अध्याय १.८ — हृदय-रेखा (आयु-रेखा/कुल-रेखा) | प्रेम, भावना, हृदय-रोग और आयु-परिज्ञान | हस्त-रेखा-विज्ञान

हृदय-रेखा — जिसे भारतीय सामुद्रिक शास्त्र में “आयु-रेखा” या “कुल-रेखा” कहा गया है — प्रेम, भावनाओं, हृदय के स्वास्थ्य और परिवार-सम्बन्धों की गहराई का सबसे प्रत्यक्ष संकेत देती है। ‘गरुड़-पुराण’, ‘भविष्य-पुराण’, ‘स्कान्द शारीरिक’, ‘विवेक-विलास’ आदि ग्रन्थों में तथा समुद्र ऋषि, वराहमिहिर आदि आचार्यों की कृतियों में इस रेखा को आयु-निर्णय करने में बहुत महत्त्व दिया गया है — इसीलिए इसका नाम “आयु-रेखा” रखा गया।

पाँच वर्षों के सामुद्रिक परामर्श में मैंने देखा है कि हृदय-रेखा किसी व्यक्ति के भावनात्मक जीवन का सबसे ईमानदार दर्पण है। एक जातक आए जो बाहर से बहुत व्यावहारिक और ठण्डे स्वभाव के दिखते थे — परिवार वाले कहते थे इन्हें किसी से प्रेम नहीं। परन्तु जब उनकी हृदय-रेखा देखी तो वह अत्यन्त गहरी, लम्बी और गुरु-क्षेत्र के भीतर तक जाती थी। मैंने कहा — आप बाहर से कठोर दिखते हैं परन्तु भीतर से असाधारण रूप से प्रेमपूर्ण हैं, बस अपनी भावनाएँ व्यक्त नहीं कर पाते। उनकी आँखें भर आईं — “आपने वही कहा जो मैं खुद महसूस करता हूँ।” यही हस्त-रेखा विज्ञान की शक्ति है।

शास्त्र में हृदय-रेखा (कुल-रेखा) का परिचय

“मणिबंधाओ पयडा पएसिणी जाव जाइ जस रेहा। बहुबंधुसमाइण्णं कुलवंसं णिहिदे तस्स॥”

कर-लक्षणं, गाथा १४ (समुद्र ऋषि)

समुद्र ऋषि ने कुल-रेखा के विषय में कहा है — मणिबन्ध से प्रकट होकर जो रेखा प्रदेशिनी (तर्जनी) तक जाती है वह पुरुष का बहुत से बन्धुओं से समाकीर्ण कुलवंश निर्देशित करती है। परिवार, वंश और कुल की शक्ति का संकेत।

“दीहाइ जाण दीहं कुलवंश मडिहअं मडिहआए। बुच्छिण्णाए छिण्णं जाणसु भिण्णं च भिण्णाए॥”

कर-लक्षणं, गाथा १५ (समुद्र ऋषि)

यदि यह रेखा दीर्घ हो तो कुल और वंश भी दीर्घ। यदि छोटी हो तो कुल ओछा। यदि छिन्न हो तो कुलवंश विनष्ट। यदि भिन्न हो तो विभाजित जानो। रेखा की लम्बाई और अखण्डता कुल की शक्ति बताती है। इसके अतिरिक्त ‘प्रयोग पारिजात’ में समुद्र ऋषि ने लिखा है कि कनिष्ठिका उँगली के नीचे से रेखा निकलकर जो मध्यमा (बीच की) उँगली के तृतीय-पर्व मूल तक जावे और ‘अविच्छिन्न’ (टूटी-फूटी या कटी न हो) तो मनुष्य ८० वर्ष जीता है।

हृदय-रेखा (Heart Line) — हस्त-रेखा विज्ञान
हृदय-रेखा (Heart Line / कुल-रेखा / आयु-रेखा) — कनिष्ठिका के नीचे से तर्जनी की ओर जाने वाली रेखा। जीवन-रेखा और मस्तिष्क-रेखा के साथ मिलकर हाथ की मुख्य त्रयी बनाती है।

