ की उँगलियों का विस्तृत अध्ययन करेंगे — उँगलियों के प्रकार, उनके पर्व (पोरे), उनके बीच का अन्तर, और उँगलियों से क्या-क्या जाना जा सकता है। इस विषय में कर-लक्षणं में समुद्र ऋषि ने बहुत विस्तार से लिखा है और पण्डित ओझा ने भी।