हृदय-रेखा की स्थिति और दिशा

हृदय-रेखा हथेली के ऊपरी भाग में उँगलियों के ठीक नीचे स्थित होती है। यह प्रायः कनिष्ठिका (छोटी उँगली) के नीचे बुध-क्षेत्र से प्रारम्भ होती है और तर्जनी (गुरु-क्षेत्र) की ओर जाती है।

यदि हृदय-रेखा बृहस्पति या शनि-क्षेत्र के नीचे से प्रारम्भ हो, सीधी या कुछ गोलाई लिये हो और हथेली के अन्त तक जावे तो यह स्वाभाविक स्थिति समझनी चाहिए। यदि बृहस्पति-क्षेत्र के अन्दर से प्रारम्भ हो तो भी सामान्यतः अच्छी है। परन्तु यदि इसकी स्थिति अपने सामान्य स्थान से नीचीह हो तो ऐसा व्यक्ति बहुत प्रेम करने वाला नहीं होता — उसके हृदय में संयम तथा कठोरता होती है और स्वार्थपरता भी। यदि मनुष्य का हाथ अच्छा हो (अर्थात् हाथ की माँसलता, वर्ण, आकार, उँगलियों का गठन अच्छा हो) तो इस प्रकार की हृदय-रेखा वाले मनुष्यों के हृदय में प्रेम तो होगा परन्तु अपने संयम के कारण वे इसका प्रदर्शन नहीं करेंगे। इसके विपरीत यदि एक निकृष्ट कोटि के हाथ में हृदय-रेखा अपने सामान्य स्थान से अधिक नीची हो तो ऐसा व्यक्ति कठोर प्रकृति का, लालची तथा धोखा देने की प्रवृत्ति वाला होगा।

यदि हृदय-रेखा बहुत ऊँची हो अर्थात् उँगलियाँ जहाँ हथेली से प्रारम्भ होती हैं उस स्थान के बहुत समीप हो तो ऐसे व्यक्ति बहुत उग्र रूप से प्रेम करने वाले होते हैं।

हृदय-रेखा की लम्बाई और प्रेम-स्वभाव

हृदय-रेखा की लम्बाई और उसके समाप्ति-स्थान से जातक के प्रेम-स्वभाव का अत्यन्त सटीक विश्लेषण होता है।

गुरु-क्षेत्र के भीतर तक जाने वाली हृदय-रेखा: हृदय-रेखा जितनी लम्बी हो और बृहस्पति के क्षेत्र में जितने भीतर से प्रारम्भ हो उतना ही अधिक प्रेम करने वाला व्यक्ति होगा। बृहस्पति के क्षेत्र के अन्दर से हृदय-रेखा प्रारम्भ होने के कारण ऐसे व्यक्तियों के प्रेम में आदर्श-रक्षा का भाव भी होता है। उनके प्रेम में तीव्रता विशेष होने के कारण उनमें डाह या ईर्ष्या की मात्रा भी साधारण से अधिक होती है। किन्तु यदि यही रेखा बृहस्पति-क्षेत्र के मध्य से प्रारम्भ हो और प्रारम्भ में एक ही शाखा हो तो भी गम्भीर और दृढ़ प्रेम-प्रकृति का जातक होता है। ऐसे व्यक्तियों में प्रेमाधिक्य और आदर्शवाद दोनों समान रूप से रहते हैं।

शनि-क्षेत्र तक समाप्त होने वाली: प्रेम में व्यावहारिकता अधिक। भावनाएँ होती हैं परन्तु तर्क से नियन्त्रित। व्यापार और साझेदारी में विश्वसनीय। गुरु और शनि के बीच: यह सर्वोत्तम स्थिति है — भावनाएँ और व्यावहारिकता का उत्तम संयोग। यदि हृदय-रेखा गुरु-क्षेत्र और शनि-क्षेत्र के बीच के भाग से प्रारम्भ हो: स्थिर प्रेम — न बहुत तूफान में बहते हैं, न किसी किनारे ही बैठे रहते हैं। उनके प्रेम में विशेष उल्लास और तन्मयता नहीं होती, न निराशा और विरह उन्हें अधिक पीड़ित करते हैं।

पाँच वर्षों के अनुभव में ऐसी हृदय-रेखा वाले जातकों का वैवाहिक जीवन सबसे सुखी और स्थिर देखा है। तर्जनी और मध्यमा के बीच से प्रारम्भ: आजीवन कठिन परिश्रम करने वाला होता है। कठिनाइयों का सामना करने में ही उसका जीवन जाता है। प्रेम की भावना हृदय में दबी रहती है।

हृदय-रेखा की गहराई, रंग और बनावट

हृदय-रेखा के विभिन्न प्रकार — श्रृंखलाकार, टूटी, गहरी
हृदय-रेखा के प्रकार — गहरी और सीधी (कठोर स्वभाव), श्रृंखलाकार (भावनात्मक अस्थिरता), टूटी (प्रेम में आघात या हृदय-रोग)

पण्डित गोपेशकुमार ओझा ने हृदय-रेखा की गहराई और रंग के विषय में महत्त्वपूर्ण नियम बताए हैं।

गहरी और लाल रेखा — एक डण्डे जैसी: यदि हृदय-रेखा एक डण्डे की भाँति सारी हथेली पर आर-पार हो और शीर्ष-रेखा भी ऐसी ही हो, तथा दोनों रेखाएँ गहरी और लाल हों एवं मंगल-क्षेत्र बहुत उन्नत हो तो ऐसा व्यक्ति हिंसक होता है और दूसरे के प्राण भी ले सकता है। यह गम्भीर चेतावनी का चिह्न है।

पतली और लम्बी: यदि यह रेखा पतली और लम्बी हो तो हृदय की क्रूरता व हिंसात्मक प्रवृत्ति प्रकट होती है। शीर्ष-रेखा के प्रसंग में हम कह आये हैं कि रेखा का पतला और लम्बा होना गुण है किन्तु हृदय-रेखा का पतला होना गुण नहीं है।

क्षीण और असुन्दर: यदि हृदय-रेखा क्षीण और असुन्दर हो (अर्थात् छोटी, बहुत पतली तथा अस्पष्ट हो) और अन्त तक (जहाँ बुध-क्षेत्र की वायीं ओर यह समाप्त होती है) इसमें से कोई शखाएँ न निकलें तो ऐसे व्यक्तियों की सन्तानोत्पादन-शक्ति कम होती है।

श्रृंखलाकार हृदय-रेखा: यदि हृदय-रेखा श्रृंखलाकार हो तो समझिए हृदय अपना काम अच्छी तरह नहीं कर रहा है — अनुचित प्रेम-सम्बन्ध की प्रवृत्ति रहती है। यदि यह रेखा पीली, चौड़ी तथा श्रृंखलाकार हो तो ऐसा व्यक्ति दुष्टतापूर्वक भी अपनी अभिलाषा-पूर्ति में नहीं हिचकता। सुन्दर हृदय-रेखा पारस्परिक आकर्षण द्वारा प्रेम उत्पन्न करती है — परन्तु इस प्रकार की दोषयुक्त हृदय-रेखा नीच वृत्ति प्रकट करती है।

श्रृंखलाकार और बीच में शनि-क्षेत्र की ओर भुकी: यदि हृदय-रेखा श्रृंखलाकार हो और बीच में शनि-क्षेत्र की ओर भुकी हुई हो तो ऐसे पुरुषों को स्त्रियों की, तथा स्त्रियों को पुरुषों की कोई परवाह नहीं रहती। यदि हाथ के अन्य लक्षण अच्छे हों तो यह प्रकट करते हैं कि एकान्तवास की भावना प्रबल होने के कारण ऐसे व्यक्ति सामाजिक सुख की ओर प्रवृत्त नहीं होते।

हृदय-रेखा का न होना: यदि हाथ में हृदय-रेखा न हो तो समझना चाहिए कि ऐसे व्यक्ति में भावुकता तथा अनुराग या प्रेम करने की प्रवृत्ति बहुत कम है। ऐसे व्यक्ति प्रायः लोभी तथा स्वार्थी होते हैं और यदि उनके हाथ में मंगल का प्रथम क्षेत्र भी उन्नत और विस्तृत हो तो ‘क्रूरता’ भी समभनी चाहिये।

हृदय-रेखा से हृदय-रोग का परिज्ञान

पण्डित ओझा ने एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण चिकित्सकीय बात लिखी है — बहुत से मनुष्यों का हृदय ठीक काम नहीं करता। इस कारण शरीर में रक्त-प्रसार ठीक प्रकार नहीं हो पाता और जातक बीमार हो जाता है। चाहे डाक्टर “हृदय-रोग” न कहें किन्तु मूल कारण हृदय होता है। यदि कोई लहरदार रेखा चन्द्र-क्षेत्र से चलकर हृदय-रेखा पर आ मिले तो ऐसा व्यक्ति हिंसात्मक प्रवृत्ति का होता है। किन्तु यदि चन्द्र-क्षेत्र से दो सीधी समानान्तर रेखाएँ हृदय-रेखाओं पर आएँ तो ‘Apoplexy’ से मृत्यु होती है।

यदि शीर्ष-रेखा पर सूर्य-क्षेत्र के नीचे बिन्दु-चिह्न हो तो नेत्र-विकार का भय। यदि हृदय-रेखा द्वीपयुक्त या अन्य दोषयुक्त हो तो हृदय-रोग होता है। यदि जीवन-रेखा से कोई रेखाएँ निकलकर हृदय-रेखा पर आवें तो हृदय-रोग के कारण या प्रेम के परिणामस्वरूप निराशा के कारण रोग की द्योतक हैं। पाँच वर्षों के अनुभव में हृदय-रेखा और हृदय-स्वास्थ्य के इस सम्बन्ध को मैंने कई बार सत्य पाया है।

हृदय-रेखा की शाखाएँ — प्रेम और सन्तान का संकेत

हृदय-रेखा की शाखाएँ — प्रेम-सम्बन्धों का संकेत
हृदय-रेखा की शाखाएँ — ऊपर की ओर = प्रेम की सरसता, नीचे की ओर = दुःख और निराशा

हृदय-रेखा की शाखाओं से प्रेम-जीवन और सन्तान के विषय में विस्तृत जानकारी मिलती है।

ऊपर की ओर शाखाएँ: यदि हृदय-रेखा से शाखाएँ निकलकर ऊपर की ओर (उँगलियों की ओर) न जावें तो हृदय की शुष्कता और नीरसता प्रकट होती है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में प्रेमजनित सरसता नहीं आती। नीचे की ओर शाखाएँ: यदि हृदय-रेखा से शाखाएँ निकलकर नीचे की ओर (शीर्ष-रेखा की ओर) जावें तो यह प्रकट करती हैं कि जातक जिनको प्रेम करता है वे बदले में इसको प्रेम नहीं करते। इस कारण इसके हृदय में दुःख और निराशा उत्पन्न हुई या होगी।

हृदय-रेखा पर कई बिल्कुल सीधी (लम्ब) रेखाएँ नीचे की ओर: यदि सूर्य-क्षेत्र के नीचे हों तो ऐसा जातक अनेक विद्याओं में प्रवीण होता है किन्तु इसकी विद्वत्ता के अनुरूप इसे लाभ नहीं होता। यदि अन्य क्षेत्रों के नीचे हृदय-रेखा पर शीर्ष-रेखा की ओर जाने वाली, लम्बी रेखाएँ हों तो मित्रों द्वारा कष्ट, विपत्ति समभनी चाहिए।

हृदय-रेखा से शाखाएँ निकलकर कनिष्ठिका पर जावें: यदि हृदय-रेखा से कोई रेखा निकलकर कनिष्ठिका पर जावे और वहाँ समाप्ति पर ‘हुक’ का आकार हो जावे तो किसी दुर्घटना से गहरी चोट लगती है।

अन्त में कोई शाखा न निकले: यदि हृदय-रेखा क्षीण और असुन्दर हो और अन्त तक इसमें से कोई शाखाएँ न निकलें तो ऐसे व्यक्तियों की सन्तानोत्पादन-शक्ति कम होती है — शुक्र-क्षेत्र तथा सन्तान-रेखाओं का भी इस सम्बन्ध में विचार कर लेना चाहिए।

हृदय-रेखा और भाग्य-रेखा का परस्पर सम्बन्ध

यदि हृदय-रेखा से कोई रेखा चलकर भाग्य-रेखा को काटे और भाग्य-रेखा खण्डित हो तो पति-पत्नी या अन्य किसी प्रेमी व्यक्ति की मृत्यु की सूचक है — भाग्य-रेखा जहाँ खण्डित हो उससे यह अनुमान लगाना चाहिए कि किस अवस्था में शोक-घटना होगी। भाग्य-रेखा मनुष्य के कार-बार, धन-समृद्धि, कार्योत्पादन-शक्ति और उसमें संलग्नता की द्योतक है। यदि भाग्य-रेखा खण्डित हो तो इन सब में बाधा सूचित होती है — इसलिए केवल ऐसे प्रियजनों में से किसी की मृत्यु होती है जिसके कारण भाग्योदय में बाधा पड़ गई हो।

यदि भाग्य-रेखा से रेखाएँ निकलकर हृदय-रेखा की ओर जावें किन्तु उसको स्पर्श न करें तो ऐसे प्रेम-सम्बन्ध द्योतित होते हैं जो विवाह में परिणत नहीं होते। यदि भाग्य-रेखा से निकलने वाली रेखा हृदय-रेखा का स्पर्श करे तो प्रेम का परिणाम विवाह होता है। यदि यही रेखा हृदय-रेखा को काट दे तो विवाह तो होगा किन्तु ऐसे विवाह का परिणाम दुःखद होता है। पाँच वर्षों के अनुभव में यह नियम अत्यधिक सटीक सिद्ध हुआ है — जहाँ भाग्य-रेखा की कोई रेखा हृदय-रेखा को छूती है, वहाँ जीवन में एक महत्त्वपूर्ण प्रेम-प्रसंग की स्थायी छाप रहती है।

तीनों प्रमुख रेखाओं का एक बिन्दु पर मिलना

पण्डित ओझा ने एक अत्यन्त गम्भीर संकेत बताया है — यदि दोनों हाथों में हृदय-रेखा, शीर्ष-रेखा और जीवन-रेखा प्रारम्भिक स्थान में मिली हुई हों और शीर्ष-रेखा के मध्य में ‘क्रॉस’-चिह्न हो तो सहसा मृत्यु हो जायेगी। यदि दोनों हाथों में एक-से लक्षण हों तो आशंका और भी अधिक।

यदि हृदय, शीर्ष तथा जीवन-रेखा तीनों प्रारम्भिक स्थान में मिली हों और बृहस्पति के क्षेत्र पर किसी अल्प टेढ़ी रेखा को कोई दूसरी शुभ-रेखा काटकर ‘क्रॉस’-चिह्न बनाती हो तो ऐसे जातक के जीवन में कोई ऐसा प्रेम-सम्बन्ध होगा जिसके कारण इसे घोर कष्ट, निराशा और संताप होगा — प्राणान्त कष्ट तक हो सकता है। परन्तु इसे भी अन्य सम्पूर्ण लक्षणों के साथ मिलाकर ही देखना उचित है।

गरुड़-पुराण की आयु-निर्धारण पद्धति

“कनिष्ठांगुलि देशात्तु रेखा गच्छति मध्यमाम्। अविच्छिन्ना तु रेखा स्यात् अशीतिवायुविनिदिशेत्॥”

गरुड़-पुराण (हस्त-रेखा-विज्ञान, पं. ओझा में उद्धृत)

गरुड़-पुराण की यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पद्धति है — यदि कनिष्ठिका उँगली के नीचे से रेखा निकलकर मध्यमा (बीच की) उँगली के तृतीय-पर्व मूल तक जावे और अविच्छिन्न (टूटी-फूटी या कटी न हो) हो तो मनुष्य ८० वर्ष जीता है। इसी प्रकार ‘गरुड़ प्रान्त’ में — “मध्यमायां ह्यानागता पष्टि वर्षायुषम्” — यदि मध्यमा उँगली तक आयु-रेखा न पहुँचे, अर्थात् अनामिका प्रान्त (सूर्य-क्षेत्र) के अन्त पर ही अन्त हो जावे तो ६० वर्ष की आयु कहना। वराह मिहिराचार्य का मन्तव्य है कि यदि प्रदेशिनी (तर्जनी) उँगली तक आयु-रेखा जावे तो यह व्यक्ति १०० वर्ष जीयेगा। यदि यह रेखा छिन्न (टूटी या कटी) हो तो पेड़ से गिरने का भय होता है।

हृदय-रेखा को दस खण्डों में विभाजित करके जिस खण्ड में पल्लवित, छिन्न आदि दोष हो उस काल में कष्ट कहना — यह भारतीय पद्धति का अत्यन्त व्यावहारिक प्रयोग है।

पाँच वर्षों का व्यावहारिक अनुभव — हृदय-रेखा के दस सूत्र

पहला: हृदय-रेखा कहाँ समाप्त होती है — गुरु-क्षेत्र = आदर्शवादी प्रेम, शनि-क्षेत्र = व्यावहारिक, दोनों के बीच = सर्वोत्तम। दूसरा: ऊँचाई — अत्यन्त ऊँची = उग्र प्रेम, अत्यन्त नीची = कठोर और स्वार्थी स्वभाव। तीसरा: गहरी और स्पष्ट = प्रेम में गहराई और निष्ठा। श्रृंखलाकार = अनुचित प्रेम-सम्बन्ध की प्रवृत्ति। चौथा: हृदय-रेखा और शीर्ष-रेखा के बीच का Quadrangle विस्तृत = उदारता। सँकरा = कृपणता। पाँचवाँ: द्वीप = प्रेम में धोखा या हृदय-रोग का काल। छठा: ऊपर की ओर शाखाएँ = प्रेम की सरसता। नीचे की ओर = दुःख और निराशा। सातवाँ: भाग्य-रेखा का स्पर्श = विवाह। काटना = दुःखद परिणाम। आठवाँ: न होना = स्वार्थी और क्रूर स्वभाव। नौवाँ: गरुड़-पुराण की पद्धति से आयु-काल निर्धारण करें। दसवाँ: हृदय-रेखा को सदा जीवन-रेखा, मस्तिष्क-रेखा और ग्रह-क्षेत्रों के साथ मिलाकर देखें।

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अगले अध्याय की ओर

हृदय-रेखा को समझना अपने भावनात्मक जीवन की गहराई को समझना है। अगले अध्याय में हम भाग्य-रेखा (धन-रेखा/ऊर्ध्व-रेखा) का विस्तृत अध्ययन करेंगे — वह रेखा जिसके विषय में सबसे अधिक जिज्ञासा होती है।

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